मुंबई। अभिनेता संजय दत्त ने देश में शांति को लेकर की गई अपनी टिप्पणी पर उठे विवाद के बाद सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुंचाना अथवा उनका अपमान करना नहीं था। दत्त ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी एक पूर्व-निर्धारित, हल्के-फुल्के और हास्यप्रधान संवाद का हिस्सा थी।
संजय दत्त हाल ही में अभिनेता शेखर सुमन के कार्यक्रम शेखर टुनाइट में शामिल हुए थे। गांधी जयंती के अवसर पर प्रसारित इस कार्यक्रम में उन्होंने देश की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि अब उन्हें भारत में पहले जैसी शांति महसूस नहीं होती। उन्होंने भारतीयों को उदार और मेहमाननवाज बताते हुए उम्मीद जताई थी कि देश में फिर से सद्भाव का वातावरण बनेगा। इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया।
दत्त ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि बातचीत का संदर्भ हास्य और व्यंग्य का था। उन्होंने इसे अपनी चर्चित फिल्म मुन्नाभाई में प्रस्तुत ‘गांधीगिरी’ की भावना से जोड़ते हुए कहा कि इसका उद्देश्य प्रेम, अपनत्व, एकता और सद्भाव का संदेश देना था। उनके अनुसार, उनकी बात को मूल संदर्भ से अलग करके समझा गया।
कार्यक्रम में दत्त ने मुन्नाभाई के अंदाज में स्वयं को कुछ मिनटों के लिए प्रधानमंत्री की भूमिका में भी कल्पित किया था। इस दौरान उन्होंने गांधीजी के तीन बंदरों का उल्लेख करते हुए गलत बातों के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत पर जोर दिया।
यह प्रकरण बताता है कि सार्वजनिक मंचों पर हास्य और व्यंग्य प्रस्तुत करते समय संदर्भ और शब्दों का चयन कितना महत्वपूर्ण है। लोकप्रिय कलाकारों की टिप्पणियां तेजी से व्यापक प्रभाव डालती हैं, इसलिए मनोरंजन और संवेदनशीलता के बीच संतुलन आवश्यक है।
