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दृश्यम : द कन्क्लूज़न : कानून और कहानी की जंग!

दृश्यम : द कन्क्लूज़न : कानून और कहानी की जंग!

कुछ फिल्में खत्म हो जाती हैं, लेकिन उनके सवाल खत्म नहीं होते। ‘दृश्यम’ ऐसी ही फिल्म है। पहली फिल्म ने पूछा था—सच क्या है? दूसरी ने पूछा था—सच को झूठ से कैसे ढका जा सकता है? और अब तीसरी फिल्म ‘दृश्यम : द कन्क्लूज़न’ पूछती है—जब सामने वाला आपके झूठ की परतें खोलने के लिए ही बैठा हो, तब आप सच को किस तरफ मोड़ेंगे?

झूठ शब्दों के बीच छिपने की जगह ढूँढ़ लेता है, लेकिन दृश्य झूठ नहीं बोलते! लोग समझते हैं कि आँखों देखा झूठ नहीं हो सकता, मगर कहानियाँ दोहरा-दोहरा कर झूठ को सच का रूप दे सकती हैं।

‘दृश्यम : द कन्क्लूज़न’ इसी खेल का आखिरी अध्याय है। विजय सलगांवकर के रूप में अजय देवगन फिर सामने हैं। वही चेहरा, वही शांत आँखें, वही परिवार के लिए किसी भी हद तक जाने वाला आदमी और वही सवाल—क्या विजय इस बार भी कानून से चार कदम आगे है? ‘दृश्यम’ की सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि दर्शक पहले से जानता है कि विजय सलगांवकर ने क्या किया है। उसे यह भी पता है कि विजय झूठ बोल सकता है, सबूतों को अपने हिसाब से मोड़ सकता है और पुलिस को चकमा देने के लिए फिल्मी कहानियों तक का इस्तेमाल कर सकता है।

ऐसे में तीसरी फिल्म बनाना वैसा ही है जैसे कोई जादूगर अपना पुराना जादू तीसरी बार दिखाए और दर्शक पहले से जानता हो कि टोपी में खरगोश है। लेकिन इस बार फिल्म की चाल थोड़ी अलग है। निर्माताओं ने मलयालम संस्करण की कहानी को जस का तस दोहराने के बजाय हिंदी संस्करण के लिए अलग स्क्रीनप्ले चुना है। यही फैसला फिल्म को अपनी अलग पहचान देता है।  विजय और उसके परिवार पर पुराना संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कहानी में फिर से मीरा देशमुख (तब्बू) लौटती हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अपने बेटे की मौत के लिए न्याय नहीं, बदला चाहिए।

अब सामने हैं क्राइम ब्रांच के एसपी राजवीर सिंह तोमर (जयदीप अहलावत), जो कहते हैं “मैं आदमी नहीं, शनि हूँ। जिस पर टेढ़ी नज़र पड़ गई ना, समझ जाओ उसका बुरा वक्त शुरू हो गया है।” और यही वह आदमी है, जिसके आने से विजय के चेहरे की शांति पहली बार सचमुच खतरे में दिखाई देती है।

विजय सलगांवकर के रूप में अजय देवगन की सबसे बड़ी ताकत उनका संयम है। वह चीखते नहीं। लंबे-लंबे भाषण नहीं देते। हर पाँच मिनट में अपनी बहादुरी साबित नहीं करते। डायलॉगबाज़ी नहीं करते। वह बस देखते हैं। उनकी आँखें वह कह देती हैं, जो किसी दूसरे अभिनेता को दस संवाद बोलकर कहना पड़ता। अजय ने विजय को फिर उसी अंदाज में पकड़ा है : एक सामान्य परिवार का सामान्य-सा आदमी, जो असामान्य परिस्थितियों में असामान्य दिमाग इस्तेमाल करता है। उसकी यही खासियत है कि वह अपराधी होते हुए भी अपराधी जैसा दिखाई नहीं देता। दर्शक उसकी हर चाल का नैतिक समर्थन करे, यह जरूरी नहीं, लेकिन उसकी मजबूरी को समझ जरूर लेता है। और यही ‘दृश्यम’ की असली कामयाबी है।

अगर अजय देवगन इस फिल्म की रीढ़ हैं, तो जयदीप अहलावत उसका सबसे धारदार हथियार हैं। राजवीर सिंह तोमर के रूप में जयदीप केवल पुलिस अफसर नहीं बने हैं। वह विजय के दिमाग के सामने दूसरा दिमाग लेकर आते हैं। पिछली फिल्मों में पुलिस विजय की चाल समझने की कोशिश करती थी। इस बार सामने वाला अफसर विजय के खेल को समझकर मैदान में उतरता है। यही फर्क फिल्म में रोमांच पैदा करता है। जयदीप की आवाज, ठहराव, चेहरे का तनाव और सामने वाले को लगातार पढ़ते रहने का अंदाज फिल्म को कई जगह अजय और जयदीप के बीच शतरंज की बाजी बना देता है। एक तरफ विजय है, जो कहानी बनाता है, तो दूसरी तरफ राजवीर है, जो कहानी में छेद खोजता है। एक कहानी लिख रहा है, दूसरा कहानी पढ़ रहा है। असली मजा यहीं है।

इस बार फिल्म का फोकस परिवार की भावुकता से ज्यादा कानूनी और मनोवैज्ञानिक मुकाबले पर है। दूसरे हिस्से में कहानी अदालत और कानून की तरफ बढ़ती है। प्रकाश राज जब आते हैं तो मुकाबला केवल पुलिस बनाम विजय नहीं रह जाता। मामला कानून बनाम उस कहानी का हो जाता है, जिसे विजय ने इतने वर्षों से सच की तरह स्थापित कर रखा है। यहाँ फिल्म दिलचस्प सवाल उठाती है - कानून को सच चाहिए या सच साबित करने के लिए सबूत? और अगर सबूत और सच्चाई दो अलग-अलग दिशाओं में खड़े हों, तो अदालत किसका साथ देगी?

यही वह जगह है जहाँ ‘दृश्यम’ न्याय, नैतिकता और कहानी कहने के बीच का खेल बन जाती है। ‘दृश्यम’ की फिल्मों में दर्शक सिर्फ दर्शक नहीं होता, वह खुद जासूस बन जाता है। आप स्क्रीन देखते हुए सोचते हैं—यह दृश्य क्यों आया? यह चीज यहाँ क्यों दिखाई गई? यह आदमी इतना चुप क्यों है? कैमरा इधर क्यों गया? और जब फिल्म आपको किसी एक दिशा में सोचने के लिए मजबूर करती है, तभी वह दूसरी दिशा में निकल जाती है। यही इस फिल्म की जान है।

एक छोटा-सा संकेत कहानी में पहले दिखाई देता है, लेकिन उसका असली अर्थ बाद में समझ आता है। दर्शक लगातार अनुमान लगाता रहता है कि आखिर जीतेगा कौन विजय या कानून? दिक्कत यह है कि दर्शक पहले से विजय को जीतते हुए देखना चाहता है। इसलिए फिल्म के सामने चुनौती केवल रहस्य पैदा करने की नहीं, बल्कि ऐसा रहस्य रचने की है जिसका उत्तर दर्शक आसानी से न पकड़ सके। 

निर्देशन की सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म अपने पुराने अध्यायों की पूरी कहानी फिर से सुनाने में समय बर्बाद नहीं करती। दर्शक को बेवकूफ समझने की गलती नहीं की गई। फिल्म में गानों की भरमार, कारों की रेस, दोअर्थी संवाद, ओवरएक्टिंग, चुम्मा-चाटी या फूहड़पन नहीं है। अभिनय, बैकग्राउंड म्यूजिक और कहानी इसकी जान हैं। फिल्म अपनी कहानी पर भरोसा करती है और दर्शक के दिमाग के साथ खेलती है। यही इस फ्रेंचाइज़ी की असली पहचान है।

‘दृश्यम’ की पूरी यात्रा में एक आदमी ने कानून से ज्यादा अपने दिमाग पर भरोसा किया। उसने झूठ बोला, सबूतों को अपने पक्ष में किया, परिवार को बचाया और दर्शकों को भी अपने साथ खड़ा कर लिया। हम जानते हैं कि विजय ने सही नहीं किया। फिर भी हम चाहते हैं कि वह पकड़ा न जाए। क्यों? क्योंकि सिनेमा ने हमें अपराधी की आँख से कहानी देखने की आदत डाल दी है।

यही ‘दृश्यम’ का सबसे बड़ा खेल है - कानून विजय को अपराधी मानता है, लेकिन कहानी उसे अपना नायक बना देती है। और आखिर में सवाल वही रह जाता है कि सच बड़ा है या वह कहानी, जिसे लोग सच मानने लगें?

दृश्यम : द कन्क्लूज़न — देखनीय!