फिल्म निर्माता महेश भट्ट के जीवन का एक हिस्से आज भी परिवार की यादों में ताजा है — उनका ओशो (रजनीश) से जुड़ाव और उससे अलग होने का दौर। उनकी बेटी पूजा भट्ट ने हाल ही में उन दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे यह अनुभव परिवार पर गहरा प्रभाव छोड़ गया। शुरू में ओशो के विचारों ने महेश भट्ट के विचारों में परिवर्तन लाया और घर में एक नया जोश दिखाई दिया। पर कुछ वक्त बाद यह जुड़ाव टूटने लगा और रिश्तों में कड़वाहट आ गई।
पूजा बताती हैं कि जुड़ाव खत्म होने के बाद पिता का रुख बदल गया; एक बार उन्होंने अपनी माला टॉयलेट में फेंक दी, जो उस दूरी और निराशा का प्रतीक बन गई। इस घटना ने परिवार में चल रहे तनाव को और स्पष्ट कर दिया। पूजा के अनुसार, यह केवल एक धार्मिक निर्णय नहीं था; इसके पीछे कई व्यक्तिगत और पारिवारिक वजहें थीं जिनका असर उनकी निजी और पेशेवर जिंदगी पर भी पड़ा।
उस समय की स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि अभिनेता विनोद खन्ना का फोन आकर कहा था, "भगवान बर्बाद कर देंगे" — एक टिप्पणी जो उस माहौल की गंभीरता और उलझन को दर्शाती है। महेश भट्ट का ओशो आंदोलन से अलग होना उनके आत्मविश्वास, रिश्तों और सोच पर असर डालने वाला मोड़ साबित हुआ।
आज पूजा के लहजे में उस दौर की यादें साफ सुनाई देती हैं: एक ऐसा समय जिसने एक युवा फिल्मकार की दुनिया को बदल दिया और परिवार में कई सवाल छोड़ गए। इस घटना से यह भी साफ होता है कि धर्म और विश्वास के चुनाव कितने संवेदनशील परिणाम दे सकते हैं, खासकर जब वे सार्वजनिक जीवन और निजी रिश्तों से जुड़े हों।