91255 06666   |   Registration   |   Login

'मनु शर्मा' : मिथक को आज की आवाज़ देने वाले युगदृष्टा साहित्यकार

'मनु शर्मा' : मिथक को आज की आवाज़ देने वाले युगदृष्टा साहित्यकार

हिंदी साहित्य में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल पुस्तकों के पृष्ठों पर नहीं ठहरते, वे समय की चेतना में उतरकर युग की धड़कन बन जाते हैं। पद्मश्री मनु शर्मा उसी परम्परा के रचनाकार थे, जिन्होंने कथा को केवल कथा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे चिंतन, संवेदना और मनुष्यता के गहरे प्रश्नों से जोड़ दिया। उन्होंने कृष्ण, कर्ण, द्रौपदी और गांधारी जैसे पौराणिक पात्रों को पुराणों की शास्त्रीय दूरी से निकालकर हमारे आज के संघर्ष, हमारी वेदना और हमारे आदर्शों के अत्यंत निकट ला दिया, जहाँ वे देवता नहीं, हमारे जैसे ही रक्त-मांस के, संदेह और संकल्प से घिरे मनुष्य प्रतीत होते हैं।

मनु शर्मा का जन्म 1928 की शरद पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जनपद के अकबरपुर में हुआ था। शरद पूर्णिमा की वह धवल, शीतल रात मानो उनके जीवन की पूर्वसूचना बन गई, जिस रात चंद्रमा अपनी पूर्ण आभा के साथ अंधकार को चीरता है। बाद के वर्षों में उनका लेखन भी ठीक उसी प्रकार अज्ञान और अंधकार के बीच प्रकाश की एक शांत, परन्तु दृढ़ रेखा खींचता रहा। उनकी शिक्षा काशी विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई। काशी उनके लिए केवल एक विश्वविद्यालय का परिसर नहीं रही, वह एक जीवंत पाठशाला थी। यहाँ की संकरी गलियों, गंगा के घाटों, मंदिरों की घंटियों, विद्वानों की गोष्ठियों और जन-जीवन की बहुरंगी संस्कृति ने उनके चिंतन को गहराई दी और उनकी भाषा को मिट्टी की सोंधी गंध। वाराणसी धीरे-धीरे उनकी पहचान, उनकी भाषा और उनके साहित्य की जन्मभूमि बन गई, जहाँ से उन्होंने भारतीय मन को पढ़ने और गढ़ने का कार्य किया।

अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत उन्होंने 1970 के दशक में वाराणसी से प्रकाशित होने वाले जनवार्ता पत्र में ‘कार्टून कविता’ के माध्यम से की। ये कविताएँ केवल हास्य या व्यंग्य का खेल नहीं थीं, इनमें सत्ता, नीति और सामाजिक विसंगतियों पर तीखी, मार्मिक चोट थी। उस समय की राजनीति और समाज की विद्रूपताओं को उन्होंने छोटी-छोटी पंक्तियों में इस प्रकार बाँधा कि पाठक हँसते-हँसते सोचने पर विवश हो जाता। आपातकाल के दौरान 1975 में इन कविताओं पर प्रतिबंध लगाया गया, जो उनकी आवाज़ की प्रासंगिकता और साहस का सबसे बड़ा प्रमाण बना। प्रतिबंध ने उन्हें मौन नहीं किया, बल्कि यह सिद्ध किया कि शब्द जब सत्य से जुड़ जाते हैं तो सत्ता को भी विचलित कर देते हैं।

मनु शर्मा लेखन को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं मानते थे, उनके लिए वह समाज के प्रति एक गंभीर उत्तरदायित्व था। उनकी कविताओं में व्यंग्य के पीछे करुणा छिपी थी, और करुणा के पीछे परिवर्तन की तीव्र इच्छा। वह करुणा जो केवल दया नहीं करती, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस देती है। यही संवेदना आगे चलकर उनके उपन्यासों और कहानियों की रीढ़ बनी, जहाँ प्रत्येक पात्र अपने समय से प्रश्न करता दिखाई देता है।

उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध और ललित लेखन, लगभग हर विधा में लिखा। उनके रचना-संसार में लगभग 18 उपन्यास, 200 से अधिक कहानियाँ और 7,000 से अधिक कविताएँ शामिल बताई जाती हैं। यह संख्या केवल परिमाण का प्रमाण नहीं है, बल्कि उनकी निरंतर साधना, अनवरत चिंतन और भाषा के प्रति अटूट निष्ठा का साक्ष्य है। उनके प्रमुख पौराणिक उपन्यासों में कृष्ण की आत्मकथा, कर्ण की आत्मकथा, द्रोण की आत्मकथा, द्रौपदी की आत्मकथा और गांधारी की आत्मकथा शामिल हैं। इन रचनाओं में उनके पात्र अपने दुख, अधिकार, त्याग और विरोध की आवाज़ स्वयं उठाते हैं, जिससे प्राचीन कथा आधुनिक मानवीय संवेदना से जुड़ जाती है। यहाँ कर्ण केवल दानवीर नहीं, उपेक्षित प्रतिभा की पीड़ा है, द्रौपदी केवल पाँचाली नहीं, स्त्री के स्वाभिमान की ज्वाला है, और गांधारी केवल पट्टी बाँधे आँखों वाली रानी नहीं, मौन में विद्रोह करती माँ है।

उनके सामाजिक उपन्यासों में मरीचिका, विवशता, लक्ष्मणरेखा और गांधी लौटे प्रमुख हैं, जिनमें आधुनिक समाज की विडंबनाओं, टूटते मूल्यों और व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। इसके अलावा पोस्टर उखड़ गया, मुंशी नवनीतलाल, महात्मा और दीक्षा उनके कहानी-संग्रहों में उल्लेखनीय हैं, जहाँ छोटे-छोटे जीवन-प्रसंग बड़े मानवीय सत्य बनकर उभरते हैं। उनकी कविताएँ और निबंध, जैसे खूँटी पर टँगा वसंत तथा उस पार का सूरज, समकालीन समाज के अनुभव और चिंतन का दस्तावेज़ प्रस्तुत करते हैं, जहाँ ऋतुओं की प्रतीक्षा और जीवन की संध्या दोनों एक साथ उपस्थित हैं।

उनकी सबसे बड़ी देन ‘कृष्ण की आत्मकथा’ है, जो आठ खंडों में प्रकाशित हुई और प्रायः हिंदी का सबसे विशाल उपन्यास कही जाती है। इसे केवल एक औपन्यासिक श्रृंखला नहीं, बल्कि एक उपनिषदीय ग्रंथ कहा गया है, जिसमें कृष्ण को उनकी संपूर्णता और समग्रता में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ केवल कथा का विस्तार नहीं है, बल्कि कृष्ण के मन की अंतर्यात्रा है, जहाँ दर्शन, इतिहास और कविता एक साथ बहते हैं। इस रचना में मनु शर्मा ने कृष्ण को देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक चिंतनशील, संघर्षशील और आत्मचेतन मानव के रूप में चित्रित किया। कृष्ण यहाँ अपने जीवन को स्वयं कहता है, अपने दुखों को स्वीकार करता है और अपने आदर्शों से टकराता है, यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी मौलिकता है। यहाँ कृष्ण लीला नहीं करता, वह जीवन को जीता है, उसकी पीड़ा को झेलता है और उसके प्रश्नों से जूझता है।

‘कृष्ण की आत्मकथा’ के दूसरे खंड ‘दुरभिसंधि’ में मनु शर्मा ने कृष्ण के माध्यम से आदर्श और कर्म का दर्शन रखा है, “वस्तुतः क्षितिज मेरा गंजव्य नहीं, मेरे गंजव्य का आदर्श है। आदर्श कभी पाया नहीं जाता। यदि पा लिया गया तो वह आदर्श नहीं।” यह पंक्ति उनके साहित्य की दार्शनिक गहराई का उत्कृष्ट नमूना है, जहाँ आदर्श को एक गंतव्य नहीं, एक दिशा माना गया है, जो मनुष्य को सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आगे वही कथ्य कर्तव्य और आस्था के रूप में विकसित होता है, “न पाने की निश्चितता के साथ भी कर्म में अटल आस्था ही मुझे दौड़ाए लिए जा रही है। यही मेरे जीवन की कला है।” यहाँ कृष्ण केवल लीलापुरुष नहीं, बल्कि कर्तव्य, संघर्ष और आदर्श के बीच चलने वाला चेतन मानव बन जाता है, जो जानता है कि फल की प्राप्ति नहीं, कर्म की निष्ठा ही जीवन का अर्थ है।

‘लाक्षागृह’ खंड में उनकी भाव-ग्रंथि और स्मृति की सूक्ष्म समझ दिखती है। कृष्ण कहता है, “मैं नियति के तेज वाहन पर सवार था। सबकुछ मुझसे पीछे छूटता जा रहा था। वृंदावन और मथुरा, राधा और कुब्जा—सबकुछ मार्ग के वृक्ष की तरह छूट गए थे।” इस एक वाक्य में जीवन की समस्त गति, समस्त विछोह और समस्त नियति समाहित है। आगे वही कथ्य अतीत और वर्तमान के संबंध की गहरी वेदना बन जाता है, “केवल उनकी स्मृतियाँ मेरे मन से लिपटी रह गई थीं। कभी-कभी वर्तमान की धूल उन्हें ऐसा घेर लेती है कि वे उनसे निकल नहीं पाती थीं। मैं अतीत से कटा हुआ केवल वर्तमान का भोक्ता रह जाता।” ये पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि मनु शर्मा के पात्र केवल कथा के वाहक नहीं, आत्म-चिंतन करने वाले मानव हैं, जो अपनी स्मृतियों में जीते हैं, उनसे लड़ते हैं और उन्हीं से अपना अर्थ खोजते हैं।

मनु शर्मा के पुत्र, देश के जाने-माने पत्रकार और टीवी9 भारतवर्ष के न्यूज़ डायरेक्टर हेमंत शर्मा, पिता की साहित्यिक विरासत को सक्रिय रूप से सँभाल रहे हैं। उनके प्रयास से ‘हमारे मनु’ नाम से एक न्यास का गठन किया गया है, जो प्रतिवर्ष मनु शर्मा की जयंती पर बड़े स्तर पर स्मृति-संगोष्ठी, पुस्तक लोकार्पण और मेधावी छात्रों के सम्मान का आयोजन करता है। यह न्यास केवल एक स्मृति-संस्था नहीं है, बल्कि एक साहित्यिक यज्ञ है, जहाँ नई पीढ़ी को पुरानी विरासत से जोड़ा जाता है। 2025 में उनकी 98वीं जयंती और 2026 में 99वीं जयंती पर वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में भव्य आयोजन हुए। इन कार्यक्रमों में स्वामी चिदानंद सरस्वती, राज्यसभा उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जैसी गणमान्य हस्तियों ने भाग लिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मनु शर्मा का साहित्य केवल साहित्यिक जगत तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बन चुका है।

अगले वर्ष, अर्थात् 2027 में मनु शर्मा का शताब्दी जन्म वर्ष पूरा होगा। हेमंत शर्मा ने घोषणा की है कि इस अवसर पर उनके संपूर्ण साहित्य को एक साथ प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें उनके ग्रंथ और कविताओं के संग्रह विशेष रूप से शामिल होंगे। यह आयोजन केवल एक जयंती समारोह नहीं, बल्कि हिंदी के एक विशाल रचनाकार की रचनाओं को सुरक्षित, सुलभ और संस्थागत रूप देने का प्रयास होगा। इसका उद्देश्य उनके साहित्य को विश्वविद्यालयों, शोधकर्ताओं, पाठकों और नवोदित लेखकों तक व्यापक रूप से पहुँचाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस साहित्य से संवाद कर सकें और उसे आगे बढ़ा सकें।

काशी की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था नागरीप्रचारिणी सभा ने मनु शर्मा के लगभग 80 लेखनों का संग्रहण कर लिया है, जिसका शीघ्र प्रकाशन प्रस्तावित है। यह संकलन उनकी विविध रचनाओं, कविता, निबंध, संस्मरण, विचार-लेखन और साहित्यिक टिप्पणियों, को एक स्थायी दस्तावेज़ के रूप में संजोएगा। नागरीप्रचारिणी सभा की परंपरा हिंदी के महत्वपूर्ण ग्रंथों के संपादन और प्रकाशन से जुड़ी रही है, इस संदर्भ में मनु शर्मा के लेखन का संकलन उनकी रचनाधर्मिता के प्रति एक विशेष साहित्यिक सम्मान है, मानो काशी ने अपने ही पुत्र की रचनाओं को अपनी गोद में सँजो लिया हो।

‘हमारे मनु’ न्यास की ओर से नवोदित साहित्यकारों के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख 51 हजार रुपये के साहित्यिक सम्मान की घोषणा भी की गई है। इसके साथ ही मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित करने और छात्रवृत्ति देने की परंपरा भी चलाई जा रही है, ताकि साहित्य का दीपक केवल स्मृति में नहीं, भविष्य की प्रतिभाओं में भी जलता रहे।

मनु शर्मा का साहित्य इसलिए सजीव है क्योंकि वह केवल पुस्तकों में बंद नहीं है, उसे उनके परिवार, विद्वानों, पाठकों और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा लगातार पुनर्जीवित किया जा रहा है। उनका शताब्दी वर्ष हिंदी साहित्य के लिए उनकी रचनाओं को नए शोध, नए पाठ और नई पीढ़ी के संवाद का अवसर देगा। भारत सरकार ने 2015 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती सम्मान दिया था। 8 नवंबर 2017 को वाराणसी में 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, पर उनकी रचनाएँ और विचार आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर बने हुए हैं। मनु शर्मा केवल ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के लेखक नहीं थे, वे हिंदी के एक ऐसे युगदृष्टा थे जिन्होंने भारतीय मिथक को आधुनिक उपन्यास की भाषा दी। उनके शताब्दी वर्ष का आयोजन उस विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पुनः पढ़ने, समझने और आगे बढ़ाने का ऐतिहासिक अवसर होगा।