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रामायण आस्था है, ट्रेंड नहीं-‘मंगल रंग’ की कव्वाली धुन ने छेड़ी नई बहस

रामायण आस्था है, ट्रेंड नहीं-‘मंगल रंग’ की कव्वाली धुन ने छेड़ी नई बहस

भारत में रामायण सिर्फ कोई महाकाव्य नहीं है। वह करोड़ों परिवारों की सुबह की आरती है, उनके भजन हैं, उनकी रामलीला है और उनकी पीढ़ियों से चली आ रही आस्था है। इसलिए जब कोई फिल्म इस कथा को पर्दे पर लाती है, तो उसके सामने केवल कहानी कहने की चुनौती नहीं होती, उसे श्रद्धा की भाषा को भी समझना पड़ता है। नितेश तिवारी की ‘रामायण’ के गीत ‘मंगल रंग’ पर उठा विवाद इसी संवेदनशीलता की देन है।

गाना सुनते ही बड़ी संख्या में लोगों ने कहा कि इसकी धुन में कव्वाली और सूफी संगीत की छाया साफ सुनाई देती है। उनकी आपत्ति कव्वाली से नहीं है, कव्वाली अपने आप में एक गरिमामय सूफी परंपरा है। आपत्ति इस बात पर है कि राम-सीता के विवाह जैसे अत्यंत पवित्र और मांगलिक प्रसंग को उसी शैली में क्यों ढाला गया, जिसे वे सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त नहीं मानते।

रामायण की अपनी ध्वनि है - चौपाई, दोहा, भजन, रामलीला और लोकगीत। इनमें श्रद्धा, संयम और कथा कहने का भाव सबसे ऊपर रहता है। जब उसी कथा के विवाह प्रसंग को कव्वाली जैसी धुन में रख दिया जाता है, तो श्रद्धालुओं को लगता है कि बदला सिर्फ संगीत नहीं है, प्रसंग का भाव भी बदल गया है।

आलोचकों का एक बड़ा तर्क ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संगति का भी है। उनका कहना है कि त्रेतायुग की कथा पर बनी फिल्म में सूफी कव्वाली जैसी धुन काल और संस्कृति दोनों के हिसाब से मेल नहीं खाती। इसे कई लोगों ने संगीत में पर्याप्त रिसर्च की कमी और बॉलीवुड की गलत समझ का नतीजा बताया है।

विवाद केवल धुन तक सीमित नहीं रहा। गाने में दिखाए गए हल्दी रस्म वाले दृश्य पर भी सवाल उठे। कुछ दर्शकों को लगा कि दृश्य में दिखाई गई रस्म और उसका प्रस्तुतिकरण परंपरा के अनुरूप नहीं है। इस वजह से नाराजगी और बढ़ गई और अयोध्या के कुछ साधु-संतों ने तो फिल्म के बहिष्कार की मांग तक कर दी।

इस बहस में गीतकार मनोज मुंतशिर का नाम भी जुड़ गया। उन्होंने कहा कि उन्होंने राम के लिए न कव्वाली लिखी है, न कोई नर्सरी राइम्स। लेकिन यह बयान तब और चर्चित हो गया जब लोगों को ‘आदिपुरुष’ का प्रसंग याद आ गया। उस फिल्म के संवादों को भी अशिष्ट और रामायण के पात्रों के लिए अनुचित माना गया था, कुछ पंक्तियां बदलनी पड़ीं थीं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी थी।

मुंतशिर ने खुद स्वीकार किया है कि ‘आदिपुरुष’ एक बहुत खराब फिल्म थी और उसके संवाद और भी खराब थे। ऐसे में जब वे नाराज होकर आलोचना पर तंज कसते हैं, तो लगता है कि वे उसी रास्ते पर फिर चल पड़े हैं, जहां श्रद्धा को बचाने के नाम पर आलोचना को ही दुश्मन बना दिया जाता है। उनका यह कहना कि उनके गीत देश का हर बच्चा गाता है, अधूरा तर्क लगता है। गीतों की लोकप्रियता में संगीतकारों, गायकों और दर्शकों की क्षमा का योगदान भी उतना ही बड़ा रहा है।

इस बार संगीतकार ए.आर. रहमान का नाम भी विवाद में आ गया है। कई लोगों ने आरोप लगाया कि ‘मंगल रंग’ की धुन उनके पुराने गानों, खासकर ‘कुन फया कुन’ और तमिल गीत ‘एन्ना सोला पोगिराई’ से मिलती-जुलती है। ये अभी दर्शकों की प्रतिक्रियाएं हैं और किसी नकल की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जब रामायण जैसी पवित्र कथा पर बने गीत को ‘रीसाइकल’ या ‘कव्वाली-कोडेड’ कहा जाने लगे, तो श्रद्धालुओं की नाराजगी स्वाभाविक हो जाती है।

बॉलीवुड को समझना होगा कि आस्था को ट्रेंड बनाकर पेश करना उतना ही खतरनाक है, जितना उसे नजरअंदाज करना। रामायण जैसी कथा पर काम करते समय शब्द, सुर और दृश्य - तीनों में संयम और सम्मान चाहिए। लगातार ऐसी गलतियां करना न सिर्फ लापरवाही है, बल्कि करोड़ों लोगों की भावना के साथ खिलवाड़ भी है।

अंत में यह विवाद हमें एक सीधा सवाल छोड़ जाता है। रामायण करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, उसके किसी भी अंश के साथ खिलवाड़ उचित नहीं ठहराया जा सकता। सवाल यह नहीं है कि कव्वाली अच्छी है या बुरी, सवाल यह है कि वह रामायण के प्रसंग में कहां ठहरती है। जब धुन, दृश्य और रस्में ही परंपरा से अलग दिखने लगें, तो लोगों का आहत होना कोई फैशन नहीं है, वह अपनी आस्था की रक्षा का स्वाभाविक भाव है। श्रद्धा को नाजुक बनाना नहीं है, उसे समझदारी से संभालना है।