अभिनेत्री रसिका दुग्गल का मानना है कि समावेशी सिनेमा की बात केवल विविध पात्रों और बड़े दर्शक वर्ग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; बच्चों के लिए भी उनकी भावनाओं, जिज्ञासा और सोच से जुड़ी फिल्में बनाना आवश्यक है। ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की सफलता के बाद वह ‘लिटिल थॉमस’ के जरिए बच्चों के सिनेमा की आवश्यकता पर बात कर रही हैं।
कौशल ओझा के निर्देशन में बनी ‘लिटिल थॉमस’ में रसिका दुग्गल जेसी मिरांडा का किरदार निभा रही हैं। फिल्म की कहानी सात वर्षीय थॉमस के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बच्चे कहां से आते हैं, इस सवाल का जवाब जानना चाहता है और अपने लिए एक भाई या बहन चाहता है। बच्चे की यह सहज उत्सुकता ही कथानक को आगे बढ़ाती है और परिवार, पालन-पोषण तथा बड़ों-बच्चों के बीच संवाद के मुद्दों को उजागर करती है।
रसिका दुग्गल ने कहा कि सिनेमा दुनिया को विस्तार देने और कल्पनाशक्ति को प्रोत्साहित करने का बेहतरीन माध्यम है। उनके अनुसार, हमारे कई विचार और धारणाएं बचपन में देखी गई फिल्मों से जुड़ी होती हैं। इसलिए ऐसी फिल्में बनानी चाहिए, जिनसे बच्चे खुद को जोड़ सकें और जिनमें उनकी जिज्ञासा को खारिज करने के बजाय स्वीकारा जाए। उन्होंने कहा कि बच्चों का सिनेमा मनोरंजक होते हुए भी भीतरी अर्थ रख सकता है और अर्थपूर्ण होते हुए भी उपदेशात्मक नहीं बनना चाहिए।
‘लिटिल थॉमस’ 1990 के दशक के गोवा की पृष्ठभूमि पर बनी पारिवारिक फिल्म है, जिसमें गुलशन देवैया, रसिका दुग्गल और बाल कलाकार हृदांश पारेख मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म में थॉमस के माता-पिता जेसी और डेसमंड एक बेकरी चलाते हैं, जबकि पारिवारिक और आर्थिक दबाव उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। इस कहानी में बच्चे की नजर से बड़ों की चिंताओं और रिश्तों की नाजुकता को देखा गया है।
रसिका का यह बयान उस वक्त आया है, जब भारतीय सिनेमा में बच्चों के लिए बनने वाली फिल्मों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। ‘लिटिल थॉमस’ जैसी फिल्में यह संदेश देती हैं कि बच्चों के सवाल तुच्छ नहीं होते; वे उनकी सोच, भावनाओं और दुनिया को समझने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। रसिका दुग्गल की अपील है कि फिल्म निर्माता ऐसी कहानियों को और अधिक गंभीरता से लें, ताकि बच्चों को भी उनकी अपनी कहानियां, अपने सवाल और अपनी कल्पना की दुनिया सिनेमा में मिल सके।
