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पहली प्रोड्यूस फिल्म को वैश्विक मंच दिलाने में जुटीं अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी

पहली प्रोड्यूस फिल्म को वैश्विक मंच दिलाने में जुटीं अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी

श्वेता त्रिपाठी के लिए अपनी फिल्म मुझे जान ना कहो मेरी जान को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स और फिल्म बाज़ारों तक ले जाना, बतौर प्रोड्यूसर उनके सफर का एक अहम पड़ाव है। इस साल की शुरुआत में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से लेकर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) 2026 तक उनकी पहली प्रोड्यूस की गई फीचर फिल्म का सफर उनके लिए खास रहा है। श्वेता अब एक नई भूमिका में अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। वह इस फिल्म को दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचाने के लिए नए अवसर तलाश रही हैं, क्योंकि उन्हें इस कहानी पर पूरा भरोसा है।

एक अभिनेत्री के तौर पर श्वेता कई सालों से अलग-अलग कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाती रही हैं। लेकिन इस बार बतौर प्रोड्यूसर उन्होंने एक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी संभाली है। इस सफर में उन्हें अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत से जुड़ने और अलग-अलग देशों में फिल्म के लिए सहयोग, फंडिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की संभावनाएं तलाशने का मौका मिला है। उनके लिए फिल्म को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने का मतलब सिर्फ उसे दिखाना नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि भारतीय स्वतंत्र सिनेमा अपनी सीमाओं से बाहर कैसे पहुंच सकता है, उसे सही पार्टनर कैसे मिल सकते हैं और वह दूसरे देशों के दर्शकों से कैसे जुड़ सकता है।

इस बारे में श्वेता त्रिपाठी कहती हैं, “जिस फिल्म पर आपको भरोसा हो, उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना अपने आप में बहुत खास अनुभव है। और जब बतौर प्रोड्यूसर यह आपकी पहली फीचर फिल्म हो, तो यह अनुभव और भी खास हो जाता है। बर्लिन से टोरंटो तक का सफर मेरे लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि इस दौरान मुझे मुझे जान ना कहो मेरी जान को एक बिल्कुल नई भूमिका में पेश करने का मौका मिला। इस सफर में आप फिल्म को सिर्फ उसे बनाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखते, बल्कि यह भी सोचने लगते हैं कि यह किन लोगों तक पहुंच सकती है, किन मुद्दों पर बातचीत शुरू कर सकती है और इसके लिए आगे कौन-कौन सी संभावनाएं खुल सकती हैं। यह मेरे लिए सीखने का एक शानदार अनुभव रहा है और मैं इस बात को लेकर उत्साहित हूं कि यह सफर फिल्म के लिए क्या नए रास्ते खोल सकता है।”

नेशनल अवॉर्ड जीत चुके फिल्ममेकर संजय नाग के निर्देशन में बनी मुझे जान ना कहो मेरी जान में तिलोत्तमा शोम और श्वेता त्रिपाठी नज़र आएंगी। यह एक समलैंगिक प्रेम कहानी है, जो प्यार और इंसानी रिश्तों को सच्चाई और गहराई के साथ पेश करती है। श्वेता के लिए इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स और बाज़ारों तक ले जाना खास मायने रखता है, क्योंकि वह इस कहानी से व्यक्तिगत रूप से जुड़ी हुई हैं। उनका मानना है कि ऐसी कहानियों को भी दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचने और अपनी बात कहने का मौका मिलना चाहिए।

बतौर प्रोड्यूसर श्वेता का सफर थिएटर से शुरू हुआ था। साल 2010 में उन्होंने अपनी थिएटर प्रोडक्शन कंपनी आल माय टी शुरू की थी। इसकी शुरुआत ब्रिटिश नाटककार माइक बार्टलेट के चर्चित नाटक कॉक से हुई, जो समलैंगिक रिश्तों पर आधारित है और जिसके लिए माइक बार्टलेट को ओलिवियर अवॉर्ड मिल चुका है। इस साल प्राइड मंथ के दौरान इस नाटक का दोबारा मंचन हुआ। इसके साथ श्वेता ने थिएटर में वापसी की और यह भी दिखाया कि वह उन कहानियों की ज़िम्मेदारी खुद लेना चाहती हैं, जिनसे वह दिल से जुड़ी हैं। फीचर फिल्मों के निर्माण की ओर उनका बढ़ना इसी सोच का अगला कदम है। हालांकि, इसमें अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत को समझने और अपनी फिल्म के लिए सही अवसर तलाशने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी भी शामिल है।

श्वेता कहती हैं, “प्रोड्यूसर बनने के बाद कहानियों को देखने का मेरा नज़रिया बदल गया है। एक अभिनेत्री के तौर पर आप किसी किरदार और कहानी को जीवंत बनाने में पूरी तरह जुड़ी होती हैं। लेकिन एक प्रोड्यूसर के तौर पर आपको यह भी सोचना पड़ता है कि फिल्म बनने के बाद उसका सफर कैसा होगा, कौन-कौन लोग उससे जुड़ सकते हैं और उसे सही दर्शकों तक पहुंचाने के लिए क्या किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स और फिल्म बाजार ऐसे लोगों को एक साथ लाते हैं, जो इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने में मदद कर सकते हैं। अपनी पहली प्रोड्यूस की गई फिल्म को इन मंचों पर पेश कर पाना मेरे लिए एक बहुत अहम कदम रहा है।”

TIFF 2026 में श्वेता की भागीदारी को एक और खास उपलब्धि से मजबूती मिली। उन्हें विफ इंडिया x गोल्ड हाउस स्कॉलरशिप के लिए चुना गया, जिसकी मदद से उन्हें गोल्ड हाउस पीच में अपनी फिल्म मुझे जान ना कहो मेरी जान पेश करने का मौका मिला। इस मंच के जरिए फिल्म पर अंतरराष्ट्रीय प्रोड्यूसर्स, फाइनेंसरों, अधिकारियों और फिल्म जगत से जुड़े अन्य पेशेवरों के साथ बातचीत हुई। इससे श्वेता को फिल्म के लिए संभावित साझेदार तलाशने और उसके भविष्य की नई संभावनाओं को समझने का अवसर मिला।

बर्लिन से टोरंटो तक के इस सफर ने श्वेता को अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत के लोगों से जुड़ने, वहां के फिल्म बाजारों को समझने और वैश्विक स्तर पर भारतीय स्वतंत्र सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया है। एक तरफ वह अभिनेत्री के तौर पर अपना काम जारी रख रही हैं, वहीं दूसरी ओर बतौर प्रोड्यूसर भी अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। वह उम्मीद करती हैं कि इन अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए वह उन कहानियों को आगे ला सकेंगी, जिन पर उन्हें भरोसा है और जिन्हें ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलना चाहिए।

श्वेता के लिए मुझे जान ना कहो मेरी जान सिर्फ बतौर प्रोड्यूसर उनकी पहली फीचर फिल्म नहीं है, बल्कि एक नए सफर की शुरुआत भी है। वह चाहती हैं कि भारतीय कहानियां अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचें, फिल्म जगत के लोगों के साथ सार्थक साझेदारियां बनें और ऐसी फिल्मों को दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने का मौका मिले।