हिंदी दर्शक की स्मृति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनका नाम शायद तुरंत याद न आए, पर किरदार दिल में बस जाते हैं। ‘चंद्रकांता’ के पंडित जगन्नाथ, ‘लगान’ के गाँव के मुखिया और ‘चिड़ियाघर’ के बाबूजी ऐसे ही चेहरे हैं। इन तीनों के पीछे एक ही कलाकार हैं—राजेंद्र गुप्ता, जिन्होंने मंच, टेलीविज़न और फ़िल्म की दुनिया में बिना किसी फ़िल्मी खेमे के अपनी अलग पहचान बनाई।
17 अक्टूबर 1947 को पानीपत में जन्मे राजेंद्र गुप्ता इस साल 79 वर्ष के हो गए हैं। कुछ डेटाबेस उनकी जन्मतिथि पर अलग जानकारी भी देते हैं, लेकिन अधिकांश प्रमुख स्रोत 17 अक्टूबर 1947 ही दर्ज करते हैं।
उनका अभिनय के प्रति रुझान स्कूली दिनों से शुरू हुआ। सातवीं कक्षा में ‘महाराणा प्रताप’ नाटक में हिस्सा लेने के बाद मंच का आकर्षण उनके अंदर गहरा हो गया। बाद में वे दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े, जहाँ से उनकी कलात्मक तैयारी और मज़बूत हुई।
राजेंद्र गुप्ता का परिवार पानीपत में काफ़ी जाना-पहचाना था और उनके पिता जय भगवान दास व्यवसाय से जुड़े थे। लेकिन राजेंद्र गुप्ता ने पारिवारिक व्यवसाय के बजाय कला को अपना कारोबार चुना। एनएसडी से जुड़ने के बाद फ़िल्म ‘गांधी’ की दिल्ली शूटिंग में मिले अवसर ने उन्हें सिनेमा की ओर ले जाने में मदद की।
1985 में मुंबई पहुँचने के बाद उन्हें जल्दी काम मिलने लगा। ‘कहानी’ और ‘रजनी’ जैसे दूरदर्शन कार्यक्रमों से उनका टेलीविज़न सफ़र शुरू हुआ, लेकिन असली पहचान उन्हें 1990 के दशक की फ़ैंटेसी धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ से मिली। पंडित जगन्नाथ का किरदार उनके अभिनय का सबसे पहचाना चेहरा बन गया।
इसके बाद ‘साया’ में जगत नारायण और ‘चिड़ियाघर’ में बाबूजी जैसे किरदारों ने उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी दर्शकों तक पहुँचाया। यह भी कहा जाता है कि 1990 में उनका नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ, क्योंकि उन्होंने तब तक 40 से अधिक टेलीविज़न धारावाहिकों में काम किया था।
फ़िल्मों में राजेंद्र गुप्ता अक्सर सहायक भूमिकाओं में आए, पर उनके किरदार अक्सर कहानी की ज़मीन बन जाते थे। ‘लगान’ में उनका मुखिया वह चेहरा है, जो गाँव की परंपरा, सत्ता और संकोच का प्रतीक बनता है। यह फ़िल्म ऑस्कर में विदेशी भाषा की फ़िल्म श्रेणी के लिए नामांकित हुई थी।
‘पान सिंह तोमर’ में कोच मेजर रंधावा, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में राजेंद्र त्रिवेदी और ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’ में असलम जैसी भूमिकाओं ने दिखाया कि वे केवल एक ही तरह के बुज़ुर्ग किरदार नहीं हैं। उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी में ‘मिशन कश्मीर’, ‘गुरु’, ‘सेहर’, ‘बॉबी जसूस’ और ‘सूर्यवंशी’ जैसी फ़िल्में भी शामिल हैं।
राजेंद्र गुप्ता की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे किसी खेमे, प्रचार-तंत्र या फ़िल्मी सिफ़ारिश पर टिके नहीं। उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया है कि स्वयं की मार्केटिंग वे उतनी नहीं कर पाए, जितनी आज के उद्योग में ज़रूरी मानी जाती है। फिर भी उनका अभिनय इतना भरोसेमंद रहा कि दर्शक उन्हें भूलने की स्थिति में नहीं आए।
आज के ओटीटी युग में जहाँ कास्टिंग और विज़िबिलिटी का खेल तेज़ हो गया है, वहाँ जैसे अनुभवी कलाकारों को उतनी जगह कम मिल पाती है। राजेंद्र गुप्ता के साथ भी यही हुआ—काम की तारीफ़ होती रही, पर लगातार बड़े और अर्थपूर्ण किरदारों का सिलसिला उतना नहीं चला।
उम्र के इस पड़ाव पर भी वे मंच और साहित्य से जुड़े हुए हैं। वे शहर-शहर नाटक करते हैं और कविता-वाचन में अपनी आवाज़ देते हैं। उनकी गहरी, भारी और भावपूर्ण आवाज़ ने उन्हें केवल अभिनेता नहीं, बल्कि कविता सुनाने वाला कलाकार भी बना दिया है।
राजेंद्र गुप्ता का सफ़र यह बताता है कि अभिनय की असली पूँजी चेहरे की चमक नहीं, बल्कि किरदार को सच बना देने की क्षमता होती है। पंडित जगन्नाथ से लेकर ‘लगान’ के मुखिया तक, उन्होंने यही साबित किया है।
