नाना पाटेकर के जाने से सिनेमा ने एक विलक्षण कलाकार खोया है, लेकिन उनके साथ काम करने वालों के दिलों में वे अपने अभिनय से कहीं अधिक—अपने अपनत्व, अनुशासन और उदारता से जीवित रहेंगे। 8 अक्टूबर को उनके निधन की खबर ने उत्कर्ष शर्मा के उन संस्मरणों को और भी भावुक बना दिया, जो उन्होंने ‘वनवास’ में साथ बिताए समय के बारे में "हिमांशु राज़" से साझा किए।
उत्कर्ष के लिए नाना के साथ काम करना किसी सपने के सच होने जैसा था। जिस कलाकार को वे बरसों से परदे पर देखते और सराहते आए थे, उसके सामने अभिनय करते हुए मन में उत्साह के साथ झिझक भी थी। मगर नाना ने अपने कद का अहसास कराने के बजाय उन्हें सहज किया। उन्होंने उत्कर्ष के विचार सुने, उन्हें अपनी तरह से दृश्य समझने की जगह दी और अपने व्यवहार से भरोसा दिलाया कि वे संकोच छोड़कर किरदार में उतर सकते हैं।
फिल्म में उत्कर्ष के किरदार को कई दृश्यों में नाना के किरदार के प्रति कठोर होना था। मन में सवाल था—जिस कलाकार का इतना सम्मान हो, उसके सामने तीखा अभिनय कैसे करें? नाना ने उनकी झिझक मिटाते हुए कहा, “जो करना है करो, मुझे किरदार समझो।” उत्कर्ष के लिए वह बात केवल एक दृश्य की तैयारी नहीं थी; वह एक बड़े कलाकार का अपने सहकलाकार पर जताया गया विश्वास था। उस भरोसे ने उन्हें निडर होकर अभिनय करने का साहस दिया।
उत्कर्ष ने नाना में अभिनय की गहरी समझ के साथ अनुशासन और तैयारी भी देखी। उनके साथ बिताया हर दिन जैसे एक नया सबक था—भाव को भीतर से जीना, दृश्य के प्रति ईमानदार रहना और अपने सहकलाकार को भी खुलकर काम करने देना। लेकिन नाना की याद सिर्फ कैमरे और संवादों तक सीमित नहीं। सेट पर वे पूरी यूनिट के लिए खाना बनाते, सबको अपने हाथों से खिलाते थे। उत्कर्ष ने उनके हाथ का मिसल पाव भी चखा। इतने बड़े कलाकार का इस सहजता से सबके बीच बैठना—इसमें नाना का वह स्नेह झलकता था, जो पद या प्रसिद्धि से बड़ा था।
आज नाना साथ नहीं हैं, इसलिए उत्कर्ष के लिए ये पल और भी अनमोल हो गए हैं। दृश्य, संवाद और शूटिंग की यादों के साथ अब उनके मन में उस इंसान की छवि भी है, जिसने उन्हें भरोसा दिया, सिखाया और अपनापन दिया। नाना पाटेकर का जाना एक गहरी रिक्तता छोड़ गया है; मगर उनकी सीख और स्नेह उन लोगों के भीतर धड़कते रहेंगे, जिन्हें उन्होंने छुआ। उत्कर्ष के संस्मरणों में नाना अब केवल महान अभिनेता नहीं—एक ऐसे गुरु और अपनेपन से भरे इंसान हैं, जिनकी याद आंखें नम भी करती है और मन को कृतज्ञता से भर भी देती है।
