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नाना पाटेकर — एक अधूरी मुलाकात की स्मृति में

नाना पाटेकर — एक अधूरी मुलाकात की स्मृति में

नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक कलाकार का विदा होना नहीं है। यह हिंदी और मराठी सिनेमा के उस दौर का अंत है, जब अभिनय केवल अभिनय नहीं होता था—वह एक जुनून, एक उसूल और एक जिंदगी का दर्शन होता था। 75 वर्ष की आयु में गोवा के डोना पाउला स्थित निवास पर कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हुआ। डॉक्टरों ने लगभग 45 मिनट तक सीपीआर देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, पर सुबह 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
खबर सुनते ही मन ने मानने से इनकार कर दिया। नाना जाने वाले आदमी नहीं लगते थे। उनकी आवाज इतनी तेज थी, उनकी उपस्थिति इतनी दृढ़ कि लगता था जिंदगी भी उनसे बहस नहीं कर सकती। पर आज वही आवाज खामोश है। वही चेहरा, जो दशकों से परदे पर गूँजता रहा, अब सिर्फ स्मृतियों में बचा है। मुझे आज भी वह शाम याद है। वह मेरी नाना से आखिरी मुलाकात थी। मैं बनारस से एक सादा-सा अंगवस्त्रम—एक शॉल—लेकर गया था। एक छोटा-सा तोहफा। मन में सोचा था, इतने बड़े कलाकार को यह क्या लगेगा? जिनके नाम से फिल्में चलती थीं, जिनके एक डायलॉग पर थिएटर गूँज उठते थे, जिन्हें एक दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महंगे कलाकारों में गिना जाता था—उनके लिए एक साधारण शॉल क्या मायने रखेगी?
पर जैसे ही मैंने वह शॉल उनके कंधों पर रखी, उनके चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी उतर आई। वे मुस्कुराए और बोले—
“अच्छा हुआ हिमांशु, तुम शॉल दे दिए। दिल्ली में ठंड पड़ रही है, वहाँ काम आ जाएगी।”
इतनी सादगी। इतनी आत्मीयता। उस पल लगा ही नहीं कि मैं उस इंसान के सामने खड़ा हूँ, जिसके नाम से पूरी फिल्म इंडस्ट्री जानी जाती थी। उस पल वे कोई स्टार नहीं थे, कोई लीजेंड नहीं थे—वे बस नाना थे। एक ऐसे इंसान, जिसके चेहरे पर छोटे-से उपहार को देखकर जो खुशी आई, वह किसी अवॉर्ड से बड़ी लगी। उस दिन उन्होंने मुझे पूरा एक घंटा दिया। कोई जल्दबाजी नहीं, कोई मैनेजर का इशारा नहीं, कोई बाहर जाने की बेचैनी नहीं। पुराने दौर की बातें हुईं—‘गमन’ से शुरू हुआ सफर, ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘अंगार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘खामोशी’ और ‘अब तक छप्पन’ तक के किस्से। गुस्से, ईमानदारी और फकीरी के किस्से।
उन्होंने वह किस्सा भी सुनाया, जब किसी फिल्म को ‘हाँ’ न कहने पर पूरी इंडस्ट्री उनसे नाराज हो गई थी। वे बोले थे—“अगर मुझे काम पसंद नहीं, तो मैं क्यों करूँ?” इतना सीधा सवाल, पर उतना ही गहरा। उनके लिए अभिनय महज पैसा कमाने का जरिया नहीं था। वह उनकी पहचान थी, उनका उसूल था, उनकी आत्मा थी।
वह बातचीत बाद में बहुत चर्चित हुई, पर मेरे लिए वह महज इंटरव्यू नहीं था—वह एक पाठशाला थी। उसमें अभिनय के सबक नहीं थे, जिंदगी जीने के सबक थे। नाना जैसे कलाकार अपवाद स्वरूप होते हैं। वे हीरो नहीं थे; वे अभिनय थे। एक दौर था जब निर्माता उनके दरवाजे पर लाइन लगाते थे। उनका नाम सबसे महंगे कलाकारों में होता था, पर पैसे से बड़ा उनका उसूल था।
उनका सफर 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुआ था। फिर ‘परिंदा’ में अन्ना का किरदार उन्हें रातोंरात घर-घर पहुँचा गया। उस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। ‘क्रांतिवीर’ में उनके अभिनय को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 2013 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
पर नाना को सिर्फ अवॉर्डों से नापा नहीं जा सकता। उनका असली पुरस्कार वह डर था, जो उनके चरित्रों ने दर्शकों के दिल में पैदा किया; वह गुस्सा था, जो उनकी आवाज में गूँजता था; वह दर्द था, जो उनकी आँखों में बसता था। वे सिर्फ किरदार निभाते नहीं थे—वे उसमें उतर जाते थे।
नाना के बारे में एक बात बिल्कुल सच है—जिस पर दिल नाना का आ गया, वह नाना का हो गया। अगर वे आपके थे, तो आप ही के थे। न दिखावा, न दोहरा चरित्र। वे जैसे दिखते थे, वैसे ही थे—सीधे, सच्चे, कटु कभी-कभी, पर निःस्वार्थ हमेशा। कुछ दिन पहले ही उनका वह वीडियो आया था—बिना रुके 15 ट्राइसेप डिप्स, और अंत में कैमरे की ओर देखकर वही जानी-पहचानी शरारती मुस्कान। हमें लगा था, यह आदमी बूढ़ा होगा ही नहीं। वे ‘हाउसफुल 5’ कर रहे थे, विशाल भारद्वाज की ‘ओ रोमियो’ में पुलिस अफसर बन रहे थे, अनिल कपूर की ‘सूबेदार’ में कैमियो कर रहे थे। अभी तो बहुत कुछ बाकी था। मैंने आपसे वादा किया था कि अगली भेंट में कुछ अच्छे कुर्ते के कपड़े लाऊँगा। आप कुर्ते के शौकीन थे। आप खुद कहते थे कि साधारण कुर्ता-धोती पहनना पसंद है—जैसे आम किसान पहनते हैं। आपके घर में न नौकरों की भीड़ थी, न विलासिता का दिखावा। खुद रसोई में खड़े होकर खाना बनाना, पुणे के फार्महाउस में खेतों में काम करना, गाय-बैल और कुत्तों के साथ वक्त बिताना—यही आपकी दुनिया थी। रिपोर्ट्स के अनुसार पुणे के पास उनके लगभग 27 एकड़ के फार्महाउस में वे खेती करते थे और किसानों के साथ उपज बाँटते थे।
वे बॉलीवुड के शोर से दूर रहना चाहते थे। स्टारडम उनके लिए कभी मकसद नहीं था। वे फिल्मों में बड़े बने, पर जिंदगी में छोटे रहना पसंद करते थे। उनकी सादगी उनकी सबसे बड़ी विरासत थी।
दिलीप कुमार ने एक बार बारिश में आपको तौलिया पकड़ाया था। अमिताभ बच्चन ने चुपचाप अपनी शर्ट आपकी वैनिटी में छोड़ दी थी। आप कहते थे कि ये छोटे-छोटे एहसास किसी अवॉर्ड से ज्यादा कीमती होते हैं। और आप खुद भी ऐसे ही एहसास बाँटते चले गए।
कारगिल में सेना के साथ 60 दिन बिताए। क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा बने। शहीदों के परिवारों के लिए चंदा जुटाया। राजौरी में पाकिस्तानी गोलाबारी के पीड़ितों को राहत पहुँचाई। एक ऐसी 11 वर्षीय बच्ची की पढ़ाई का जिम्मा उठाया, जिसने अपने पिता को खो दिया था। ये सब वे काम थे, जो आपने बिना शोर किए।
आप कहते थे— “मेरी जरूरतें सीमित हैं। अगर आपके पास इतना पैसा है जिसका इस्तेमाल आप नहीं करेंगे, तो किसी जरूरतमंद को दे देना समझदारी है।” यह बात सिर्फ एक कथन नहीं थी। यह आपकी जिंदगी का दर्शन था। आपने पैसा कमाया, पर पैसे को कभी अपना मालिक नहीं बनने दिया। आपने नाम कमाया, पर नाम को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया। आपने दर्शकों को दिया, समाज को दिया, सेना को दिया, बच्चों को दिया—और बदले में कुछ नहीं माँगा।
आज वह कुर्ते का कपड़ा मेरे बैग में रखा है, पर उसे लेने वाला हाथ नहीं रहा। नाना, आपका वह वादा भी अधूरा रह गया कि अगली बार आप खुद रसोई में खड़े होकर मुझे पाव भाजी बनाकर खिलाएँगे। वह रसोई अब हमेशा खाली लगेगी। वह कुर्सी अब हमेशा सूनी लगेगी। वह मुस्कान, जो आपके चेहरे पर छोटी-सी शॉल देखकर आती थी, अब सिर्फ यादों में बचेगी। नाना हमारे बीच नहीं रहे। यह बड़ा नुकसान है—बहुत बड़ा नुकसान। इसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता, क्योंकि नाना दोबारा नहीं बनते। नाना एक थे। अलग थे। अपवाद थे। वह आग, जो ‘क्रांतिवीर’ में थी; वह सादगी, जो सेना के जवानों के लिए चंदा इकट्ठा करते समय थी; और वह अपनापन, जो एक छोटी-सी शॉल देखकर उनके चेहरे पर उतर आया था—सब आज एक साथ चला गया।
आखिरी सलाम, नाना..आपने कहा था कि दिल्ली में ठंड है, शॉल काम आएगी। आज पूरा हिंदुस्तान आपके बिना ठंडा पड़ गया है।आपकी आवाज अब स्क्रीन से गूँजेगी नहीं, पर हमारी स्मृतियों में हमेशा बची रहेगी। आपके किरदार अब नए सिरे से नहीं बनेंगे, पर हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे। आपकी सादगी अब हमारे लिए एक सबक है, आपकी ईमानदारी हमारे लिए एक मिसाल है, और आपका अभिनय हमारे लिए हमेशा एक प्रेरणा रहेगा। नाना, आप चले गए, पर आपकी छाप हमेशा रहेगी। आपकी आवाज हमेशा गूँजेगी। आपकी मुस्कान हमेशा याद रहेगी। और वह शॉल, जो मैंने आपको दी थी—वह अब सिर्फ कपड़ा नहीं है। वह एक स्मृति है, एक एहसास है, एक अधूरी मुलाकात है। फिर से दोहराते है कि नाना, आप दोबारा नहीं बनते। आप एक थे। अलग थे। अपवाद थे। और हमेशा रहेंगे।