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समुद्र की लहरों से लेकर सिनेमा की ऊँचाइयों तक: नाना पाटेकर की अनकही दास्तान

समुद्र की लहरों से लेकर सिनेमा की ऊँचाइयों तक: नाना पाटेकर की अनकही दास्तान

मुरुड-जंजिरा के उस तटीय गाँव में, जहाँ नन्हे विश्वनाथ पाटेकर ने लोरियों की बजाय लहरों की आवाज़ सुनी थी, एक ऐसे इंसान का जन्म हुआ जो बाद में भारतीय सिनेमा के सबसे धारदार चेहरों में शुमार हुआ। नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ़ फ़िल्मों की नहीं, बल्कि एक ऐसे संघर्ष की गाथा है जिसने उन्हें भीतर से तोड़ा, मगर बाहर से लोहे जैसा मज़बूत बनाया।
नाना का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के मुरुड-जंजिरा में हुआ था। उनका असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था, मगर माँ की एक करीबी सहेली उन्हें प्यार से 'नाना' बुलाती थीं—और यही नाम ज़िंदगी भर चिपक गया। नाना ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुरुड नगर परिषद प्राथमिक स्कूल नंबर 4 में पहली से चौथी कक्षा तक पूरी की। बाद में वे मुंबई चले गए, जो मुरुड से लगभग 120-130 किलोमीटर दूर है। एक इंटरव्यू में नाना ने याद किया था, आज हम सी-फेस पर रहने का दावा करते हैं; मैं बचपन में समुद्र के सामने रहता था, जहाँ मुझे लोरियों की नहीं, लहरों की आवाज़ सुनाई देती थी—जिसे हम मराठी में 'गाज' कहते हैं।
उनका बचपन एक किराए के घर में बीता, जो नाज़िरा अन्वरी और निआमत साहब का था। नाना कहते थे, मैंने कभी हिंदू और मुस्लिम का फ़र्क नहीं जाना। यह वह माहौल था जहाँ धर्म से ऊपर इंसानियत थी—और शायद यही वजह थी कि नाना की फ़िल्मों में भी हमेशा सामाजिक न्याय की आवाज़ गूँजी।
नाना के पिता गजानंद पाटेकर कपड़े के कारोबार से जुड़े थे और मुंबई में रहते थे। परिवार मध्यम वर्ग का था, मगर जब नाना तेरह साल के थे, तब एक ऐसा हादसा हुआ जिसने सब कुछ पलट दिया। एक करीबी व्यक्ति ने उनके पिता के साथ धोखाधड़ी की और रातोंरात सारा कारोबार डूब गया। सारी जायदाद बिक गई। नाना को स्कूल के बाद कमाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा। वे सुबह स्कूल जाते और शाम को चुनाभट्टी तक आठ किलोमीटर पैदल चलकर फ़िल्मों के पोस्टर रंगते। एक महीने में उन्हें सिर्फ़ 35 रुपये मिलते थे और कभी-कभी एक वक़्त का खाना। पैसों की इतनी तंगी थी कि कई बार खाने को भी नहीं मिलता था। नाना ने खुद कहा था, भूख ने मुझे अभिनय करना सिखाया।
बचपन में नाना बेहद शरारती थे—इतने शरारती कि उनके टीचर्स ने उन्हें अपने पास बिठा लिया ताकि बार-बार उठकर सज़ा न देनी पड़े। सातवीं कक्षा में वे इतने बदमाश हो गए कि उन्हें मुंबई अपनी मौसी के घर भेज दिया गया। एक साल बाद मौसी ने उन्हें वापस मुरुड भेज दिया, क्योंकि उनके बच्चे मेरे प्रभाव में खराब हो रहे थे। यह वही नाना थे जो बाद में पर्दे पर सबसे गंभीर और तीव्र किरदार निभाएंगे। शरारत से गंभीरता तक का यह सफ़र शायद उसी भूख और अपमान की देन था जिसने उन्हें भीतर से बदल दिया।
नाना की माँ निर्मला पाटेकर का देहांत जनवरी 2019 में 99 वर्ष की उम्र में हुआ था। नाना ने हमेशा कहा, मैंने अभिनय अपनी माँ से सीखा। मैंने सब कुछ अपनी माँ से सीखा। यह वाक्य छोटा ज़रूर है, मगर इसके पीछे एक ऐसी माँ की कहानी है जिसने अपने पाँच बच्चों को खोया, माता-पिता को सामने ही विदा किया, पति को खोया और भाई का सरेआम एनकाउंटर देखा। नाना के लिए निर्मला सिर्फ़ घर की मुखिया नहीं थीं—वह जीवन को देखने का उनका पहला नज़रिया थीं। यही वजह थी कि नाना की परवरिश मुंबई की बजाय मुरुड में हुई। माँ नहीं चाहती थीं कि बेटा अपने ननिहाल के माहौल में पले-बढ़े, जहाँ अंडरवर्ल्ड का साया मंडराता था।
1978 में नाना ने नीलकांति से शादी की, जो रंगमंच अभिनेत्री थीं और बैंक में नौकरी करती थीं। नाना को एक शो के लगभग 50 से 75 रुपये मिलते थे, जबकि नीलकांति की बैंक की नौकरी से लगभग 2,500 रुपये महीना आता था। जब नाना ने विज्ञापन की नौकरी छोड़कर पूरी तरह थिएटर को अपनाने का फैसला किया, तो नीलकांति ने उन्हें आर्थिक सुरक्षा दी। नाना ने कहा भी कि वह जो कुछ हैं, उसमें नीलकांति का बड़ा योगदान है। लेकिन सफलता आने से पहले उनके जीवन में एक ऐसा दुख आया जिसका असर शायद उम्र भर रहा।
नाना और नीलकांति का पहला बेटा दुर्वासा जन्म से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा था। वह ढाई साल का था जब उसकी मृत्यु हो गई। वर्षों बाद नाना ने इस बारे में जो स्वीकार किया, वह उनकी निजी ज़िंदगी की सबसे कठोर आत्मस्वीकृतियों में से एक है। उन्होंने माना कि बच्चे की हालत से परेशान होने के साथ-साथ उनके मन में यह डर भी रहता था कि लोग उनके बेटे को देखकर क्या कहेंगे। बाद में उन्हें लगा कि उस समय उन्हें दुनिया की नज़र नहीं, अपने बच्चे का दर्द देखना चाहिए था। दुर्वासा की मृत्यु के बाद नाना ने ख़ुद को धुएँ में डुबो दिया। उन्होंने बताया था कि वह एक दिन में लगभग 60 सिगरेट पीने लगे थे। फिर उनकी बहन ने उन्हें लगातार खाँसते देखा और एक ऐसा सवाल किया जिसने उनकी आदत छुड़ा दी। वह ख़ुद अपना इकलौता बेटा खो चुकी थीं।
नाना के दूसरे बेटे मल्हार ने पिता की तरह अभिनेता बनने के बजाय सिनेमा के दूसरे हिस्से को चुना। नाना ने बताया था कि उसने न्यूयॉर्क में सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन की पढ़ाई की। पिता उसे अपनी छाया में अभिनेता बनाना नहीं चाहते थे। वह चाहते थे कि बेटा अपना रास्ता ख़ुद चुने। दोनों के रिश्ते में दोस्ती भी थी और पिता का दबदबा भी। नाना पाटेकर से मिलना हो, उनसे बात करनी हो, हर काम मल्हार ही किया करते थे। दुर्वासा ढाई साल की उम्र में चला गया था। मल्हार ने पिता के साथ चार दशक से अधिक की ज़िंदगी देखी और दुनिया को उनके जाने की ख़बर भी उसी ने दी। इन दोनों बेटों के बीच नाना की पूरी पितृत्व-कथा दिखाई देती है।
नाना के करियर में स्मिता पाटिल का नाम अहम रहा। नाना ने खुद कहा था, स्मिता पाटिल वह वजह थीं जिससे मैं फ़िल्मों में आया। वे मुझे बार-बार कहती थीं कि फ़िल्मों में आ जाओ, मगर मैं कहता था कि मुझे थिएटर में ख़ुशी मिलती है, मुझे फ़िल्में पसंद नहीं। बाद में नाना ने स्वीकार किया था, आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि शायद मुझे फ़िल्में नापसंद नहीं थीं। शायद मैंने सोचा था कि मुझे कौन फ़िल्मों में लेगा? मुझे लगता है कि यह एक कॉम्प्लेक्स था।
नाना की फ़िल्मों में 'परिंदा' का क्लाइमेक्स बेहद मशहूर है, जहाँ उनका किरदार आग में जलता है। मगर क्या आप जानते हैं कि यह सीन असली में शूट हुआ था? नाना ने खुद बताया था कि क्लाइमेक्स के दौरान वे बुरी तरह जल गए थे। यह वही नाना थे जो पर्दे पर गुस्से और ताकत की मिसाल थे, मगर असल ज़िंदगी में वे उस आग में झुलस रहे थे जो उनके भीतर सुलग रही थी।
'क्रांतिवीर' नाना के करियर की सबसे यादगार फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। यह वही दौर था जब नाना पर्दे पर सामाजिक न्याय की आवाज़ बने और उनके डायलॉग्स लोगों के दिलों में उतर गए। नाना को कुल तीन बार राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला—'क्रांतिवीर', 'परिंदा' और 'नटसम्राट' के लिए। 2013 में उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया।
नाना ने नाम फाउंडेशन के ज़रिये महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों के लिए बहुत काम किया। फ़िल्म 'प्रहार' के निर्देशन व इसमें अभिनय से पहले उन्होंने बाक़ायदा भारतीय सेना के साथ रहकर कमांडो ट्रेनिंग ली। और, इस ट्रेनिंग का उपयोग उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस की अनुमति से क्विक रिएक्शन टीम में शामिल होकर किया। यह वही नाना थे जो पर्दे पर गुस्से और ताकत की मिसाल थे, मगर असल ज़िंदगी में वे किसानों के दर्द को समझते थे और देश के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करते थे।
नाना और नीलकांति का रिश्ता भी समय के साथ बदलता गया। दोनों अलग रहने लगे, लेकिन तलाक नहीं लिया। नाना ने कहा था कि उनके बीच मतभेद हैं, इसलिए वे साथ नहीं रहते, लेकिन एक-दूसरे की परवाह करते हैं। नीलकांति, मल्हार और नाना की माँ साथ रहते रहे, और नाना अलग। इसी दौर में फ़िल्म 'ख़ामोशी: द म्यूज़िकल' की शूटिंग के दौरान मनीषा कोइराला नाना के क़रीब आईं। नाना ने ख़ुद स्वीकार किया था कि दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता बना था और मनीषा उनकी माँ और बेटे से भी मिलती भी थीं। बाद में यह रिश्ता आगे नहीं चला, लेकिन नाना ने मनीषा के प्रति सम्मान बनाए रखा।
'नटसम्राट' नाना के करियर की सबसे भावुक फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में उन्होंने एक बुज़ुर्ग रंगमंच कलाकार की भूमिका निभाई थी जो अपने परिवार से दूर हो जाता है। यह फ़िल्म नाना की अपनी ज़िंदगी से काफी मिलती-जुलती थी—एक ऐसा इंसान जो पर्दे पर सब कुछ देता है, मगर निजी ज़िंदगी में अकेला रह जाता है। नाना ने इस फ़िल्म के लिए अपना तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। यह वही नाना थे जो पर्दे पर रोते थे, मगर असल ज़िंदगी में अपने दर्द को छुपाते थे।
नाना पाटेकर को याद करते हुए उनके किरदारों की लंबी सूची गिनाना आसान है—'अंकुश', 'परिंदा', 'प्रतिघात', 'क्रांतिवीर', 'ख़ामोशी', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन', 'नटसम्राट'। इन फ़िल्मों में उनके ऐसे इंसानों के किरदार हैं जो भीतर से घायल हैं और बाहर से लड़ रहे हैं। नाना की अपनी ज़िंदगी में भी लड़ाई बाहर से कम, भीतर से ज़्यादा थी। दुनिया ने उनके अभिनय में ग़ुस्सा देखा। लेकिन उस ग़ुस्से के पीछे शायद एक ऐसा इंसान था, जो पूरी उम्र अपने अतीत से हिसाब करता रहा। और उस हिसाब की सबसे बड़ी गवाही कोई फ़िल्म नहीं, उनका अपना जीवन था।
नाना ने एक बार कहा था, मैं अभिनेता से ज़्यादा अच्छा कुक हूँ। यह वही नाना थे जो पर्दे पर गुस्से और ताकत की मिसाल थे, मगर असल ज़िंदगी में वे सादगी और इंसानियत की मिसाल थे। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि भूख और अपमान इंसान को तोड़ सकते हैं, मगर अगर इरादे मज़बूत हों तो वही भूख और अपमान इंसान को सबसे बड़ा कलाकार भी बना सकते हैं।आठ अक्टूबर 2026 की सुबह जब नाना ने अंतिम साँस ली, तो भारतीय सिनेमा ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया। मल्हार ने पिता के निधन की जानकारी दी और पूरा देश शोक में डूब गया। नाना पाटेकर अब नहीं रहे, मगर उनकी फ़िल्में, उनके किरदार और उनका संघर्ष हमेशा याद रखा जाएगा।