आज सिनेमाघरों में उतरी ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक कोशिश है—बिहार के घने जंगल, वनदेवी की लोककथा और छठ पूजा के भावनात्मक संदर्भ को बड़े पर्दे पर उतारने की। एकता कपूर के प्रोडक्शन और ‘पंचायत’ फेम दीपक कुमार मिश्रा व अरुणभ कुमार के निर्देशन में बनी इस सुपरनैचुरल थ्रिलर में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया मुख्य भूमिका में हैं। मगर फिल्म अपने बड़े-बड़े विचारों और कई жанरों के मिश्रण के बीच कहानी कहीं रास्ता भटक जाती है।
फिल्म की रीढ़ में मुंबई में रहने वाला दंपति ऋषि और ममता है। एक दर्दनाक दुर्घटना और मिसकैरेज के बाद दोनों अपने गाँव लौटते हैं, जहाँ एक वर्जित जंगल की पौराणिक मान्यताएँ उनका इंतज़ार कर रही होती हैं। ऋषि एक तर्कवादी इंजीनियर है, जो हर चीज़ को विज्ञान की कसौटी पर देखता है, जबकि ममता की आस्था—खासकर छठ और वनदेवी से जुड़ी—कहानी को आगे बढ़ाती है। इसी टकराव के ज़रिए फिल्म आस्था और अंधविश्वास, आधुनिकता और परंपरा, प्रकृति और देवत्व के द्वंद्व को छूती है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोककथाई दुनिया है। भारतीय लोककथा पर आधारित यह कहानी बॉलीवुड में ताज़ा अनुभव देती है। जंगल, वनदेवी, भूतक्का जैसे तत्व एक अलग माहौल बनाते हैं, जो दर्शक को शुरुआत से ही बाँधे रखते हैं। छठ पूजा, लोकगीत और क्षेत्रीय संस्कृति का समावेश फिल्म की सबसे चर्चित खासियत बना है। नदी किनारे दीये, महिलाओं के सामूहिक गीत और आस्था का वह शुद्ध रूप स्क्रीन पर एक अलग ही ऊर्जा लाता है, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है।
विजुअल्स और वर्ल्ड-बिल्डिंग के मामले में भी फिल्म काफ़ी हद तक सफल रही है। जंगल की सेटिंग, कुछ वीएफएक्स और मिथकीय तत्वों की प्रस्तुति बड़े पर्दे पर असरदार लगती है। अभिनय की बात करें तो सिद्धार्थ और तमन्ना दोनों ने ईमानदार प्रदर्शन दिया है। तमन्ना के चरित्र में भक्ति और भावनात्मक गहराई कई जगहों पर फिल्म को सहारा देती है, जबकि सिद्धार्थ का तर्कवादी रवैया कहानी के द्वंद्व को मज़बूत बनाता है।
खास बात यह कि फिल्म में सुनील ग्रोवर के किरदार की जमकर तारीफ हो रही है। समीक्षक और दर्शक दोनों उनके प्रदर्शन को फिल्म का एक प्रमुख आकर्षण बता रहे हैं। सुनील ग्रोवर ने अपने किरदार में जो हास्य और गंभीरता का संतुलन बनाया है, वह फिल्म के कई पलों को हल्का करता है और दर्शकों को बाँधे रखता है।
मगर फिल्म वहीं फिसलती है, जहाँ उसे सबसे ज़्यादा संभलना चाहिए था—दूसरे हाफ में। अधिकांश समीक्षाओं में एक सुर साफ़ है—पहला हाफ आकर्षक है, पर दूसरा हाफ उलझन, टोन-शिफ्ट और अतिरिक्त आइडियाज़ के बोझ से लड़खड़ाता है। हॉरर-फोक-थ्रिलर से अचानक कॉमेडी और एक्शन की ओर झुकाव कहानी के तनाव को कमजोर करता है। कई पात्र, कई उपकथाएँ और कई थीम एक साथ थोप देने से केंद्रीय रहस्य धुंधला हो जाता है। क्लाइमेक्स और समाधान की बात करें तो अंत कई समीक्षकों को असंतोषजनक या जल्दबाजी में निपटाया हुआ लगा।
कल्पना कीजिए दो पात्र—एक शहरी तर्कवादी और एक गाँव की आस्थावान महिला—जंगल के किनारे खड़े हैं। पहला कहता है, “यह सब अंधविश्वास है,” दूसरी जवाब देती है, “जंगल की आवाज़ सुनो, वनदेवी जागती है।” फिल्म का पहला हाफ इसी संवाद की तरह चलता है—रहस्य, डर, आश्चर्य। पर जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, निर्देशक कई आवाज़ें एक साथ बुलंद कर देते हैं: कॉमेडी, एक्शन, मिथक, रोमांस। नतीजा? जंगल तो दिखता है, पर कहानी रास्ता भूल जाती है।
छठ के दृश्य और लोकगीत उस मोड़ की तरह हैं जहाँ दर्शक फिर से जुड़ता है—यहाँ फिल्म अपनी जड़ों से बात करती है और सबसे ज़्यादा असर छोड़ती है। पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते कई सवाल अधूरे या जल्दी सुलझाए लगते हैं, जिससे दर्शक संतुष्टि के बजाय उलझन महसूस करता है।
‘द वन’ एक साहसिक प्रयोग है जो भारतीय लोककथा, छठ और जंगल-देवत्व को मुख्यधारा में लाता है—और यहीं इसकी ताकत है। पर टोन का उतार-चढ़ाव, भीड़भाड़ वाला स्क्रीनप्ले और असंतोषजनक अंत इसे पूरी तरह सफल नहीं होने देते। अगर आप लोककथाई माहौल, छठ के भाव और बड़े पर्दे के विजुअल्स के लिए जाएँगे, तो फिल्म निराश नहीं करेगी; अगर आप कसी हुई कहानी और सुस्पष्ट क्लाइमेक्स चाहते हैं, तो उम्मीदें संभालकर जाएँ।
