मुंबई के दही हांडी मंच पर परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक के मराठी में बोलने के आग्रह पर संजय दत्त ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि वे छह साल येरवडा जेल में रहे, तब भी मराठी नहीं सीख पाए। इसी टिप्पणी ने महाराष्ट्र में चल रहे ‘मराठी अनिवार्यता’ विवाद को नया मोड़ दे दिया और सवाल खड़े कर दिए कि भाषा नीति का दबाव सिर्फ टैक्सी-ऑटो चालकों पर क्यों है, सेलिब्रिटीज़ पर नहीं।�
ठाणे के दही हांडी कार्यक्रम में मंत्री प्रताप सरनाइक ने संजय दत्त से मराठी में बात करने का आग्रह किया, जिस पर संजय दत्त ने माइक संभालकर जवाब दिया कि वे छह साल येरवडा जेल में रहे, फिर भी मराठी पूरी तरह नहीं सीख सके, हालांकि उन्होंने थोड़ी-बहुत मराठी आती होने की भी बात कबूल की। मंच पर उपस्थित शिवसेना नेता हंसे और माहौल हल्का रहा, लेकिन यही हंसी बाद में ‘दोहरे मापदंड’ की बहस का केंद्र बनी।
यह टिप्पणी उसी समय आई जब महाराष्ट्र सरकार ने टैक्सी और ऑटो-रिक्शा चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने की नीति लागू की थी और चालकों को 15 अगस्त तक डेडलाइन दी गई थी। बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता ने तुरंत सवाल उठाया कि एक कलाकार मराठी नहीं जानता तो आप हंसते हैं, लेकिन आम ऑटो-टैक्सी चालकों पर मराठी थोपते हैं और धमकाते हैं। इसी संदर्भ में वह पंक्ति प्रभावी लगती है कि मराठी के नाम पर जोर सिर्फ टैक्सी वालों पर चलता है, जो जनमानस में चल रही नाराज़गी को शब्द देती है।
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने बाद में स्पष्ट किया कि भाषा की राजनीति नहीं होनी चाहिए और गैर-मराठी बोलने वालों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। विवाद बढ़ने पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कार्रवाई स्थगित कर चालकों को एक वर्ष का ग्रेस पीरियड देने का ऐलान किया, ताकि वे इस दौरान मराठी सीख सकें और दंडित न हों। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी मराठी अनिवार्यता के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के बाद मामले को इसी ग्रेस पीरियड के मद्देनज़र निपटाया।
विवाद के बाद इंटरनेट पर संजय दत्त का एक पुराना वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वे धाराप्रवाह मराठी बोलते नज़र आते हैं, जिससे बहस और पैचीली हुई कि मंच पर दिया गया जवाब मज़ाक था या वास्तविक स्थिति। संजय दत्त की टिप्पणी ने महाराष्ट्र की भाषा-नीति की उस नस पर हाथ रख दिया, जहां आम नागरिक और सेलिब्रिटी के लिए अलग-अलग मानदंड लागू होते दिखते हैं। चाहे मंच पर हंसी-मज़ाक रहा हो, बहस अब सरकारी नीति की निष्पक्षता और कार्यान्वयन के तरीके पर केंद्रित हो गई है।
