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मीना कुमारी : ज़ब महजबीन बनी फिल्मों का सितारा

मीना कुमारी : ज़ब महजबीन बनी फिल्मों का सितारा

मुम्बई के दादर स्टेशन पूर्व में एक भीड़भाड़ वाली सड़क है, जिसका नाम है—दादा साहेब फाल्के रोड। जहाँ इलेक्ट्रॉनिक दुकानों से लेकर कपड़े, लुंगी और लस्सी तक बिकती नज़र आती है। इसी सड़क पर कभी बड़े-बड़े फिल्म स्टूडियो हुआ करते थे, जिनमें रणजीत और रूपतारा स्टूडियो के अवशेष आज भी खड़े हैं।
हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का राज है। दादर स्टेशन के पास वाली सड़क, जिसे आज दादा साहेब फाल्के रोड के नाम से जाना जाता है, तब नैगम क्रॉस रोड कहलाती थी। रूपतारा स्टूडियो के आगे फिल्मी कलाकारों की गाड़ियाँ आकर रुका करती हैं। स्टूडियो के सामने दो मंजिला एक पुरानी, बेरंग इमारत खड़ी है, जिसका नाम है- मीतावाला चॉल। इसमें ज़्यादातर परिवार किराए पर रहते हैं। इन्हीं परिवारों में एक परिवार है मास्टर अली बख़्श और इक़बाल बेगम का। 

मास्टर अली बख़्श फिल्म और नाटक कंपनियों में हारमोनियम बजाते हैं। वह लाहौर से संगीतकार बनने का ख़्वाब लेकर मुम्बई आए हैं। मुम्बई की कृष्णा फिल्म कंपनी के म्यूजिक डिपार्टमेंट में काम करते हुए उनकी आँखें मेरठ से आई एक क्रिश्चियन डांसर से चार होती हैं। तीखे नैन-नक्श वाली उस डांसर पर अली बख़्श फ़िदा हो जाते हैं। 

हालाँकि अली बख़्श पहले से शादीशुदा हैं और उनकी पहली पत्नी लाहौर के पास अपने गाँव में रहती हैं, लेकिन वह उस क्रिश्चियन लड़की प्रभावती से दूसरी शादी कर लेते हैं। वह क्रिश्चियन लड़की इस्लाम कबूल करके प्रभावती से इक़बाल बेगम बन जाती है। दोनों फिल्म कंपनी में काम करते हुए मुफ़लिसी में ज़िंदगी काट रहे हैं। उनकी पहली औलाद बेटी होती है। अली बख़्श लड़का चाहते हैं, लेकिन पहली औलाद को ख़ुदा की नेमत मानकर स्वीकार कर लेते हैं। 

जब इक़बाल बेगम दूसरी बार गर्भवती होती हैं तो अली बख़्श बेटे की चाह में माहिम दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। सेहतमंद बेटे की आस में वह अपनी बीवी को किशमिश और छुहारे खिलाते हैं। जब इक़बाल बेगम प्रसव पीड़ा से तड़पने लगती हैं तो अली बख़्श उन्हें ताँगे पर बिठाकर परेल में डॉ. गाडरे के क्लिनिक ले जाते हैं। अगले दिन, 1 अगस्त 1933 को इक़बाल बेगम दूसरी बार एक बच्ची को जन्म देती हैं। 

बेटे की चाह में बैठे अली बख़्श जब बेटी पैदा होने की ख़बर सुनते हैं तो उनके ऊपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ता है। सात दिन बाद इक़बाल बेगम अपनी नवजात बच्ची को लेकर मीतावाला चॉल लौटती हैं। लेकिन अली बख़्श अपनी नवजात औलाद का मुँह तक नहीं देखते। उन्हें लगता है कि यह दूसरी औलाद बेटी नहीं, बल्कि एक बला है, जो उनकी ज़िंदगी तबाह करने आई है।
इक़बाल बेगम के समझाने पर भी पिता अपनी बेटी के चेहरे तक को नहीं देखते। उन्हें अपने ख़ुदा से शिकायत है—बेटे के बदले उन्हें बेटी क्यों दी गई? 

रात को इक़बाल बेगम अपनी नवजात बच्ची के साथ सो रही हैं। अचानक आधी रात को उनकी नींद खुल जाती है। वह बिस्तर पर हाथ टटोलकर देखती हैं तो वहाँ बच्ची नहीं है। बेगम घबराकर उठती हैं और लैम्प जलाकर देखती हैं। बड़ी बेटी खुर्शीद बाप के बिस्तर पर सो रही है, लेकिन नवजात बच्ची और अली बख़्श दोनों गायब हैं। 
इक़बाल बेगम का आशंका से दिल धड़कने लगता है। वह कमरे से बाहर निकलती हैं तो देखती हैं कि लंबी बालकनी में अली बख़्श खड़े होकर बीड़ी पी रहे हैं। बेगम भागती हुई उनकी तरफ आती हैं और पूछती हैं, “मेरी बेटी कहाँ है?”
अली बख़्श ख़ामोशी से बीड़ी पीते रहते हैं। 

बेगम गुस्से में काँपते हुए फिर पूछती हैं, मेरी बेटी कहाँ है? बता रहे हो या मैं चिल्लाकर पूरे चॉल को जगा दूँ? 

अली बख़्श अपनी बीवी की तरफ एक नज़र देखते हैं और कहते हैं, यतीमखाने की सीढ़ियों पर छोड़कर आया हूँ।
यह सुनते ही बेगम बावली होकर भागना शुरू कर देती हैं, लेकिन वह इतनी कमज़ोर हो चुकी हैं कि पाँच-छह कदम के बाद ही लड़खड़ाकर बालकनी में बेहोश होकर गिर पड़ती हैं। 

बेगम को जब होश आता है तो देखती हैं कि उनकी नवजात बेटी उनके पास सो रही है। उसके चेहरे और बदन पर छोटे-छोटे लाल दाग पड़े हुए हैं। पास ही अली बख़्श बैठे हैं। 

बेगम घबराकर पूछती हैं, ये मेरी बच्ची को क्या हुआ, मास्टरजी?
अली बख़्श शर्मिंदगी महसूस करते हुए कहते हैं, बेगम, तुमने मेरे हाथों बहुत बड़े गुनाह से बचा लिया। जब तुम बालकनी में बेहोश होकर गिर पड़ीं तो मैंने तुम्हें फ़ौरन कमरे में लाकर बिस्तर पर लिटाया और फिर भागते हुए यतीमखाने पहुँचा। हमारी बेटी यतीमखाने की सीढ़ियों पर पड़ी घुटी हुई आवाज़ में रो रही थी। अल्लाह का शुक्र है कि किसी आवारा कुत्ते की नज़र उस पर नहीं पड़ी। जब मैंने उसे गोद में उठाया तो पाया कि हमारी नन्ही जान के बदन को लाल चींटियों ने घेर रखा है। मैंने अपने अंगोछे से उसके बदन की चींटियों को साफ किया। 

बेगम की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह कहती हैं, अगर मेरी नींद नहीं खुलती तो रात भर में हमारी बच्ची को चींटियाँ खा डालतीं।  अली बख़्श अपने गुनाह के लिए बार-बार माफ़ी माँगते हैं। बेगम का नर्म दिल उन्हें माफ़ कर देता है। इस बच्ची का नाम रखा जाता है- महजबीन । 

महजबीन बहुत ख़ूबसूरत और संजीदा लड़की के रूप में बड़ी होने लगती है। उसके घर के सामने रूपतारा स्टूडियो है और बीच की सड़क ही उन बच्चों के लिए खेलने का मैदान है। महजबीं अपने दोस्तों के साथ रूपतारा फिल्म स्टूडियो के सामने मोटरगाड़ियाँ देखने के लिए खड़ी हो जाती है। उन मोटरगाड़ियों में फिल्मी दुनिया के लोग अक्सर आते-जाते हैं।

वह फिल्म स्टूडियो महजबीन के लिए एक जादू का पिटारा है, जिसमें बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ अंदर जाकर अचानक ग़ायब हो जाती हैं। गेटकीपर स्टूडियो के गेट तक बच्चों को फटकने नहीं देता।

एक दिन महजबीन स्टूडियो गेट पर बैठे पठान के लिए माँ के हाथ के बनाए हुए गर्म-गर्म पकौड़े लेकर जाती है और कहती है, अंकल, माँ ने आपके लिए पकौड़े बनाए हैं। खा लो। पकौड़े खाने के बाद पठान मुस्कुराकर कहता है, मेरा बच्चा, तुझे अंदर जाना है? वह हाँ में गर्दन हिलाती है।
पठान उसे अंदर जाने देता है और कहता है,  किनारे चुपचाप खड़े होकर फिल्मी सितारों को देखना। 

महजबीन अंदर चली जाती है। वहाँ वह गाड़ियाँ, ताँगे और दुकानों के सेट देखती है। कुछ औरतें साड़ियाँ पहनकर इधर-उधर घूम रही हैं। अचानक अंदर एक गाड़ी आकर रुकती है। उसमें से एक लंबा-चौड़ा, गोरा फिल्मी सितारा उतरता है। महजबीन उसे पहचान लेती है। उसने उसे फिल्म ‘सीता’ के पोस्टर पर देखा है। उस स्टार का नाम है- पृथ्वीराज कपूर।

अली बख़्श अपनी बड़ी बेटी खुर्शीद को फिल्म की शूटिंग के लिए स्टूडियो ले जाते हैं, लेकिन उससे घर का खर्च नहीं चल पाता। चार साल की महजबीन को अली बख़्श सोहराब मोदी के स्टूडियो मिनर्वा टॉकीज ले जाते हैं, जहाँ फिल्म ‘जेलर’ की कास्टिंग हो रही है। कमाल अमरोही उसके स्क्रिप्ट राइटर हैं। उन्हें चार-पाँच साल की एक लड़की की ज़रूरत है।
कमाल साहब पाँच साल की महजबीन को देखते हैं। उससे कुछ सवाल करते हैं। महजबीन अपनी मासूमियत और बातूनी अंदाज़ में उनके सवालों के जवाब देती है। लेकिन उसका चुनाव फिल्म के लिए नहीं होता। 

एक दिन इक़बाल बेगम अपनी बेटी महजबीन को लेकर मुम्बई के अंधेरी ईस्ट में स्थित प्रकाश स्टूडियो पहुँचती हैं। वह निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट से अपनी बेटी के बारे में बात करती हैं। महजबीन इतनी बातूनी और चंचल है कि विजय भट्ट उसके साथ दो फिल्मों का कॉन्ट्रैक्ट कर लेते हैं।
1939 में महजबीं की दो फिल्में-‘लेदर फेस’ और ‘अधूरी कहानी’- रिलीज़ होती हैं। 

पाँच साल की उम्र से ही महजबीन पाँच सदस्यों वाले अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठाने लगती है। अली बख़्श के हाथों में रुपये आने लगते हैं। ज़रूरत के साथ रुपये की अहमियत भी बढ़ती जाती है।
दादर की वह छोटी-सी खोली छूट जाती है। परिवार बांद्रा में एक छोटा-सा पुराना बंगला खरीद लेता है, जिसका नाम रखा जाता है- इक़बाल मैन्शन। 

महजबीन से दुनिया, मर्द जात और हालात भले ही बेवफ़ाई करते रहते हैं, लेकिन वह लड़की मरते दम तक अपनी हाड़-मांस गलाकर बेटी होने का फ़र्ज़ निभाती रहती है। 
कुछ ही वर्षों में यही महजबीन हिन्दी सिनेमा के आसमान पर मीना कुमारी नाम का ऐसा सितारा बनकर चमकती है, जिसकी रोशनी आने वाली कई पीढ़ियों तक दिखाई देती रहती है।
जिस बच्ची को ग़ैरज़रूरी मानकर उसका बाप यतीमखाने की सीढ़ियों पर चींटियों के आहार के लिए छोड़ आता है, वही बच्ची आगे चलकर मीना कुमारी के रूप में हिंदुस्तान की महान अदाकारा बनती है।
मोहब्बत, दर्द, शायरी और अपनी अदाकारी से वह दुनिया का दामन भर देती है।
जिसे उसके अपने पिता ने एक बोझ समझा था, वही लड़की आगे चलकर करोड़ों दिलों की सबसे बड़ी ज़रूरत बन जाती है। 

मीना कुमारी 93वीं जयंती 1 अगस्त क़ो थी ।