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मुगले आज़म-अमर गीत के किस्से

मुगले आज़म-अमर गीत के किस्से

तानसेन की आवाज़ में 'प्रेम जोगन बनके' गीत  के लिए  मुग़ल-ए-आज़म के संगीत की तैयारी शुरू होती है तो नौशाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ गीतों की धुन बनाना नहीं है। फ़िल्म में तानसेन भी है और के. आसिफ़ चाहते हैं कि उसकी आवाज़ ऐसी हो, जिसे सुनकर लगे कि बादशाह अकबर के दरबार का महान गायक सचमुच सामने बैठा है। इस आवाज़ के लिए रफ़ी या तलत महमूद का नाम उन्हें मंज़ूर नहीं है। नौशाद कहते हैं, एक शख़्स है... लेकिन वह फ़िल्म के लिए गाएगा नहीं।
आसिफ़ साहब पूछते हैं, कौन?
नौशाद नाम लेते हैं- बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ।
आसिफ़ साहब के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कहते हैं, जनाब, दुनिया में कोई ऐसा शख़्स नहीं है जिसको के. आसिफ़ राज़ी न कर सके। 
बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ को मनाने के लिए आसिफ़ और नौशाद कलकत्ता पहुँचते हैं। नौशाद पहले अकेले उनकी बैठक में जाते हैं और उनसे गुज़ारिश करते हैं कि इतनी बुलंद फ़िल्म बन रही है और तानसेन की आवाज़ के लिए उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता। मगर बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साफ़ इनकार कर देते हैं।
नौशाद फिर कहते हैं, फ़िल्मकार ख़ुद चलकर आपसे मिलने आया है।
आसिफ़ साहब को अंदर बुलाया जाता है। वह अनामिका में सिगरेट दबाए बैठक में दाख़िल होते हैं। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की नज़र सिगरेट पर पड़ती है और वह नाराज़ होकर पूछते हैं, ये कौन बदतमीज़ है जो बैठक में सिगरेट पीते हुए आ गया?
आसिफ़ साहब फ़ौरन सिगरेट बाहर फेंकते हैं, माफ़ी माँगते हैं और फिर ऐसे पेश आते हैं जैसे बातचीत पहले से तय हो।
वह पूछते हैं, हुज़ूर, बॉम्बे आने की क्या तारीख़ मुक़र्रर हुई?
नौशाद हँसते हुए कहते हैं, अभी तो साहब फ़िल्म में गाने के लिए राज़ी ही नहीं हैं।
बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ आसिफ़ के इस जुनून को देखते हैं। फिर शायद उन्हें लगता है कि इतनी बड़ी फ़ीस माँगेंगे तो यह फ़िल्मकार पीछे हट जाएगा।
वह कहते हैं, तुम मेरी फ़ीस नहीं दे पाओगे।
आसिफ़ साहब बेझिझक कहते हैं, हुक्म कीजिए हुज़ूर।
बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ कहते हैं, इस एक गाने के पच्चीस हज़ार लूँगा। उस ज़माने में गायक का सबसे ज़्यादा रेट 4-5 हज़ार होता था। 
आसिफ़ साहब जेब में हाथ डालते हैं। पाँच हज़ार रुपये की गड्डी निकालकर उनके सामने रख देते हैं।
ये पेशगी है। आप बॉम्बे आइए। रिकॉर्डिंग से पहले बाक़ी बीस हज़ार मिल जाएँगे।
इस बार बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ के पास कहने को कुछ नहीं है। वह इस आदमी की ज़िद और जुनून को देखते हैं और फ़िल्म के लिए गाने को राज़ी हो जाते हैं।
बॉम्बे में रिकॉर्डिंग का दिन आता है। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ को बैठकर गाने की आदत है। आसिफ़ साहब रिकॉर्डिंग रूम में उनके लिए गावतकिए लगवाते हैं। फिर उनकी आवाज़ में वह सुर रिकॉर्ड होता है, जिसे के. आसिफ़ तानसेन के लिए सुनना चाहते हैं। 

तानसेन की आवाज़ और चाँदनी रात का वह दृश्य
इस गीत की रिकॉर्डिंग जितनी दिलचस्प है, उसका फिल्मांकन भी उतना ही दिलचस्प किस्सा अपने भीतर समेटे हुए है।
के. आसिफ़ को इस गीत के दौरान सलीम और अनारकली के बीच मोहब्बत के कुछ बेहद नर्म और अंतरंग पल दिखाने हैं। बाग़ का मंज़र है, रात का सन्नाटा है, चाँदनी है और उस चाँदनी में दिलीप कुमार और मधुबाला की मोहब्बत को पर्दे पर उतरना है। लेकिन एक मुश्किल है। 

मधुबाला के वालिद अताउल्ला ख़ान सेट पर उनकी परछाईं की तरह मौजूद रहते हैं। उन्हें दिलीप कुमार पसंद नहीं हैं और वह अपनी बेटी को उनके साथ ऐसे अंतरंग दृश्यों में काम करने देने के लिए तैयार नहीं हैं। आसिफ़ साहब जानते हैं कि अगर ख़ान साहब को पता चल गया कि दोनों के बीच इस तरह का दृश्य फिल्माया जा रहा है, तो शूटिंग मुश्किल में पड़ सकती है।
लेकिन आसिफ़ आसिफ़ हैं। उनके दिमाग़ में एक तरकीब आती है।
उन्हें मालूम है कि अताउल्ला ख़ान को रमी खेलने का शौक़ है और कभी-कभी वह थोड़े पैसे का दाँव भी लगा लेते हैं। आसिफ़ साहब अपने एक असिस्टेंट को बुलाते हैं और उसे एक हज़ार रुपये देते हैं।
ख़ान साहब के पास बैठो... रात भर रमी खेलो।
असिस्टेंट शायद समझ नहीं पाता कि इस हज़ार रुपये का असली काम क्या है।
आसिफ़ साहब समझाते हैं-
लेकिन याद रखना, तुम्हें जीतना नहीं है। पूरी रात हारना है। ख़ान साहब का ध्यान ताश में लगा रहना चाहिए।
अब सेट पर एक तरफ़ रमी की बाज़ी जमती है और दूसरी तरफ़ बाग़ में शूटिंग की तैयारी होती है।
असिस्टेंट ताश की गड्डी लेकर अताउल्ला ख़ान के पास बैठ जाता है। बाज़ी शुरू होती है। उधर आसिफ़ साहब अपनी टीम को इशारा करते हैं। रात गहराती जाती है।
एक तरफ़ ताश की गड्डी खुलती-बंद होती रहती है और हर बाज़ी में असिस्टेंट एक-दो रुपये नहीं, बल्कि अपने साथ लाए पूरे एक हज़ार रुपये धीरे-धीरे हारता जाता है। अताउल्ला ख़ान का ध्यान रमी में लगा रहता है और उधर बाग़ के सेट पर चाँदनी रात सज चुकी है।
दिलीप कुमार और मधुबाला अपने किरदारों में उतरते हैं। चारों तरफ़ ख़ामोशी और इस ख़ामोशी के बीच तानसेन की आवाज़ गूँजती है।
बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की बुलंद और रूहानी आवाज़ के बीच सलीम और अनारकली की मोहब्बत पर्दे पर आकार लेने लगती है। आसिफ़ साहब का तसव्वुर धीरे-धीरे मंज़र बन रहा है।
उधर रमी की बाज़ी चलती रहती है। 
जब रात बीतती है तो आसिफ़ साहब वह हासिल कर चुके होते हैं, जिसके लिए पूरी तरकीब रची गई थी। अताउल्ला ख़ाँ को इसकी भनक तक नहीं लगती और दिलीप कुमार और मधुबाला की मोहब्बत का वह मंज़र कैमरे में क़ैद हो चुका होता है।

प्यार किया तो डरना क्या 

आसिफ़ साहब की आँखों में सपने 35 एम.एम. के ज़माने में भी 70 एम.एम. के होते हैं। 
यहीं शीशमहल की उस गीत की तलाश शुरू होती है, जो आगे चलकर हिन्दी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में शामिल होता है- प्यार किया तो डरना क्या।
आसिफ साब के कहने के बावजूद भी गीत तैयार नहीं हो पा रहा है। के आसिफ एकदिन नौशाद साब को अल्टीमेटम दे देते हैं। 
शाम के छह बजे हैं। सूर्यास्त हो रहा है। नौशाद और शकील एक कमरे में बैठ जाते हैं। काग़ज़ पर काग़ज़ भरते जाते हैं। कभी गीत का रंग आता है, कभी ग़ज़ल की कोशिश होती है। मगर वह मुखड़ा नहीं मिलता जिसकी तलाश है। न खाने की सुध है और न पीने की। रातभर में गीत तैयार करना है। 
तभी अचानक नौशाद साहब को बचपन में सुना पूरबी लोकगीत का एक मुखड़ा याद आता है- “प्रेम किया का चोरी केरी?”
वह शकील साहब को सुनाते हैं। शकील को मुखड़ा पसंद आता है। नौशाद हारमोनियम पर धुन बनाते हैं और शकील उसी भाव को अपना रूप देते हुए लिखते हैं- 

“प्यार किया तो डरना क्या,
प्यार किया कोई चोरी नहीं की।” 

मुखड़ा मिलते ही गीत जैसे रास्ता पकड़ लेता है। दो अंतरे आसानी से बन जाते हैं। तीसरे पर फिर रुकावट आती है। यहाँ अनारकली को सरे-महफ़िल अपने प्यार का ऐलान करना है- ऐसा ऐलान कि अकबर का ग़ुस्सा भड़क उठे और वही ग़ुस्सा उसकी सज़ा-ए-मौत की राह खोल दे। फिर शकील लिखते हैं- 

“आज कहेंगे दिल का फ़साना,
जान भी ले ले चाहे ज़माना।
पर्दा नहीं जब कोई ख़ुदा से,
बंदों से पर्दा करना क्या।” 

अब गीत सिर्फ़ गीत नहीं रह जाता। वह अनारकली का ऐलान-ए-मुहब्बत बन जाता है। छह मिनट के इस गीत में कैमरा 57 बार अपनी जगह बदलता है। कभी शीश महल की बेमिसाल चमक दिखाई देती है, कभी अनारकली के चेहरे पर बेख़ौफ़ मोहब्बत, कभी अकबर और सलीम के बदलते चेहरे। शीशे, रोशनी, संगीत और मधुबाला की आँखों के बीच आसिफ़ साहब अपने तसव्वुर को पर्दे पर उतार देते हैं। 

'प्यार किया तो डरना क्या' गाने की शूटिंग के दौरान जूनागढ़ के भूतपूर्व दीवान का बेटा सेट पर आता है। वह पढ़ा-लिखा और बेहद ख़ूबसूरत नौजवान है। के. आसिफ़ उसे बहुत इज़्ज़त देते हैं। वह अक्सर मधुबाला के साथ बैठता है और यूनिट के साथ ही लंच करता है। मधुबाला को भी उसका साथ बेहद पसंद है।
एक दिन लंच ब्रेक के दौरान वह नौजवान मधुबाला के सामने शादी का प्रस्ताव रखता है। मधुबाला हँसते हुए उसके प्रस्ताव को ठुकरा देती है। इसके बाद वह दोबारा शूटिंग पर नहीं आता। जूनागढ़ के दीवान का वह बेटा कोई और नहीं, बल्कि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो है, जो आगे चलकर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनता है।

तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा के 

मुग़ल-ए-आज़म में मोहब्बत सिर्फ़ सलीम और अनारकली के बीच नहीं है। उसके रास्ते में बहार भी खड़ी है—एक ऐसी औरत, जिसके दिल में सलीम के लिए मोहब्बत है और जो अनारकली को अपनी राह का सबसे बड़ा ख़तरा मानती है। इसलिए जब दोनों आमने-सामने आती हैं तो यह सिर्फ़ दो औरतों का सामना नहीं रहता, बल्कि दो मोहब्बतों की टकराहट बन जाता है।
इसी टकराहट को शकील बदायूनी अपने अल्फ़ाज़ देते हैं।
गीत शुरू होता है-
  “तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा के हम भी देखेंगे,
 घड़ी भर को तेरे नज़दीक आ के हम भी देखेंगे।” 

बहार के लिए यह सिर्फ़ किसी महफ़िल में शामिल होने की कोशिश नहीं है। वह अनारकली की दुनिया में दाख़िल होकर देखना चाहती है कि जिस मोहब्बत पर उसे इतना यक़ीन है, उसकी हक़ीक़त क्या है। उसके भीतर एक चुनौती भी है और एक कसक भी।
मगर इस गीत की असली ताक़त उसकी शायरी में है। शकील मोहब्बत को सिर्फ़ मिलन की ख़ुशी की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ मोहब्बत का दूसरा चेहरा भी है- इंतज़ार, तड़प, ख़ामोशी और उस दर्द का एहसास, जिसे मोहब्बत करने वाला किसी से कह भी नहीं पाता।
इसलिए गीत में एक जगह शकील लिखते हैं- 
"मोहब्बत करने वालों का है बस इतना ही अफ़साना तड़पना, चुपके-चुपके आह भरना, घुट के मर जाना" 

"मोहब्बत हमने माना ज़िंदगी बरबाद करती है । ये क्या कम है कि मर जाने पे दुनिया याद करती है ।" 

शकील के इन्हीं दो पहलुओं को आधार बनाकर इससे आगे का सीन भी लिखा गया है। जिसमें शहज़ादा सलीम फ़ैसला देते हुए बहार को फूल और अनारकली को कांटे देता है. तब अनारकली का लाजवाब जवाब आता है- ज़हे-नसीब... कांटों को मुरझाने का ख़ौफ़ नहीं होता । 

बेक़स पे करम कीजिए सरकारे मदीना 

मुग़ल-ए-आज़म के संगीत में जहाँ मोहब्बत की शिद्दत है, वहीं इबादत की रूह भी है। इसी रूह से निकलती है नात- “बेक़स पे करम कीजिए सरकारे मदीना।”
शकील बदायूनी और नौशाद की जोड़ी 1947 में पहली बार फ़िल्म दर्द के लिए साथ आती है। उस पहली ही फ़िल्म में दोनों एक निहायत ख़ूबसूरत नात रचते हैं- 

“बीच भँवर में आन फँसा है दिल का सफ़ीना,
शाहे मदीना।” 

सुरैया की पुरसोज़ आवाज़ में यह नात अपनी एक अलग ही दुनिया बना देती है।
अब मुग़ल-ए-आज़म में फिर नात का मौक़ा आता है। नौशाद इस बार इसे साधारण अंदाज़ में नहीं लेना चाहते। वह राग केदार के सुरों में ऐसी बंदिश तैयार करते हैं, जिसमें भक्ति, विनय और दर्द तीनों एक साथ उतर आते हैं। धुन तैयार होती है तो लगता है जैसे फ़िल्म के शाही वैभव के बीच अचानक कोई दरवाज़ा खुलता है और सामने एक बिल्कुल अलग रूहानी दुनिया दिखाई देने लगती है।
लता मंगेशकर जब इसे अपनी आवाज़ देती हैं तो राग केदार का रंग और गहरा हो जाता है। उनकी गायकी की ख़ूबी यही है कि वह शास्त्रीय राग के भीतर छिपे हुए महीन रंग उनकी आवाज़ में बाहर आने लगते हैं। 

रिकॉर्डिंग के बाद यह नात जब सुनने वालों तक पहुँचती है तो उसे सिर्फ़ एक फ़िल्मी गीत की तरह नहीं सुना जाता। इसकी बंदिश और लता की आवाज़ मिलकर इसे मुग़ल-ए-आज़म के तमाम गीतों के बीच एक नायाब जगह दे देती है।
मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर भी इस नात से बेहद मुतास्सिर होती हैं। वह नौशाद और लता मंगेशकर को फ़ोन करके अपनी भरपूर दाद देती हैं। मगर रिकॉर्ड पर सुनकर भी उनका जी नहीं भरता। वह लता जी से फ़ोन पर इसे दोबारा सुनाने की फ़रमाइश तक कर डालती हैं।
एक फ़िल्मी नात के लिए इससे बड़ी दाद और क्या हो सकती है कि बेगम अख़्तर जैसी फ़नकार उसे सुनकर ख़ुद गाने वाली से दोबारा सुनने की इल्तिज़ा करे।

ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद 

मुग़ल-ए-आज़म में मोहब्बत सिर्फ़ पर्दे पर महसूस नहीं होती, वह एक बग़ावत बनकर सामने आती है। शहज़ादा सलीम अपने प्यार के लिए शहंशाह अकबर के सामने खड़ा है और अकबर उस मोहब्बत को बख़्शने के लिए तैयार नहीं है।
इसी सिचुएशन में गीत आता है—
“ज़िंदाबाद! ज़िंदाबाद!
ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद!” 

यह फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ इकलौता गीत है।
संगीत की दृष्टि से यह मुग़ल-ए-आज़म के दूसरे गीतों जैसी जटिल या महान रचना नहीं है, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन में इसकी अपनी ख़ास जगह है। सलीम की मोहब्बत अब महज़ एक निजी एहसास नहीं रह गई है। वह अकबर की सल्तनत के सामने एक ऐलान बनकर खड़ी है। 

गीत का मुखड़ा भी अपने समय के जज़्बे से एक दिलचस्प रिश्ता बनाता है। आज़ादी की जंग में गूँजने वाला नारा- 

“ज़िंदाबाद! ज़िंदाबाद! इंक़लाब ज़िंदाबाद!” 

यहाँ मोहब्बत की ज़बान पा लेता है-  “ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद!” 

इस गीत को बड़े पैमाने पर रिकॉर्ड करने की तैयारी होती है। ‘ज़िंदाबाद’ की सामूहिक आवाज़ के लिए एक साथ 50 कोरस सिंगर्स बुलाए जाते हैं। यह उस दौर के लिहाज़ से अपने आप में एक असाधारण इंतज़ाम है।
महबूब स्टूडियो के ग्राउंड फ़्लोर पर पचासों कोरस सिंगर्स खड़े हैं। ऊपर रिकॉर्डिंग थिएटर में मोहम्मद रफ़ी और साज़िंदे मौजूद हैं। नीचे से उठती पचास आवाज़ें और ऊपर से आती रफ़ी की बुलंद आवाज़ मिलकर उस गीत को एक भीड़ की पुकार में बदल देती हैं।
यहाँ रफ़ी की आवाज़ अकेले किसी आशिक़ की आवाज़ नहीं रह जाती। उसके पीछे पचास आवाज़ें खड़ी हैं जैसे पूरी दुनिया सलीम की मोहब्बत के साथ एक सुर में कह रही हो- 
          “ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद !” 
यहाँ गीत मोहब्बत का नग़मा नहीं, मोहब्बत का नारा बन जाता है।