फिल्मों में निभाया गया दर्शकों द्वारा स्वीकृत चरित्र किसी भी कलाकार की आत्मा से जुड़ा रहता है जैसा कि यश ने केजीएफ से जो पहचान बनाई थी, वह केवल एक स्टार की पहचान नहीं थी, बल्कि उस नायक की थी जिसमें संघर्ष, जिद और अपनी मिट्टी की गंध थी। दर्शक ने उन्हें इसलिए अपनाया क्योंकि उनके भीतर एक ऐसा देसी आकर्षण था जो भारी-भरकम संवादों से नहीं, बल्कि स्क्रीन पर मौजूद आत्मविश्वास से पैदा होता था। लेकिन टॉक्सिक उस भरोसे को आगे बढ़ाने के बजाय उसे उलझा देती है। फिल्म का पहला असर यही पड़ता है कि यहां रूप बहुत है, लेकिन रूप के भीतर वह रस नहीं है जो किसी कहानी को जीवित रखता है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी समस्या उसका पटकथा-लंगड़ापन है। कहानी आगे बढ़ती है, मगर ठोस दिशा में नहीं। दृश्य आते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से ऐसे नहीं जुड़ते कि उनसे कोई स्वाभाविक बहाव बने। कई प्रसंग सिर्फ इसलिए रखे गए लगते हैं कि वे चौंकाएँ, न कि इसलिए कि वे कथा को कोई नया अर्थ दें। यही कारण है कि फिल्म देखते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि परदे पर जो कुछ हो रहा है, वह कहानी से ज़्यादा प्रदर्शन है।
स्क्रीनप्ले की हालत भी कोई बेहतर नहीं। संवाद कई जगह जोर लगाकर बोले गए लगते हैं, लेकिन भीतर से वे असर पैदा नहीं करते। चरित्रों की चाल, घटनाओं की गति और नायक की यात्रा — सब कुछ एक अनगढ़-सा रूप ले लेता है। किसी मजबूत फिल्म में नायक की उपस्थिति कहानी को दिशा देती है, लेकिन यहां कहानी ही नायक के चारों तरफ बिखरती नजर आती है। परिणाम यह कि यश की मौजूदगी होने के बावजूद फिल्म का भरोसा नहीं बनता।
दर्शकों की आपत्ति केवल इस बात पर नहीं है कि फिल्म में हिंसा है या ग्लैमर है। आपत्ति इस पर है कि यह सब अपने देशज स्वभाव से कटकर आता है। कई दृश्यों में फिल्म किसी एक सिनेमाई परंपरा में खड़ी नहीं दिखती, बल्कि कई विदेशी फिल्मों के टुकड़ों की तरह लगती है। यही वजह है कि दर्शक इसे एक ठोस, मौलिक रचना की जगह किसी उधार ली गई शैली का मिश्रण मान रहे हैं। एक्शन, दिखावा, पहनावा और दृश्य-निर्माण — सब मिलकर भी वह स्वाभाविकता नहीं दे पाते, जो दर्शक को भीतर तक जोड़ सके।
फिल्म की शैलीगत अतिशयता भी इसे और कमजोर बनाती है। शराब, सिगरेट, अय्याशी, हिंसा, बंदूक, देह-प्रदर्शन, आक्रामकता — इन सबको मिलाकर एक ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है जो परदे पर “विद्रोही” कम और “उधार लिया हुआ” अधिक लगता है। भारतीय दर्शक हिंसा और अपराध-कथाओं से अनजान नहीं है, लेकिन वह अब यह पहचानने लगा है कि कब यह सब कथा की जरूरत है और कब केवल दिखावे की भूख। टॉक्सिक कई जगह दूसरे वर्ग में खड़ी दिखाई देती है।
यश की छवि को लेकर भी यही संकट पैदा होता है। केजीएफ में उनका चरित्र एक संघर्षशील, जमीनी और भरोसेमंद नायक की तरह उभरा था। टॉक्सिक में वही चरित्र कई परतों में सजाया तो गया है, लेकिन उसकी जड़ ढीली पड़ती दिखती है। कभी वह बहुत रंगीन लगता है, कभी बहुत आक्रामक, कभी बहुत बनावटी। इस फेरबदल में चरित्र का आत्म कहीं पीछे छूट जाता है। दर्शक चेहरे की चमक देखता है, लेकिन मन के भीतर उतरने वाला कोई स्थायी भाव नहीं पाता।
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह भारतीय भावबोध को छूने का दावा तो करती है, लेकिन उसे निभा नहीं पाती। भारतीय सिनेमा का इतिहास बताता है कि दर्शक केवल मारकाट या अपराध-रंग नहीं चाहता; वह उस नायक को भी देखना चाहता है जिसके भीतर एक नैतिक धड़कन, एक मानवीय कशिश और एक अपनी संस्कृति की पहचान हो। टॉक्सिक इस कसौटी पर कमजोर पड़ती है। वह जोर से बोलती है, पर ठीक से कहती नहीं।
यही वजह है कि फिल्म के प्रति प्रतिक्रिया दो हिस्सों में बंटी हुई दिखती है — एक तरफ यश का नाम और उनकी लोकप्रियता है, दूसरी तरफ फिल्म का बिखरा हुआ ढांचा। बड़ी स्टार-शक्ति हमेशा फिल्म को नहीं बचा सकती। जब कहानी कमजोर हो, स्क्रीनप्ले बिखरा हो और चरित्र-निर्माण सतही हो, तो भव्यता भी खोखली लगने लगती है। टॉक्सिक इसी खोखलेपन का उदाहरण बनती दिखाई देती है।
अगर इसे एक पंक्ति में कहा जाए, तो टॉक्सिक यश की फिल्म जरूर है, लेकिन यश की सबसे सशक्त फिल्म नहीं। यह चमक तो देती है, पर गहराई नहीं; शोर देती है, पर असर नहीं; और सबसे बढ़कर, वह मौलिकता नहीं दे पाती जिसकी उम्मीद एक बड़े भारतीय नायक से की जाती है। यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।
