चर्चित फिल्म टॉक्सिक ने रिलीज़ के साथ साफ़ कर दिया है कि कुछ निर्माता-निर्देशक अब सोची-समझी कला नहीं, सिर्फ़ चर्चा और कमाई को प्राथमिकता दे रहे हैं। फिल्म में हिंसा,गोली बन्दूक,मार काट,अश्लीलता और नग्नता का उपयोग बिना किसी कथ्यगत आवश्यकता के किया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि कहानी कमजोर पड़ी है और कोई नया संदेश मिलना तो दूर, दर्शक को असहज करने वाले दृश्य ही रह गए। "बोल्ड" होने का ढोंग करना आसान है; असल बात यह है कि क्या वह बोल्डनेस किसी अर्थ या आवश्यकता से जुड़ी है। यहाँ इसका जवाब नकारात्मक है—यह बस शॉर्टकट है: जल्दी से सनसनी पैदा करो और टिकट खिड़की भर जाएगी।

टॉक्सिक को लेकर जो भारी-भरकम प्रचार बनाया गया था, वह फिल्म शुरू होते ही कुछ देर तक असर डालता है, लेकिन जल्दी ही उसकी चमक के नीचे की कमजोरी दिखने लगती है। फिल्म खुद को बहुत बड़ा, बहुत स्टाइलिश और बहुत “महत्त्वपूर्ण” दिखाने की कोशिश करती है, मगर कई जगह ऐसा लगता है जैसे पैकेज पर तो सोना चढ़ा है, अंदर सामान अभी भी अधूरा है। यश की मौजूदगी, उनकी एंट्री और स्क्रीन प्रेज़ेंस फिल्म को शुरुआत में संभालते हैं, लेकिन कहानी बार-बार इस भरोसे को कमजोर कर देती है। यश ने इससे पहले अपनी बड़ी फिल्मों से जो पहचान बनाई थी, उसी वजह से उनसे उम्मीदें भी आसमान पर थीं। इस बार फिल्म उन उम्मीदों तक पहुँचने के बजाय उनके चारों ओर धुआँ छोड़ती दिखती है।
कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसे नाम फिल्म की चमक बढ़ाते हैं, लेकिन बड़े नाम अपने-आप में बड़ा सिनेमा नहीं बना देते। यह बात टॉक्सिक अच्छे से समझा देती है। इतने मजबूत कलाकारों के बावजूद कई किरदार सिर्फ़ आते हैं, थोड़ा असर डालते हैं और फिर कहानी के शोर में खो जाते हैं। लगता है जैसे फिल्म कह रही हो कि स्टार कास्ट ही असली लेखन है, और दर्शक बस यह मान ही ले। दुर्भाग्य से दर्शक अब पहले से थोड़ा समझदार हो चुका है; वह नामों की लंबी सूची देखकर टिकट नहीं खरीदता, उसे वह फिल्म चाहिए जो उसके दिमाग में टिके।
फिल्म में हिंसा, स्टाइल और मार्केटिंग का मेल इतना ज्यादा है कि कई लोग इसे मज़ाक में KGF 3 कह रहे हैं। यह तुलना अपने-आप में बहुत कुछ बता देती है। जब कोई नई फिल्म अपनी अलग पहचान बनाने के बजाय पहले से बनी सुपरहिट छवि की याद दिलाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसके पास शोर तो है, लेकिन मौलिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई जगह ऐसा लगता है जैसे फिल्म नए विचारों से नहीं, पुराने फ़ॉर्मूले की चमक से चलने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि कुछ दर्शक इसे नया अनुभव मानने के बजाय पुरानी सफलता का दोहराव कह रहे हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या यही है कि यह प्रोडक्शन वैल्यू को कहानी का विकल्प मान लेती है। कैमरा तेज़ है, फ्रेम भारी हैं, सेट चमकदार हैं, और बैकग्राउंड में सब कुछ “बड़ा” दिखाने की कोशिश लगातार चलती रहती है। लेकिन सिनेमा केवल रोशनी, धुआँ और धीमी चाल में चलने वाले नायक का नाम नहीं है। अगर कहानी में जान न हो, संवादों में धार न हो, स्क्रीनप्ले कमजोर हो और दृश्यों के पीछे भावनात्मक आधार न हो, तो यह सब सिर्फ़ महँगा प्रदर्शन बनकर रह जाता है। टॉक्सिक कई बार उसी प्रदर्शन की प्रदर्शनी लगती है, जिसमें भावनाएँ कम और आत्ममुग्धता ज्यादा है।
महिला पात्रों को लेकर उठी आपत्तियाँ भी हल्की नहीं हैं। कई दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि महिला किरदारों की मौजूदगी कहानी के लिए नहीं, बल्कि नायक की “डॉमिनेंस” को और चमकाने के लिए रखी गई है। यह तरीका अब पुराना भी लगता है और थोड़ा सुस्त भी। सिनेमा अगर बार-बार यही मानकर चले कि नायक बड़ा दिखेगा तो बाकी सब अपने-आप छोटा हो जाएगा, तो फिर लेखन की मेहनत किसलिए है? ऐसे में कहानी नहीं, बस प्रभुत्व की पोस्टरबाजी बचती है।
एडवांस बुकिंग ने फिल्म के लिए ज़रूर तूफ़ान खड़ा किया, लेकिन बॉक्स ऑफिस का शोर और अच्छी फिल्म होना एक ही बात नहीं है। भीड़ जुटना सफलता का संकेत हो सकता है, पर गुणवत्ता की मुहर नहीं। भारी बजट वाली फिल्में अक्सर इसी भ्रम में जीती हैं कि जितना बड़ा आंकड़ा, उतनी बड़ी कला। काश यह इतना आसान होता। दर्शक पैसे देकर सिर्फ़ दृश्य नहीं खरीदता, वह अर्थ भी चाहता है। अगर अर्थ आधा रह जाए, तो टिकट की गिनती भले चमकती रहे, फिल्म का असर बैठते ही उतर जाता है।
कुल मिलाकर टॉक्सिक एक ऐसी फिल्म है जो खुद को बहुत बड़ा साबित करना चाहती है, लेकिन कई जगह अपने ही वजन से डगमगा जाती है। इसमें शोर है, चमक है, स्टार पावर है और चर्चा बटोरने की पूरी क्षमता भी है, मगर सधा हुआ लेखन, मजबूत स्क्रीनप्ले और गहरी पकड़ बार-बार हाथ से फिसलती रहती है। यह फिल्म हल्ला खूब करती है, पर हल्ला हमेशा हुनर नहीं होता। और यही इसकी सबसे कड़वी सच्चाई है।