घर की रसोई घर का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि रसोई दिशा के हिसाब से उचित स्थान पर न हो तो उसके दूरगामी नकरात्मक प्रभाव हो सकते हैं; दरिद्रता और बीमारियाँ जैसे संकट कहीं दूर से ही आकर्षित हो सकते हैं। आम धारणा में रसोई का स्थान "अग्नि कोण" में होना शुभ माना जाता है, लेकिन वास्तुशास्त्र में इसके अलावा भी पाँच अन्य उपयुक्त स्थान बताये गए हैं, जिन्हें कम लोग जानते हैं।
काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित संजय उपाध्याय का कहना है कि शास्त्रीय वास्तुशास्त्र की पुस्तक 'मनुष्यालय चंद्रिका' में इन अन्य स्थानों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पंडित उपाध्याय बताते हैं कि वास्तु शास्त्र दो प्रकार का है — आधुनिक वास्तुशास्त्र और शास्त्रीय वास्तुशास्त्र। आजकल अधिकतर लोग आधुनिक प्रवृत्ति को अपनाते हैं, पर शास्त्रीय ग्रंथों में घर के विभिन्न स्थानों के महत्व और उनसे जुड़े रहस्यों का समृद्ध विवेचन मिलता है।
'मनुष्यालय चंद्रिका' के सातवें अध्याय के 35वें श्लोक के आधार पर पंडित संजय उपाध्याय कहते हैं कि अग्नि कोण के साथ-साथ रसोई के लिए पाँच और स्थान भी विशेष रूप से उपयुक्त माने गए हैं। इनमें पहला है ईशान कोने का दूसरा स्थान, यानी उत्तर-पूर्व दिशा का द्वितीय भाग — इस स्थान पर रसोई होने से घर में माता अन्नपूर्णा व मां लक्ष्मी का वास माना जाता है और यह परिवार की उन्नति के मार्ग को सुगम बनाता है। दूसरा स्थान पूर्व दिशा के मध्य भाग को कहा गया है, जिसे सूर्य का स्थान माना जाता है; यहाँ रसोई बनाने से भी सकारात्मक प्रभाव होते हैं। तीसरा स्थान दक्षिण दिशा के मध्य भाग का है, जो वृषभ राशि का स्थान माना जाता है; यह भी लाभकारी रहता है। चौथा स्थान पश्चिम के मध्य भाग का है, जिसे तरुण के पद के रूप में दर्शाया गया है; यहाँ रसोई होने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। और पाँचवा स्थान वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) है, जिसे भोजनालय के रूप में भी श्रेष्ठ माना गया है; इस स्थान पर रसोई होने से बीमारियाँ दूर रहती हैं और पूरे गृह में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है।
पंडित उपाध्याय इस बात पर भी जोर देते हैं कि शास्त्रीय निर्देशों को समझकर और घर की वास्तविक बनावट के अनुसार समुचित स्थानों का चयन करना चाहिए। केवल किसी एक नियम का अनुवर्तन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वास्तु के सामूहिक समीकरण — दिशा, कोना व घर के अन्य घटक — को ध्यान में रखकर ही अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए।
