दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं यूनान और भारत के महाकाव्यों को अगर साथ रखकर पढ़ा जाए तो लगता है जैसे दो अलग-अलग भाषाओं में एक ही तरह की आत्मा बोल रही हो। वीरता, त्याग, निष्ठा और धर्म की जो नींव यूनानी महाकाव्य ओडिसी में दिखती है, वही नींव भारतीय पौराणिक कथाओं में भी मौजूद है, बस पात्रों के नाम और स्थान बदल जाते हैं।
इन महाकाव्यों की पहली कड़ी अपहरण की घटना से जुड़ती है। ओडिसी की पृष्ठभूमि में ट्रॉय का वह भीषण युद्ध है जो रानी हेलेन के अपहरण के कारण लड़ा गया था। ठीक वैसे ही रामायण की पूरी कथा माता सीता के हरण के इर्द-गिर्द घूमती है। और दोनों ही कहानियों में नायक को लंबा वियोग झेलना पड़ता है। ट्रोजन युद्ध के बाद ओडिसियस को अपने घर इथाका लौटने में बीस साल लग जाते हैं तो भगवान राम को भी चौदह वर्ष का वनवास काटना पड़ता है।
दूसरी सबसे बड़ी समानता नायिकाओं की अडिग पति निष्ठा में दिखती है। ओडिसियस की पत्नी पेनेलोप बीस साल तक अकेले राजमहल संभालती है और तमाम राजाओं के विवाह प्रस्तावों को ठुकराकर अपने पति की प्रतीक्षा करती है। यही अटूट प्रतीक्षा और समर्पण हमें माता सीता में और महाभारत में द्रौपदी के चरित्र में भी देखने को मिलता है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म से नहीं डिगतीं।
तीसरा और सबसे रोचक संयोग स्वयंवर की शर्त का है। ओडिसी के अंतिम अध्याय में जब ओडिसियस भेष बदलकर अपने महल पहुंचता है तो पेनेलोप एक शर्त रखती है कि जो भी उसके पुराने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर निशाना साध देगा वही उससे विवाह करेगा। यह काम केवल ओडिसियस ही कर पाता है। यह दृश्य हूबहू रामायण के सीता स्वयंवर की याद दिलाता है जहां भगवान शिव के धनुष को तोड़ने की शर्त थी और महाभारत के द्रौपदी स्वयंवर की भी, जहां मत्स्य भेदन की चुनौती रखी गई थी।
राक्षसों और मायावी शक्तियों का चित्रण भी दोनों संस्कृतियों में लगभग एक जैसा है। ओडिसी में पॉलीफेमस नाम का एक आंख वाला विशाल राक्षस आता है जो मनुष्यों को खा जाता है, जिसका रूप भारतीय कथाओं के कबंध, कुंभकर्ण और बकासुर जैसे राक्षसों से मिलता जुलता है। वहीं यूनानी साइरन्स जो अपनी मधुर और जादुई आवाज से नाविकों को सम्मोहित कर मृत्यु की ओर ले जाती हैं, वे भारतीय अप्सराओं रंभा और मेनका की तरह हैं जो ऋषि मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए अपनी मोहिनी शक्ति का प्रयोग करती थीं।
भेष बदलकर शत्रुओं के बीच रहना भी दोनों महाकाव्यों की साझा रणनीति है। ओडिसियस अपने ही घर में एक भिखारी बनकर प्रवेश करता है ताकि वह अपनी शक्ति को पहचाने बिना शत्रुओं का विनाश कर सके। यही अज्ञातवास का सिद्धांत महाभारत में पांडवों ने अपनाया था, जब उन्होंने विराट नगर में एक साल तक कंक, बल्लभ और बृहन्नला जैसे अलग अलग वेश धारण कर अपनी पहचान छुपाए रखी थी। और तो और नल और दमयंती की कथा भी इसी कड़ी को आगे बढ़ाती है, जहां राजा नल अपना सब कुछ खोने के बाद अपनी ही पत्नी दमयंती के स्वयंवर में पहुंचकर उसे पुनः प्राप्त करते हैं, जो ओडिसी के क्लाइमैक्स से अद्भुत रूप से मेल खाता है।
देवताओं की भूमिका भी दोनों जगह निर्णायक है। यूनान में एथेना और पोसिडॉन जैसे देवता मनुष्यों के युद्ध और भाग्य का फैसला करते हैं तो भारत में भगवान विष्णु, शिव, इंद्र और ब्रह्मा पग पग पर मनुष्यों की परीक्षा लेते हैं, उन्हें वरदान देते हैं और धर्म की स्थापना में मार्गदर्शन करते हैं।
यह समानता योद्धाओं की मृत्यु तक में दिखती है। यूनानी वीर एकीलिस की मां थेटिस ने उसे अमर बनाने के लिए स्टिक्स नदी के पवित्र जल में डुबोया था, लेकिन जिस एड़ी से पकड़कर डुबोया वह हिस्सा सूखा रह गया और वही उसकी कमजोरी बन गई, जहां तीर लगने से उसकी मृत्यु हुई, तभी से अंग्रेजी में एकीलिस हील यानी सबसे कमजोर कड़ी का मुहावरा प्रचलित हुआ। यह कथा महाभारत के दुर्योधन की कथा से कितनी मिलती है, जब माता गांधारी ने आंखों की पट्टी खोलकर अपने पुत्र के शरीर को वज्र समान बनाने का वरदान दिया, लेकिन जांघ वाला हिस्सा ढका रह गया और वही उसकी मृत्यु का कारण बना।