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रेखा:कुछ अधूरा कुछ अनदेखा

रेखा:कुछ अधूरा कुछ अनदेखा

रेखा, जिसे सौंदर्य की देवी कहा जाता है। मीरा नायर के लिए रेखा बॉलीवुड की मर्लिन मुनरो हैं, जबकि संजय लीला भंसाली के लिए वह आख़िरी सुपरस्टार अभिनेत्री हैं। रेखा के दीवाने बहुत हैं—उनकी सुंदरता के, उनकी अदाओं के और उनकी खूबसूरत आवाज़ के। 

उन्हीं दीवानों में से रेखा का एक दीवाना दिल्ली में रहता है, जो 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ देता है और कुछ साल तक छोटे-मोटे काम करता है। फिर 70 के दशक के आख़िर में 24 साल की उम्र में वह बर्तन बनाने वाले हॉटलाइन ब्रांड की एक कंपनी शुरू करता है और थोड़े ही समय में दिल्ली का एक सफल कारोबारी बन जाता है। उसका नाम है मुकेश अग्रवाल। 

साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले मुकेश के पास बहुत पैसा आ जाता है। वह महरौली में अपना फार्म हाउस बनाता है। उसे दिल्ली के एलीट क्लास में शामिल होने की ख़्वाहिश है। दिल्ली की मशहूर हस्तियों और फ़िल्म स्टारों को अपने फार्म हाउस पर बुलाकर वह पार्टियाँ करने लगता है। फ़िल्म स्टार फ़िरोज़ ख़ान और संजय ख़ान अक्सर उसकी पार्टी में शामिल होने मुंबई से दिल्ली जाते हैं। वह फ़िरोज़ ख़ान से एक अरबी घोड़ा खरीदता है। शाम की पार्टी में मुकेश अच्छे लिबास में घोड़े पर सवार होकर अपने फार्म हाउस पर मेहमानों का स्वागत करता है।
फ़ैशन डिज़ाइनर और दिल्ली की सोशलाइट बीना रमानी अपनी मॉडल लड़कियों के साथ मुकेश अग्रवाल की हर पार्टी में शरीक होती हैं। मुकेश को पता है कि बॉलीवुड की ब्यूटी क्वीन रेखा, बीना रमानी की बहुत अच्छी दोस्त हैं। मुकेश रेखा का बहुत बड़ा फैन है। वह चाहता है कि बीना किसी दिन अभिनेत्री रेखा को उसकी पार्टी में लेकर आएँ या मुंबई में किसी फाइव स्टार होटल में रेखा को होस्ट करे। 

इसी बीच रेखा और बीना रमानी की मुलाक़ात होती है, जिसमें रेखा उनसे कहती हैं कि वह इस अकेली ज़िंदगी से ऊब रही हैं। कोई अच्छा लाइफ़ पार्टनर मिल जाए तो उसके साथ घर बसाकर सुकून की ज़िंदगी जीना चाहती हैं। ऐसा पुरुष चाहिए, जो ज़िंदगी भर उनका साथ निभा सके। बीना रमानी तुरंत मुकेश अग्रवाल का नाम लेती हैं। वह उसकी उदारता, सज्जनता और अमीरी के क़सीदे पढ़ने लगती हैं। रेखा नाम सुनकर कहती हैं कि नाम कैसा है मुकेश अग्रवाल... नाम में ही रोमांस नहीं है। 

दिल्ली में बीना अपनी दोस्त रेखा से मुकेश को मिलवाती हैं, लेकिन रेखा मुकेश में कोई दिलचस्पी नहीं लेतीं। 

जनवरी 1990 में बीना रमानी रेखा से कहती हैं कि मुकेश तुम्हारा नंबर माँग रहा है, दे दूँ? रेखा मना कर देती हैं।
बीना उन्हें यक़ीन दिलाते हुए कहती हैं, डार्लिंग, तुम्हें इतना प्यार करने वाला शख़्स नहीं मिल सकता। तुम्हारा दीवाना है वह। तुम्हें महारानी बनाकर रखेगा। उसके पास भरपूर पैसा है, तुम जो कहोगी वही होगा।
रेखा ख़ामोश रहती हैं। 

जनवरी 1990 में बीना रमानी के बहुत कहने के बाद रेखा खुद मुकेश को फ़ोन करती हैं। रेखा की हस्की आवाज़ सुनते ही मुकेश की खुशी सातवें आसमान पर पहुँच जाती है। बीना रमानी के साथ रेखा की दूसरी दोस्त, एयर होस्टेस सुरिंदर कौर भी रेखा पर दबाव डालती हैं कि मुकेश के साथ एक नई ज़िंदगी शुरू करो। 

रेखा और मुकेश के बीच फ़ोन का सिलसिला एक महीने चलता है। उसके बाद मुकेश रेखा से मिलने मुंबई आता है। रेखा को लुभाने और मनाने में वह कोई कसर नहीं छोड़ता। रेखा उसके दिल्ली के फार्म हाउस बसेरा में आती हैं। उनके स्वागत में मुकेश एक बड़ी पार्टी देता है।
मुकेश का अपनापन, प्यार, आदर और उसकी सज्जनता रेखा को प्रभावित कर जाती है। मुकेश के भाई अनिल अग्रवाल और मिट्ठो भाभी से भी रेखा की मुलाक़ात होती है। 

रविवार, 4 मार्च 1990 को मुंबई में रेखा के घर मुकेश अग्रवाल शादी का प्रस्ताव रखते हैं। रेखा की दोस्त सुरिंदर कौर के बार-बार कहने पर रेखा हाँ कर देती हैं। रेखा सुंदर आभूषणों के साथ अपनी पसंदीदा लाल और सुनहरे रंग की कांजीवरम साड़ी पहनती हैं। उसी दिन शाम को मुंबई के मुक्तेश्वर मंदिर में मंत्रोच्चार के बीच दोनों एक-दूसरे को माला पहनाकर शादी कर लेते हैं। 

मुकेश को लेकर रेखा अपनी दोस्त हेमा मालिनी के घर पहुँचती हैं। हेमाजी और धरम पाजी हॉल में मौजूद हैं। दुल्हन के वेश में रेखा को देखकर हेमा मालिनी कहती हैं, प्लीज, ये मत कहना कि इस आदमी से तुमने शादी कर ली है।
रेखा हँसते हुए हेमा के गले लगती हैं और कहती हैं कि इसी से शादी की है मैंने। हेमाजी पूछती हैं, बहुत पैसेवाला है क्या? रेखा कुछ नहीं बोलतीं। फिर रेखा और मुकेश मुँह मीठा करके घर लौट आते हैं। 

शादी के 24 घंटे बाद दोनों हनीमून के लिए लंदन पहुँच जाते हैं। लंदन में शुरुआती दिन बहुत खूबसूरत हैं। रेखा प्यार से मुकेश से कहती हैं कि मुझे छोड़ना मत। अगर छोड़ना भी होगा तो मुझे माँ बनने के बाद ही छोड़ना। 

मुकेश कसमें खाने लगता है कि सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता। रेखा देखती हैं कि 37 साल की उम्र में मुकेश इतनी दवाइयाँ क्यों खा रहे हैं। उनके पूछने पर मुकेश कहते हैं कि मेरी ज़िंदगी में भी एक एबी है। 

सबको पता है कि रेखा का एबी कौन है। लेकिन मुकेश बताते हैं कि मेरे एबी का नाम आकाश बजाज है, जो मेरे मनोचिकित्सक हैं। पिछले दस साल से वह मेरा इलाज कर रहे हैं।
रेखा को अब पता चलता है कि मुकेश की डिप्रेशन की बीमारी जेनेटिक है। कुछ साल पहले अपनी गर्लफ्रेंड से पहला ब्रेकअप होने के बाद वह आत्महत्या की कोशिश भी कर चुके हैं। रेखा उनके जीवन की इन सारी बातों से अब तक अनजान हैं।
भारत लौटने के बाद 15 अप्रैल 1990 को रेखा की माँ पुष्पावल्ली और पिता जेमिनी गणेशन की मौजूदगी में प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में रेखा और मुकेश वैदिक रीति-रिवाजों के साथ फिर से शादी करते हैं। 

भूतपूर्व दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार उस समय चाणक्यपुरी के डीसीपी हैं। वह मुकेश अग्रवाल से परिचित हैं। वे बताते हैं कि मुंबई में कुछ गिने-चुने फ़िल्मी दोस्तों के लिए मुकेश और रेखा ने सेंटोर होटल में पार्टी दी। पार्टी के बीच मुकेश को डिप्रेशन होने लगता है। वह होटल के कमरे से नीरज कुमार को फ़ोन करते हैं कि ज़िंदगी में कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। दिल कर रहा है कि समंदर में कूदकर मर जाऊँ।
नीरज कुमार उन्हें समझाते हैं और फिर रेखा को उनके समंदर में छलांग लगाने की बात बताते हैं। रेखा बीच में पार्टी छोड़कर उन्हें लेकर घर चली जाती हैं। 

तभी रेखा की फ़िल्म "आज़ाद देश का गुलाम" रिलीज़ होती है और सुपरहिट हो जाती है। रेखा मुकेश को अपने लिए लकी चार्म मानती हैं। रेखा फ़िल्मी दुनिया से दूर दिल्ली के महरौली फार्म हाउस में फूल, पत्तियों और पेड़-पौधों के बीच सुकून का वक़्त बिताना चाहती हैं।

लेकिन मुकेश के लिए पार्टी ज़रूरी है। हर रोज़ बड़े-बड़े बिजनेसमैन, मशहूर हस्तियों और दोस्तों के बीच रेखा आकर्षण का केंद्र बनती हैं। रेखा अपने पति के साथ अकेले में वक़्त बिताने के लिए बेताब हैं, जबकि मुकेश बिना पार्टी या दावत के रह नहीं सकते।
रेखा को एहसास होने लगता है कि मुकेश को एक ट्रॉफी पत्नी चाहिए, जिसे दुनिया के सामने वह रोज़ दिखा सकें।
1990 में मुकेश को बिजनेस में बड़ा नुकसान होता है, लेकिन वह रेखा को इसकी भनक तक नहीं लगने देते। उन्हें पता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी से रेखा की अच्छी जान-पहचान है। इसलिए वह चाहते हैं कि रेखा विपक्ष के नेता राजीव गांधी से उनकी एक मीटिंग करा दें। वह मीटिंग के लिए रेखा पर दबाव बनाते हैं, लेकिन रेखा उसे टाल देती हैं। 

रेखा अपनी फ़िल्म "शेषनाग" के अलावा कुछ फ़िल्मों की शूटिंग में व्यस्त रहने लगती हैं। मुकेश चाहते हैं कि रेखा फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़कर उनके साथ दिल्ली में वक़्त बिताएँ। दोनों के बीच गर्मागर्म बहस होने लगती है। रेखा अचानक दिल्ली आना बंद कर देती हैं। 

मुकेश का डिप्रेशन बढ़ने लगता है। अगस्त में मुकेश अग्रवाल दवाइयों का ओवरडोज़ ले लेते हैं। अभिनेत्री रेखा ने मुकेश अग्रवाल को आत्महत्या की राह पर धकेला जैसी सुर्खियाँ अख़बारों में छपने लगती हैं। फिर भी रेखा उनसे मिलने दिल्ली नहीं जातीं। वह मिट्ठो भाभी से समाचार पूछकर फ़ोन रख देती हैं। 

मुकेश अग्रवाल अपनी मिट्ठो भाभी के साथ मुंबई पहुँचते हैं और रेखा के घर उनसे मिलने जाते हैं। लेकिन रेखा दोनों से नहीं मिलतीं। रेखा की दोस्त फ़रज़ाना के सामने मुकेश फूट-फूटकर रोते हैं कि मेरी मुलाक़ात सिर्फ़ एक बार उनसे करा दो।
दिल्ली लौटने के बाद मुकेश को रेखा की ओर से तलाक़ का नोटिस जाता है। बीना रमानी रेखा से बात करके सुलह कराने की कोशिश करती हैं, लेकिन रेखा को इस शादी का कोई भविष्य नज़र नहीं आता। 

10 सितंबर 1990 को रेखा और मुकेश आख़िरी बार फ़ोन पर बात करते हैं और दोनों तलाक़ के लिए राज़ी हो जाते हैं।
26 सितंबर 1990 को रेखा स्टेज शो करने के वास्ते अमेरिका के लिए उड़ान भरती हैं। मुकेश लोगों से मिलना-जुलना बंद कर देते हैं। वह निराशा और हताशा के गर्त में गिरते जाते हैं।
2 अक्टूबर 1990। पूरा देश छुट्टी के साथ गांधी जयंती मना रहा है। उस दिन डेढ़ बजे दिन में महरौली के फार्म हाउस पर मुकेश रेखा का दुपट्टा गले में लगाकर सीलिंग फैन से लटक जाते हैं और दुनिया को अलविदा कह देते हैं। अपनी आत्महत्या के लिए वह किसी को दोषी नहीं ठहराते। 

फ़िल्म स्टार रेखा के पति मुकेश अग्रवाल ने आत्महत्या की—यह हेडलाइन अख़बारों और टीवी की सुर्खियाँ बन जाती है।
रेखा को इस घटना की ख़बर दी जाती है, लेकिन वह अमेरिका से स्टेज शो छोड़कर नहीं आतीं। देश में रेखा की फ़िल्म "शेषनाग" चल रही है। मुकेश अग्रवाल की मौत से लोग इतने आहत होते हैं कि "शेषनाग" के पोस्टर पर रेखा के चेहरे को काले रंग से पोत दिया जाता है। 

रेखा देश के लिए नेशनल खलनायिका बन जाती हैं।
फ़िल्मकार सुभाष घई वक्तव्य देते हैं कि मुकेश अग्रवाल के अंतिम संस्कार में रेखा को हिस्सा लेना चाहिए, क्योंकि अभी तक उनका तलाक़ नहीं हुआ है। वह मुकेश की विधवा हैं।
एक निर्माता कहते हैं कि अब कोई भी शरीफ़ आदमी फ़िल्म अभिनेत्रियों से शादी नहीं करेगा। 

मुकेश के भाई अनिल अग्रवाल वक्तव्य देते हैं कि मेरे भाई को मारकर उसे क्या मिला... क्या उन्होंने हमारी दौलत के लिए शादी की थी? 

सबके वक्तव्य रेखा चुपचाप पढ़ती और सुनती रहती हैं, लेकिन अपनी ज़बान नहीं खोलतीं। उनके हाथ से कई फ़िल्में चली जाती हैं। रेखा ख़ामोशी से अपने ख़िलाफ़ लोगों के बयान और ताने सुनती रहती हैं।
एक फाइटर की तरह वह हर चुनौती का सामना करती हैं और फिर उसी ऊर्जा और उत्साह के साथ 1991 में "फूल बने अंगारे" से धमाकेदार वापसी करती हैं।