प्रयागराज से मुंबई तक फैले कपूर कुल की यह वह कहानी है जिसे जानना आज कम ही लोगों को नसीब होता है। राजकीय परिवार में जन्मे सुमेरित नायकों में शुमार पृथ्वीराज कपूर के शान-ओ-शौकत के बीच, सुरिंदर कपूर नाम का एक युवक 1950 में पेशावर से मुंबई आया। वह अपने सगे चचेरे भाई पृथ्वीराज कपूर के पास मदद की आस लेकर पहुँचा। पृथ्वीराज ने न सिर्फ़ स्वागत किया बल्कि सुरिंदर को फ़िल्मों के दरवाज़े भी खोले; फ्रंटियर मेल से उतरते ही वे उन्हें मशहूर निर्देशक के. आसिफ के पास ले गए और युवा सुरिंदर को मुग़ल-ए-आज़म की शूटिंग पर सहायक निर्देशक के रूप में जगह मिली।
शहर में नई शुरुआत के समय सुरिंदर और उनकी पत्नी ने पृथ्वीराज के गैरेज के ऊपर बने छोटे से चौसा घर में ठहरना पड़ा—वह स्थान सामान्यत: चालक के रहने का था। बाद में परिवार तिलक नगर के एक झुग्गी-औ-चाल में गया जहाँ उनके चार बच्चे—बॉनी, अनिल, रीना और संजय बड़े हुए। सुरिंदर ने सहायक निर्देशक से निर्मातृ की राह पकड़ी और अपनी सत्कारिकता के तहत पहली फ़िल्म 'जब से तुम्हें देखा' बनवाई, पर वह व्यावसायिक सफलता न बन सकी। कर्ज़ और निराशा के दिनों में परिवार पर संकट के बादल छा गए।
फिर उनके पुत्रों ने भाग्य बदलने की ठानी; बॉनी ने निर्माण संभाला और अनिल ने अभिनय से अपनी अलग पहचान बनाई। आज दोनों कपूर कुल—पृथ्वीराज के वंशज और सुरिंदर के उत्तराधिकारी—भारतीय फिल्म जगत की प्रमुख शक्लें बनकर खड़े हैं, जो परिवार, संघर्ष और सहयोग की जीवंत मिसाल हैं।
