हिमांशु राज-
बॉलीवुड की जानी-मानी स्टार हेमा मालिनी ने हालिया इंटरव्यू में अपने फिल्मों के लिए मिलने वाली फीस और उस दौर की सच्चाईयों पर खुलकर बात की। 1960 के दशक में सिनेमा में कदम रखने वाली हेमा ने बताया कि उन्हें कभी महसूस नहीं हुआ कि वे "हाईएस्ट पेड" कलाकारों में हैं — बल्कि उस समय कलाकारों को मिलने वाली रकम आज के मानदंडों से बहुत कम थी।
हेमा ने इंटरव्यू में कहा कि उनके करियर के शुरुआती और पीक वर्षों में पैसों की उम्मीद कभी प्राथमिकता नहीं रही। "मैंने कभी पैसों के लिए काम नहीं किया," उन्होंने स्पष्ट किया। नाम व शोहरत बढ़ने पर फीस में थोड़ी बढ़ोतरी होती रही, पर उस समय की आय इतनी अधिक नहीं थी जितनी आज के कलाकार पाते हैं। उस दौर की फिल्मों और मिली पहचान उनके लिए किसी भी रकम से ऊपर थी।
एक सवाल पर कि क्या वे कभी फीस दर्ज करवा कर इंजीनियरिंग की तरह मांग रखती थीं, हेमा ने मना किया। उन्होंने बताया कि भुगतान के मामलों में परिवार का योगदान अहम रहा — खासकर उनकी मां। "हमने कभी प्रोड्यूसर से कठोर या शर्तिया मांग नहीं की। जो भी मिलता, स्वीकार करते थे," उन्होंने याद करते हुए कहा। कई बार छोटे-छोटे लिफाफों में भुगतान मिल जाता था, जिसे उनकी टीम स्वीकार कर लेती थी और काम को प्राथमिकता देती थी।
हेमा ने यह भी कहा कि फिल्मों के चुनाव और निभाई गई भूमिकाओं का मूल्य केवल आर्थिक आंकड़ों में नापना ठीक नहीं। जिन फिल्मों ने उन्हें पहचान और स्थायी जगह दी — चाहे वह 'शोले' हो या 'सीता और गीता' — उनका महत्व पैसे से कहीं अधिक रहा। उन्होंने यह महसूस किया कि सिनेमा की लगन, चुनौती और कला का सम्मान ही असली इनाम है।
आज के समय की तुलना में पुराने जमाने के कलाकारों को मिलने वाली फीस कम थी, पर हेमा का कहना है कि उस कमी के बावजूद उन्होंने जो काम किया, वह संतोष और पेशेवर गरिमा से भरा रहा। उनके अनुभव से यह भी उभर कर आता है कि कई बार रिश्ते, समझ और पारिवारिक समर्थन ने आर्थिक लेन-देन से बढ़कर मायने रखे।
हेमा मालिनी की यह टिप्पणी केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा का बयान नहीं है; यह बॉलीवुड के उन दिनों के परिदृश्य की भी झलक देती है जब कलाकारों की प्राथमिकताएं और मूल्यांकन अलग तरह के होते थे। उसके साथ ही यह भी दर्शाती है कि कैसे समय के साथ कलाकारों के लिए पैसे के मायने बदले हैं, पर कुछ के लिए कला और पहचान आज भी सबसे ऊँची प्राथमिकता बनी हुई है।