डॉ श्याम किशोर मिश्रा-
कुंदन लाल (के. एल.) सहगल 11 अप्रैल 1904 को जम्मू में जन्मे और 18 जनवरी 1947 को जालंधर में उनका निधन हुआ। उनकी आवाज़ और अभिनय ने 1930-40 के दशक में हिंदी सिनेमा और शास्त्रीय-गजल शैली पर अमिट प्रभाव छोड़ा। उन्हीं दिनों जब पार्श्व गायकी और अभिनय का मेल नई पहचान बना रहा था, सहगल ने दोनों कला-क्षेत्रों में ऐसे मील के पत्थर स्थापित किए कि उन्हें अक्सर हिंदी सिनेमा का पहला बड़ा गायक-कलाकार कहा जाता है।
जन्म और प्रारम्भिक जीवन से जुड़ी यादें बताती हैं कि सहगल का पारिवारिक परिवेश धार्मिक और संगीत-प्रवृत्त था। माता केसरबाई के साथ वे स्थानीय भजन-समारोहों में अक्सर जाया करते थे और घर पर सुने जाने वाले भजनों ने उनकी गायकी की बुनियाद रखी। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी और रेलवे व रेमिंग्टन टाइपराइटर जैसी नौकरीयों ने उन्हें जीवन के रंग-बिरंगे अनुभव दिये। एक प्रसिद्ध किस्सा यह है कि सहगल के शुरुआती अभियानों में उनकी आवाज़ की पहचान इतनी खास थी कि लोकल थिएटरों और मेलों में लोग उनसे मिलने आए करते थे—यही उत्साह उन्हें आगे फिल्मी दुनिया तक ले गया।
कलकत्ता में न्यू थिएटर्स से जुड़ने के बाद सहगल की प्रतिभा को बी. एन. सरकार और उस युग के अन्य फिल्म-निर्माताओं ने सराहा। 1933 की 'पूरन भगत' और 1934 की 'चंडीदास' जैसी फिल्में उन्हें लोकप्रियता दिलाने में निर्णायक रहीं। सहगल के बारे में अक्सर सुनने वाली बात यह है कि वे गाने के साथ-ही अभिनय से भी मनोभावों को इस तरह व्यक्त करते थे कि पर्दे पर उनका हर हाव-भाव और स्वर सजीव लगते थे। कई पुरानी पत्रकारिक प्रतिक्रियाएँ और आलोचनात्मक समीक्षा यह बताती हैं कि उस दौर के दर्शक सहगल को सिर्फ़ गायक नहीं, बल्कि भाव-सम्राट मानते थे।
1935 की पी. सी. बरुआ द्वारा निर्देशित 'देवदास' सहगल के करियर का सर्वाधिक चर्चित अध्याय है। शरत्चंद्र के वियोगी नायक के रूप में सहगल ने प्रेम-दुख और आत्म-विनाश दोनों ही भावों को गहनता से प्रस्तुत किया। कहते हैं कि शूटिंग के दौरान वे अपने चरित्र के भावों में इतने गर्क हो जाते थे कि सहगल की आँखों में वास्तविक जीवन का दर्द झलक उठता—यह बात साथ काम करने वालों और समकालीन पत्रकारों ने कई बार लिखी। फिल्म के गीतों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि समारोहों व सार्वजनिक उत्सवों में 'बालम आए बसो मोरे मन में' और 'दुख के दिन अब बीतत नाहीं' कई वर्षों तक आवाज़ दी जा रही थीं।
सहगल की मुंबई वापसी और रणजीत मूवीटोन के साथ काम ने उन्हें नए आयाम दिए। 'भक्त सूरदास' व 'तानसेन' में उनकी प्रस्तुतियाँ सांस्कृतिक और शास्त्रीय धरातल पर ठोस रही। 1946 की 'शाहजहां' और उसमें नौशाद के संगीत निर्देशन में गाया गया 'जब दिल ही टूट गया' आज भी हिन्दी सिनेमा के दर्द भरे, भावपूर्ण गीतों में शुमार है। एक प्रसिद्ध स्मृति यह भी है कि इस गीत की रिकॉर्डिंग के समय सहगल की आवाज़ में जो कड़वाहट और टूटन थी, उसे नौशाद और संगीतकार स्वयं ही चकित होकर सुनते रहे—कई पुरालेखात्मक साक्ष्यों में यह उल्लेख मिलता है कि सहगल रिकॉर्डिंग में भावनात्मक रूप से इतना डूब जाते थे कि तकनीकी निर्देश भी उन्हें बहका नहीं पाते थे।
गायन-शैली की बात करें तो सहगल के स्वर में भारीपन और गहरे अर्थों का मेल था। वे शब्दों के उच्चारण में इतना ध्यान रखते थे कि श्रोता हर शब्द के पीछे के अर्थ-सूत्र को महसूस कर लेता। इसीलिए बाद के कई महान गायकों ने सहगल को आदर्श माना। मुकेश पर तो सहगल का प्रभाव इतना स्पष्ट था कि मुकेश के आरम्भिक रिकॉर्डिंग-आलोचनाओं में उनकी शैली को सहगल की छाया में देखा गया। लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी समेत कई दिग्गजों ने भी सार्वजनिक रूप से माना कि सहगल की भाव-प्रदीप्त गायकी ने उन्हें प्रभावित किया।
सहगल की गजल प्रस्तुतियाँ और कक्षा (क्लासिकल) झलकें भी कम चर्चित नहीं रहीं। मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों को उन्होंने जिस संवेदनशीलता से अपने स्वर में पिरोया, उसे आज भी गजलप्रेमी याद करते हैं। कहा जाता है कि सहगल की ग़ज़ल-रेंजर की आवाज़ सुनकर दिल्ली और मुंबई के कई साहित्यिक दौरों में उनकी काफी सराहना हुई। कुछ लेखकों ने उल्लेख किया है कि सहगल की ग़ज़लों में फिल्मीपन की बजाय शुद्ध साहित्यिक भावना अधिक सुनाई देती थी।
उनके निजी जीवन से जुड़ी कुछ प्रसिद्ध, सार्वजनिक स्मृतियाँ दुखद भी हैं। सहगल के शराब की लत के बारे में कई समकालीन लेख और बाद के संस्मरण बताते हैं कि यह आदत धीरे-धीरे उनकी कलात्मक क्षमता को प्रभावित करने लगी। कई कहानियाँ बताती हैं कि वे मंच पर और रिकॉर्डिंग स्टूडियो में भी कभी-कभी शराबी हालत में दिखाई दिए। साथ ही एक लोककथा जैसी बात यह भी प्रचलित है कि सहगल का मानना था कि मदिरा उनके अंदर के 'दर्द' को उजागर करती है और बिना उसके उनकी गायकी 'सच्ची' नहीं होती—यह मानसिकता उनके लिए घातक साबित हुई। 18 जनवरी 1947 को उनका निधन हो गया, और उनके असामयिक प्रस्थान को लेकर कई पत्रकारों ने उस समय गंभीर चिंता जताई थी कि भारतीय संगीत एक अनूठी आवाज़ खो चुका है।
के. एल. सहगल की कला और उनकी स्मृतियाँ यह दिखाती हैं कि वे सिर्फ गीत गाने वाले कलाकार नहीं थे; वे भावों के गवर्नर और कहानियों के व्याख्याता थे। उनकी विरासत में पार्श्व गायकी तथा अभिनेता-गायक का समन्वय प्रमुख है, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए मानदंड छोड़ा। आज भी पुराने रिकॉर्ड, रेडियो-आर्काइव और श्रोता-संस्मरणों में उनकी आवाज़ की खोली हुई गहराई सुनने को मिलती है—यही कारण है कि उन्हें 'शहंशाह-ए-मौसिकी' के रूप में याद किया जाता है और उनका संगीत नई पीढ़ियों तक पहुँचता रहता है।