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डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव की कविता में देशभक्ति के विविध रंग

डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव की कविता में देशभक्ति के विविध रंग

स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता, एकता और सांस्कृतिक विविधता को स्मरण करने का अवसर भी है। इस अवसर पर अभिनेता, कवि और लेखक डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव की कृति ‘रंग-केसरिया’ राष्ट्रप्रेम की भावपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में सामने आती है। कविता में तिरंगे के तीनों रंगों और अशोक चक्र के माध्यम से भारत की शक्ति, शांति, समृद्धि और विविधता को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
केसरिया रंग त्याग, साहस, प्रेम और बलिदान का प्रतीक है। सफेद रंग हिमालय जैसी शांति और पवित्रता का भाव जगाता है, जबकि हरा रंग धरती, अन्न और जीवन की आशा से जुड़ता है। अशोक चक्र को कवि सुदर्शन चक्र की प्रबल शक्ति के रूप में देखते हैं, जो अन्याय और शत्रुता के विनाश का संदेश देता है।
कविता में भारत की ऋतुओं, प्रकृति और लोकजीवन के अनेक रंग भी दिखाई देते हैं। कवि के लिए भारत केवल तिरंगे में नहीं, बल्कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैली उसकी विविध वेशभूषाओं, भाषाओं, परंपराओं और आस्थाओं में भी बसता है। भजन, अज़ान और गुरुवाणी का एक साथ गूँजना भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी भावना को रेखांकित करता है।
कृति में कबीर, सूर, तुलसी और रसखान का स्मरण भारतीय सांस्कृतिक चेतना की व्यापकता को सामने लाता है। यह कविता बताती है कि भारत की पहचान किसी एक रंग या विचार तक सीमित नहीं, बल्कि अनेक रंगों के सुंदर मेल से बनी है। ‘रंग-केसरिया’ तिरंगे के माध्यम से उस भारत का गीत है, जहाँ विविधता में एकता और सभी आस्थाओं के प्रति सम्मान उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

“रंग-केसरिया”

निखर आए है तेरा रंग, केसरिया रंग में।
प्रेम की साध्वी सदृश, रंगी पावन रंग में॥
हिमाद्रि तुंग शृंग शुभ्र तेरा दर्शन है,
दिखे तू शान्त निष्कलंक श्वेत रंग में।
तू धानी रंग में, अन्नपूर्णा सी लगती है,
क्षुधा मिटाए जो रंग दे धरा धानी रंग में।
ये नीला चक्र सुदर्शन की प्रबल शक्ति है,
करे है शत्रु नाश रंग दे उन्हें लहू रंग में।
ऋतु बसंत में धारण जो सप्त रंग करो,
तो व्योम इन्द्रधनुष सा दिखे नए ढंग में।
तेरे शमशान में भी दीखता है फागुन रंग,
दिखे उन्माद जैसे वायु घुली हो भंग में।
तिरंगे में रंगा कश्मीर से कन्याकुमारी,
भिन्न है वेश भाषा पर सभी भारत रंग में।
कहीं भजन कहीं अज़ान गुरुवाणी गूँजे,
सभी की प्रार्थना में तू प्रभू पृथक रंग में।
सनातन रंग की माया ही कुछ निराली है,
कबीर सूर तुलसी रसखान सब तेरे रंग में।

— डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव