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"कॉपी से नहीं, ओरिजिनैलिटी से बनती है पहचान": आनंद राज आनंद

"कॉपी से नहीं, ओरिजिनैलिटी से बनती है पहचान": आनंद राज आनंद

हिमांशु राज-

वर्तमान की फिल्मी दुनिया में जब भी कोई चार्टबस्टर आता है, उसके बाद उसे दोहराने की कोशिशें भी तेज हो जाती हैं। पर मशहूर संगीतकार आनंद राज आनंद का मानना है कि सफलता की नकल करना सबसे बड़ी भूल है। जब उन्होंने 'जलेबी बाई' बनाई, वह इसी सिद्धांत के कारण किसी मौजूदा हिट की नकल करने से इनकार कर बैठे थे।
उन्होंने याद किया कि जब 'शिला की जवानी' छाई हुई थी, लोग उनसे उसी टेम्पलेट पर कुछ बनाने के लिए कह रहे थे। आनंद बताते हैं, "अगर कोई मुझे कहे कि फिर से 'दिल दे दिया है' जैसा बनाओ, तो मैं बस उसका कमजोर वर्शन बनाकर दूँगा। हर सफल गीत की अपनी अलग पहचान होती है।" इसलिए उन्होंने ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय कुछ नया खोजने की ठानी। कई घंटों की रचनात्मक सोच का कुछ न बनते-बनते एक देर रात की डिनर के दौरान वेटर ने जब डेज़र्ट बोलते हुए "जलेबी है, भाई" कहा, तो वे शब्द उनके दिमाग में टिक गए और 'जलेबी बाई' की नींव वहीं से पड़ी।
आनंद कहते हैं कि प्रेरणा अक्सर अनपेक्षित स्थानों से आती है। "हम कम्पोज़रों को हमेशा सुनना होता है; साधारण बातचीत भी अगर आप रिसेप्शटिव हों तो शानदार विचार बन सकती है।" वे मानते हैं कि श्रोताओं को सचमुच का संगीत और नकली कोशिशों में फर्क तुरंत दिखाई देता है। लोग नकल से मोह नहीं खाते, उन्हें वही चीज़ भाती है जो उन्होंने पहले न सुनी हो।
आज भी वे नवोदित संगीतकारों को यही सलाह देते हैं—महान संगीत से प्रेरणा लो, पर उसे डुप्लिकेट मत करो। ट्रेंड गुजर जाते हैं; असलियत ही पहचान बनती है। उनके लिए एक गीत तभी कामयाब है जब वह स्वयं निर्माता को भी चौंका दे—तब समझो कुछ नया मिल गया।