हिमांशु राज़
बनारस की सुबह और उसकी कचौड़ी काशी में जीवंत रहते मोक्ष का एक अलग ही पर्याय मानी जाती है। जहाँ एक ओर शरीर से मन, और मन से आत्मा की विरक्ति का आध्यात्मिक पक्ष बनारस की पहचान रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वाद से समाधि की जो अनूठी परंपरा है, वह सबसे सघन रूप में कचौड़ी–सब्ज़ी के बिना पूरी ही नहीं होती। गंगा किनारे ध्यान की आँखें मूँदने के साथ–साथ, शहर की गलियों में कड़ाही की तरफ उठती भूखी नज़रों में भी एक तरह की तल्लीनता दिखाई देती है; जैसे साधक ध्यान में लीन होता है, वैसे ही बनारसी अपने पहले कौर में डूबा दिखाई देता है।
सुबह–सुबह काशी की गलियों में निकलिए तो लगेगा जैसे यह शहर दो ही चीज़ों के इर्द–गिर्द घूमता है – गंगा और कचौड़ी–सब्ज़ी। बाकी सब, धर्म, दर्शन, राजनीति, विकास – सब बाद में जुड़ी हुई फुटनोट जैसी चीज़ें हैं। घाटों पर आरती उतर रही होती है, शंख बज रहे होते हैं, पर कई लोगों की नज़र उस कड़ाही पर टिकी रहती है जिसमें कचौड़ी छन रही होती है। भक्ति एक तरफ, भूख दूसरी तरफ, और बीच में खड़ा बनारसी अक्सर दुविधा में रहता है कि पहले “हर–हर महादेव” बोले या “भैया, दो कचौड़ी एहर भी।”
बनारस की कचौड़ी की सबसे सुंदर बात यह है कि वह बिल्कुल बनारसी है – थोड़ी जिद्दी, थोड़ी अक्खड़, और पूरी तरह देसी। यहाँ कचौड़ी मैदे से नहीं, गेहूं के आटे से बनती है। आटा थोड़ा सख्त गूँथा जाता है, जैसे शहर के बूढ़े पंडित की राय – न ज़्यादा नरम, न ज़्यादा झुकने वाला। जब इस आटे की गोलियाँ बेलकर कड़ाही में फिसलती हैं तो उड़द की दाल, अदरक, हरी मिर्च और हींग वाला भरावन अंदर से फूलकर ऐसी शान दिखाता है, जैसे कोई लोकल नेता माइक देखते ही अचानक ओजस्वी हो जाए। रात भर भिगोई गई उड़द की दाल मसालों के साथ भूनकर कचौड़ी के भीतर बैठती है, तो हर कौर में हल्का–सा तेवर, थोड़ा तड़का और थोड़ी तुनक मिलती है – बिल्कुल वैसी ही, जैसी किसी चौराहे की बहस में खांटी बनारसी की आवाज़।
सब्ज़ी के मामले में भी बनारस का मिज़ाज वही – अकेली सब्ज़ी नहीं, गठबंधन वाली सब्ज़ी। बाकी शहर जहाँ सिर्फ आलू पर संतोष कर लेते हैं, यहाँ कद्दू, आलू, मौसमी सब्ज़ियाँ, बोड़ा, कहीं–कहीं मखाना और पनीर तक एक ही भगौने में पकते हैं। ऊपर से सरसों के तेल में पंचफोरन, हींग, लाल मिर्च, हल्दी, अमचूर और कसूरी मेथी – सब मिलकर सब्ज़ी को इतना ठस्स और गाढ़ा बना देते हैं कि चम्मच भी अंदर डाला जाए तो दो पल सोचकर ही बाहर आए। थाली में यह सब्ज़ी किसी एक सब्ज़ी का नहीं, पूरे शहर की मिली–जुली नागरिकता का स्वाद लगती है।
कभी एक दौर था जब सुबह छः बजे से पहले–पहले कचौड़ी की दुकानों के सामने लगने वाली कतारें लोकतंत्र की सबसे ईमानदार लाइनें लगती थीं। पंडित, रिक्शेवाला, छात्र, दुकानदार, बाबू, सैलानी – सब एक ही कड़ाही की प्रतीक्षा में खड़े। चुनाव में वोट देने से ज़्यादा तत्परता लोग इस बात पर दिखाते थे कि “आज वाली कचौड़ी मिली या देर हो होइ।” मधुर मिलन से लेकर राम भंडार तक, हर दुकान ने अपना–अपना ब्रांड बना लिया। कोई कहता, “हमारी कचौड़ी में असली बनारसी टेस्ट है”, कोई दावा करता कि “हम ही शुद्ध घी के वारिस हैं।” खाने वालों की फेहरिस्त भी मामूली नहीं – इस शहर की कड़ाही से पद्मश्री से लेकर भारत रत्न तक के पेट का रिश्ता रहा है; दर्शन और भोजन, दोनों के रजिस्टर में कई नाम साझा हैं, बस एक पर फोटो छपते हैं, दूसरे पर सिर्फ उधार खाता।
और इन बड़े–बड़े नामों के बीच, मुहल्लों और नुक्कड़ों के अपने–अपने सितारे हैं। दीना गुरु की छोटी कचौड़ी – हींग वाली – अपने आप में एक अलग क़िस्म का लोककथात्मक स्वाद है। छोटी, गोल, पर असरदार; भरावन में हींग की ऐसी मौजूदगी कि कड़ाही से उठता धुआँ भी अपना परिचय दे दे – “हम दीना गुरु की तरफ से आ रहे हैं।” प्लेट में चार–छह रख दीजिए तो लगेगा जैसे कोई बनारसी बैंड–बाजा पार्टी कतार से खड़ी है – हर एक की अपनी आवाज़, पर सब मिलकर हीरोगिरी दिखाते हैं। दीना गुरु की इस छोटी कचौड़ी का फायदा–नुकसान दोनों यही कि खाने वाला हमेशा गिनती भूल जाता है – “बस एक और”, कहते–कहते पूरा दिन गुरुग्रह में बीत जाता है।
दूसरी तरफ, चाची की लंका वाली कचौड़ी का किस्सा और है। लंका चौराहे के आसपास की हवा में वैसे ही छात्र राजनीति, कोचिंग, किताबों और बहसों का घमासान रहता है, उस पर चाची की कचौड़ी ने अपना अलग अखाड़ा बना रखा है। चाची अब रही नहीं, पर उनकी वंश–परंपरा के अनुवाहकों ने मोर्चा संभाला हुआ है, क्योंकि चाची की कड़ाही के सामने न कोई आयु–सीमा थी, न कोई विचारधारा – टॉपर से लेकर बैक पेपर तक, सब एक प्लेट पर बराबर। चाची का अंदाज़ भी कम दिलचस्प नहीं था – वह कचौड़ी पर जितना नमक–मिर्च डालती थीं, उतना ही अपनी बातों में भी। कोई ज़्यादा नखरा दिखाए तो आधी गाली–डाँट, आधा दुलार देकर कहतीं – “बाबू, इतना ही हिसाब–किताब करना है तो पहले नौकरी कर लो, तब कचौड़ी में कटौती करना।” चाची की दुकान पर कचौड़ी के साथ थोड़ी सलाह, थोड़ी चुहल और थोड़ी लोकलोकायत मुफ्त मिलती रही, जो आज भी उनकी याद के साथ चलती है।
इन तमाम ब्रांडों और ठिकानों के बीच भी, बनारस की कचौड़ी–संस्कृति का असली आधार वे लोग रहे हैं, जो बिना किसी ऑफिसियल पद के, गुणवत्ता के लोकपाल बने बैठे थे। पक्का महाल की गलियों में छन्नू गुरु और टुन्नू सरदार जैसे पात्र इसी बिरादरी से आते हैं। ये दोनों सुबह–सुबह कचौड़ी लेकर एक साइड हटते, पहला कौर मुँह में डालते, आँख ज़रा सिकुड़ती, भौं हल्की चढ़ती, और अगर आज स्वाद में ज़रा भी कमी हुई, तो एक वाक्य गूंजता – “गुरु, माल कमजोर बना है।”
यह “माल कमजोर बना है” चार शब्दों का संवाद नहीं, पूरा लोक–फतवा होता था। दुकानदार की हालत ऐसी हो जाती जैसे किसी ने उसे खुले बाजार में नंगा आईना दिखा दिया हो। तुरंत बचाव में जाने की बजाय वह आधी शर्म, आधी हँसी के साथ सिर हिलाता – “ठीक कर देंगे गुरु, आज ही सुधारते हैं।” उसी शाम मसालों की मीटिंग, दाल की समीक्षा, आटे की नमी की जांच, तेल–घी की क्वालिटी पर पुनर्विचार – सब शुरू हो जाता। अगले 24 घंटे में डैमेज कंट्रोल पूरा, और दूसरे दिन अगर छन्नू गुरु और टुन्नू सरदार दोनों प्लेट चुपचाप साफ करके बस “आज बढ़िया है” भर कह दें, तो समझिए कचौड़ी ने अपना नागरिकता–प्रमाणपत्र वापस हासिल कर लिया। किसी रिव्यू ऐप की ज़रूरत नहीं, दो–चार खाँटी बनारसी ही पर्याप्त थे किसी दुकान को सीधा रास्ता दिखाने के लिए।
अब बनारस बदल गया है। शहर पर्यटकों का क्षेत्र बन चुका है, और यह बात अच्छी भी है, मुश्किल भी। कचौड़ी की दुकानों की संख्या कई गुना बढ़ गई है, कड़ाहियाँ शहर–भर में खदबदाती दिखती हैं। खाने वालों की संख्या पहले से बहुत ज़्यादा हो गई है, पर खाने का रिश्ता हल्का पड़ गया है। पहले कचौड़ी रोज़मर्रा की आदत थी, अब कई जगह केवल “टूरिस्ट आइटम” है। प्लेट से पहले कैमरा उठता है, कौर से पहले फोटो खिंचती है, और कचौड़ी की गर्मी से ज़्यादा मोबाइल की फ्लैश चमकती है।
यही वजह है कि कई जगहों पर कचौड़ी की संख्या तो बढ़ गई, पर उसकी आत्मा कहीं बोझिल–सी लगती है। क्वालिटी से खिलवाड़ शुरू हो गया – तेल बदला, मसाले सस्ते किए गए, दाल में “एडजस्टमेंट” हुआ, और स्वाद का पुराना अनुशासन ढीला पड़ने लगा। अब दुकानदार जानते हैं कि बहुत–से ग्राहक बस गुजरने वाले यात्री हैं – शिकायत करेंगे भी तो चंद मिनट बाद ट्रेन पकड़ लेंगे, या होटल लौट जाएंगे। उन्हें वह लगातार, रोज़–रोज़ वाला जवाबदेह बनारसी ग्राहक कम मिलता है, जो बेझिझक कह सके – “भैया, आज माल कमजोर बना है, संभालो अपने को।”
फिर भी, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। गलियों के अंदर–अंदर, जहाँ आज भी बड़ी गाड़ियाँ नहीं पहुँचतीं, और नक्शों की रेखाएँ कभी–कभी उलझ जाती हैं, वहाँ कुछ छोटे–छोटे ठिकाने अब भी कचौड़ी की असली सुगंध बचाए हुए हैं। वहीं दीना गुरु की हींग वाली छोटी कचौड़ी बिना फोटोशूट के भी बिक जाती है, वहीं चाची की लंका वाली कचौड़ी पर अभी भी बहसें स्वाद से ज़्यादा आइडियॉलॉजी पर होती हैं, और वहीं कोई नया–सा छन्नू, कोई ताज़ा–सा टुन्नू, बिना हिचक के दुकानदार से कह देता है – “गुरु, आज सब्जी में आलू थोड़ा कच्चा हव, पनीर का पीस नाही दिखत हव, थोड़ा हिसाब से बनावा।”
बाज़ार की हवा देर–सबेर गलियों तक पहुँचेगी, और पहुँच भी रही है। ब्रांडिंग, बोर्ड, आउटलेट, पैकेजिंग – कचौड़ी को भी धीरे–धीरे “प्रोडक्ट” बनाने की कोशिश जारी है। विस्तार के साथ सबसे बड़ा संकट यही है कि गुणवत्ता का मापदंड कैसे बचाया जाए। क्या कचौड़ी वही रहेगी – गेहूं के आटे की, उड़द की दाल के तेवर वाली, सरसों के तेल और पंचफोरन की महक वाली – या फिर वह भी एक सामान्य, औसत, फोटो–फ्रेंडली आइटम बनकर रह जाएगी?
काशी की ताकत शायद यहीं है कि वह एक साथ बदलती भी है, और जिद भी करती है। हो सकता है कल को कोई नया मधुर मिलन, नया राम भंडार, नई दीना गुरु और नई चाची, नया छन्नू गुरु और टुन्नू सरदार फिर से क्वालिटी की बहस शुरू करें। कोई युवा बनारसी फूड–लवर, सोशल मीडिया की भाषा में ही सही, पर वही पुराना जुमला दोहराए – “माल कमजोर हव, संभाला गुरु।” उस दिन कचौड़ी–सब्ज़ी की प्लेट में बैठी बनारस की आत्मा एक बार फिर मुस्कुरा उठेगी।
तब तक काशी की कचौड़ी–सब्ज़ी बनारस का नाश्ता ही नहीं, उसका चरित्र–परीक्षण भी बनी हुई है – हर कौर पूछता है कि शहर सिर्फ बाजार बना या अब भी कुछ गलियों, कुछ कड़ाहियों, दीना गुरु की हींग वाली प्लेटों, चाची की लंका वाली झिड़की और छन्नू–टुन्नू की झटकेदार राय में खांटी बनारसी जिद और मौलिकता बची हुई है। यही जिद उसे बाकी शहरों की कचौड़ी से अलग करती है, और यही उसे कहानी, व्यंग्य और स्वाद – तीनों का एक साथ विषय बना देती है।