हिमांशु राज़/पंकज अवस्थी
हिन्दी उपन्यास का वह दौर जब पाठक-समुदाय अभी आकार ले रहा था, तब देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता और उसकी संतति के जरिए एक नई पाठकीय दुनिया खड़ी कर दी। चंद्रकांता की रहस्यमयी तिलिस्मीय कथावस्तु और ऐयारों की चतुराई ने न केवल सामान्य पाठक का मन जीता, बल्कि उसने हिन्दी के उपन्यास-पठन को व्यापक जनमानस तक पहुँचा दिया। खत्री की रचनाएँ—सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक साहित्यिक आधार थीं, जिन पर आगे चलकर आधुनिक हिन्दी उपन्यास कायम हुआ।
देवकीनंदन खत्री का जीवन परिपूर्ण था कल्पना और प्रयोग से, पर अवधि थी कम। आषाढ़ कृष्ण सप्तमी संवत् 1918 में जन्म लेकर वे श्रावण बदी 14 संवत् 1970 (1 अगस्त 1913) को 52 वर्ष की आयु में अवसान तक पहुँचे। मात्र 26 वर्ष की अवस्था में लिखी गयी चंद्रकांता ने उन्हें त्वरित ख्याति दिलाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने नरेन्द्र मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेन्द्र वीर, काजर की कोठरी, भूतनाथ और गुप्त गोदना जैसे दर्जनों लोकरंजक उपन्यास रचे। कुछ रचनाएँ—भूतनाथ व गुप्त गोदना—उनके जीवनकाल में अधूरी रहीं; इन्हें उनके पुत्र व मित्रों ने पूर्ण किया। कुल मिलाकर उनके लिखे उपन्यासों की पृष्ठसंख्या पाँच हजार से कम नहीं बताई जाती है, जो उनके सृजनात्मक उत्साह का प्रमाण है।
खत्री को चंद्रकांता लिखने की प्रेरणा उस समय मिली जब उन्हें बनारस राज्य के चकिया और नौगढ़ के जंगलों का ठेका मिला। विंध्याचल की घाटियाँ, चुनार व विजयगढ़ के किले, पुरानी खोहें और सुरंगें—इन सभी ने उनकी कल्पना को भयानक और रोमांचकारी रंग दे दिया। मित्रों में प्रार्थमिक प्रकटन के बाद बाबू अमीरीसिंह के प्रेस से प्रकाशित हुई यह कृति तत्कालीन पाठक वर्ग के बीच धूम मचा गई। खत्री ने स्थानीय जीवन के पात्रों को अपने उपन्यास में उतारा—घनिष्ठ मित्रों को ऐयारों के रूप में, काशी की मशहूर हस्तियों व वेश्या-संघों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया—जिससे उपन्यासों का यथार्थपन बढ़ा।
खत्री की विशिष्टता रही उनका मिश्रित कालजयी स्वाद—लोककथाओं का सरल और सजीव अंदाज, फारसी तिलिस्मीय किस्सागोई की भव्यता और आधुनिक काल की वैज्ञानिक व्याख्याएँ। चंद्रकांता व संतति में तिलिस्मीय चालें, ऐयारों की नाटकीय हरकतें और रहस्यमयी मकान—इन सबके पीछे खत्री ने सिर्फ कल्पना ही नहीं रखी, बल्कि कई बार वैज्ञानिक और केमियाई स्पष्टीकरण भी दे कर पाठक के संदेह को टालने का प्रयास किया। उन्होंने तिलिस्मों के पीछे लाफिंग गैस, बिजली के तारों और लालटेन जैसी युक्तियों का हवाला दे कर यह दिखाया कि कुछ चमत्कार वास्तविक रसायन और यंत्रों से समझे जा सकते हैं। उनकी व्यक्तिगत जीवन-प्रयोगशाला में मैजिक लालटेन, राल-आग के नाटक और रात में पतंगों के साथ किए गए अजीब कारनामे भी सामिल थे—जो उनकी रचनात्मकता का स्रोत बने।
खत्री ने अपने समय के पाठकों की रुचि को बखूबी समझा। 1868–1888 के हिन्दी-पुस्तक प्रकाशन के संदर्भ में जो किस्से-कहानियाँ प्रचलित थीं—बैताल पचीसी, अमीर हम्जा की दास्तान, कादंबरी इत्यादि—उनकी शैली से मेल खाते हुए खत्री ने एक ऐसी दुनिया बनाई जो पौराणिक, लोककथात्मक और तिलिस्मीय तत्वों को आधुनिकता की छाया से जोड़ती थी। यही मिश्रण शिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित और जनमानस—सभी को लुभाने में सफल रहा। चंद्रकांता की अब तक ढाई लाख से अधिक प्रतियों और संतति की सैकड़ों हज़ार प्रतियों की बिक्री इसका स्पष्ट प्रमाण है। एक युग ऐसा भी रहा जब अनेक पाठकों ने केवल इन उपन्यासों के सौजन्य से हिन्दी सीखना आरम्भ किया।
खत्री के लेखन का काल ऐसा था जब देश परंपरा और नवाचार के बीच खिंचाव में था। रेल, तार, फोटोग्राफी और गैस प्रकाश जैसे आविष्कारों ने लोगों के सोच को बदल दिया था; साथ ही प्राचीन गौरव और ऐतिहासिक खोजों ने राष्ट्रीय चेतना को नया आयाम दिया। खत्री ने अपने उपन्यासों में यही सामाजिक जटिलता समेटी—जहाँ पुरातन लोककथाओं की मिठास है, वहीं आधुनिक विज्ञान की झलक भी। इसी कारण उनकी रचनाएँ समय के पार पाठकों से जुड़ी रहीं।
कुछ समिक्षकों ने खत्री के तिलिस्मी दृष्टान्तों को ऐतिहासिक सत्यता की कसौटी पर परखा और विवाद भी उठाया। खत्री ने स्वयं स्पष्ट किया कि चंद्रकांता ऐतिहासिक उपन्यास नहीं, बल्कि कल्पनासंपन्न कथा है; और यदि किसी को कुछ असंभव लगे तो विज्ञान के बदलावों का हवाला देते हुए संभवता की व्याख्या भी दी। साहित्यिक दृष्टि से उनका योगदान केवल कथानक नहीं था—वह हिन्दी में उपन्यास पढ़ने की आदत पैदा करना था, जो भारतीय उपन्यास साहित्य के लिए दीर्घकालिक आधार बना।
देवकीनंदन खत्री का साहित्यिक प्रभाव व्यापक और दीर्घकालिक रहा। उन्होंने हिन्दी उपन्यास को जन-आकर्षक बनाया और एक बड़े पाठक-बेस का निर्माण किया, जिस पर बाद के लेखक—विशेषकर प्रेमचंद जैसे—अपने साहित्यिक निर्माण को विकसित कर सके। चंद्रकांता आज भी नए रूपों में पढ़ी और पुनर्प्रकाशित होती है; यह उसकी पॉपुलैरिटी और खत्री की लेखनी की अनगिनत परतों का प्रमाण है।