अमर त्रिपाठी — साहित्य और पत्रकारिता का सुसंपन्न चेहरा

15 मई 2026
अमर त्रिपाठी — साहित्य और पत्रकारिता का सुसंपन्न चेहरा

हिमांशु राज़ 

अमर त्रिपाठी मुंबई के साहित्यिक और पत्रकारिता परिदृश्य में एक स्थापित चेहरे के रूप में जाने जाते हैं. वे पाक्षिक "स्वतंत्र जनसमाचार" के संपादन और प्रबंधन में दशकों से अहम भूमिका निभा रहे हैं और मुंबई‑आधारित कई प्रतिष्ठित अखबारों के साथ नियमित रूप से जुड़े रहे हैं। पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं; उनके गजल संग्रह "अमराई" को 2024- 25 का महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का संत नामदेव काव्य( स्वर्ण पुरस्कार) मतलब प्रथम पुरस्कार मिला.साहित्यिक आयोजनों में उनकी गहरी रुचि रही है; वे जन‑अभिरुचि के कार्यक्रम, कवि‑गोष्ठियाँ और संजीदा संगोष्ठियों के सफल आयोजक भी रहे हैं.काव्य की सभी विधाओं — गीत और गज़ल  सहित — पर उनकी पकड़ समान रूप से मजबूत है.अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कार्यक्रम "एक शेर अर्ज़ किया है" में उनकी लगातार भागीदारी को व्यापक सराहना मिली है.पत्रकारिता, साहित्य और मंचीय सक्रियता में उनकी प्रतिबद्धता उन्हें मुंबई के प्रभावशाली और विश्वसनीय साहित्यिक‑पत्रकारीय व्यक्तित्वों में शुमार करती है.
फ़िल्मवार्ता के पाठकों के लिए — अमर त्रिपाठी की नायाब कृति
पिता के दिल में रहती प्रीत —

पिता के दिल में रहती प्रीत पहचानी नहीं जाती, 
बड़े हो जाएँ बच्चे फिर भी निगरानी नहीं जाती।

उमर अब हो चली पेशानी पर भी बल पड़े लाखों, 
मगर कुछ लोग जिनके सर से शैतानी नहीं जाती।

बड़े शायर चुभो देते सुई मिलते ही इक मौका, 
पुरानी तंज़ की आदत है मनमानी नहीं जाती।

गई बाग़ों को खुशबू छोड़ कर लौट आती है, 
मोहब्बत रूठी तो फिर जीस्त पहचानी नहीं जाती।

नया शायर कोई जब भी, छटा बिखराए मंचों पर, 
तो मोबाइल में गुम बरगद की हैरानी नहीं जाती।

मेरे सब दोस्त लगते हैं फरिश्तों की तरह मुझको, 
वो मिलते तो हैं पर मेरी परेशानी नहीं जाती।

बड़ा बनने की चाहत में 'अमर' शायर बने फिरते, 
मगर जीवन से उनके तल्ख दामानी नहीं जाती।

उपरोक्त कृति अमर त्रिपाठी जी की अमराई (ग़ज़ल संग्रह) में प्रकाशित है.पत्रकारिता की सच्चाई और काव्य की मिठास को साथ लेकर अमर त्रिपाठी का यह संकलन पाठकों के दिलों में देर तक गूंजता रहेगा.