हिमांशु राज़
बॉलीवुड के धाकड़ खलनायक राहुल देव ने कभी कल्पना भी न की होगी कि 80 से ज्यादा फिल्मों का शानदार सफर अचानक थम जाएगा। 2009 में पत्नी रीना के कैंसर से निधन ने उनकी दुनिया ही संवार दी। मात्र 12 साल के बेटे सिद्धार्थ को अकेले संभालने के लिए उन्होंने साढ़े चार साल का लंबा ब्रेक ले लिया। इस दौरान न घर-परिवार की चिंता, न करियर की दौड़-धूप। बस एक पिता का फर्ज निभाना था, जो उन्होंने पूरे दिल से निभाया।
वापसी के बाद हकीकत ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। 'हिंदी रश' पॉडकास्ट में राहुल ने खुलकर दर्द बयां किया, "इंडस्ट्री ने मुझे भुला दिया। ऐसा लगा जैसे मेरा चेहरा कोई पहचानता ही नहीं।" दरवाजे बंद, फोन पर खामोशी। काम की तलाश में दर-दर भटकना पड़ा। नेपोटिज्म और क्लिक कल्चर के इस दौर में बाहरी कलाकारों का यही हाल बन गया है। आध्यात्मिक गुरु की सलाह से उन्होंने हिम्मत जुटाई, लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या अनुभव और मेहनत अब बेकार हो गई?
राहुल देव का यह केस बॉलीवुड की उस क्रूर सच्चाई को आईना दिखाता है, जहां इंसानियत अक्सर ग्लैमर के आगे फीकी पड़ जाती है। एक कलाकार जो 'अशोका', 'जोरू का गुलाम' जैसी फिल्मों में छाप छोड़ चुका था, उसे भुला देना उद्योग की संकुचित सोच को उजागर करता है। अब उनका धमाकेदार कमबैक तय है। सवाल यह कि क्या इंडस्ट्री ऐसे अनुभवी कलाकारों को फिर से तवज्जो देगी? या भुला देना ही नई परंपरा बन गई? समय इसका जवाब देगा।