प्रशासन से पर्दे तक: बीवीपी राव बियाला की अनोखी यात्रा

12 मई 2026
प्रशासन से पर्दे तक: बीवीपी राव बियाला की अनोखी यात्रा

हिमांशु राज़ 

प्रशासनिक दुनिया के कठोर गलियारों से निकलकर सिनेमा के रंगीन कैनवास पर उतरने वाले बीवीपी राव बियाला—जिन्हें अपनों के बीच 'पापा राव' कहकर पुकारा जाता है—की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। 1982 बैच के इस वरिष्ठ नौकरशाह ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल करने के बाद देश-विदेश के चुनौतीपूर्ण पदों पर अपनी छाप छोड़ी। असम के गृह सचिव से लेकर संयुक्त राष्ट्र के कोसोवो मिशन तक, और तेलंगाना सरकार में नीति सलाहकार (कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ) तक—उनकी जिंदगी फाइलों, नीतियों और संकटों से भरी रही। लेकिन दिल के किसी कोने में एक कलाकार हमेशा जागृत था, जो बाहर आने को बेचैन रहता।
नब्बे के दशक में आया जीवन का वो सुनहरा मोड़, जब दोस्त और दिग्गज अभिनेता टॉम ऑल्टर ने उन्हें मशहूर निर्देशक जाह्नू बरुआ से मिलवाया। इस मुलाकात ने उनकी छिपी प्रतिभा को पंख दिए। सरकारी जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने 1996 में न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से फिल्ममेकिंग का डिप्लोमा लिया। पहली कोशिश आई डॉक्यूमेंट्री 'विलिंग टू सैकरीफाइस' के रूप में, जो राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर साबित कर गई कि उनकी कला कागजों से कहीं आगे है।
फिर भी, ड्यूटी ने उन्हें खींच लिया। लेकिन सिनेमा का जुनून ठंडा न पड़ा। आखिर 2020 में भारतीय खेल प्राधिकरण के पद से इस्तीफा देकर उन्होंने सपनों को प्राथमिकता दी। 2023 में रिलीज हुई उनकी पहली फीचर फिल्म 'म्यूजिक स्कूल'—श्रिया सरन और शरमन जोशी के अभिनय से सजी। यह फिल्म बच्चों की पढ़ाई के बोझ तले कुचली रचनात्मकता की मार्मिक कहानी बयां करती है, जिसे आलोचकों ने भावुकता और संदेश के लिए सराहा।
राव साहब कहते हैं, "प्रशासन में पीएम की सुरक्षा से इमरजेंसी प्लान तक का दबाव था, लेकिन फिल्म बनाना तनावमुक्त आजादी है—अपनी बात कहने का मंच।" आज वे पूर्णकालिक फिल्मकार हैं, अगली परियोजना पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं, हालांकि घोषणा बाकी है। उनकी कहानी सिखाती है: कभी देर नहीं होती, सपनों को जीने के लिए।