हिमांशु राज़
मां कामाख्या देवी के अंबुबाची मेले को भारत की सबसे अनोखी और रहस्यमयी धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है। असम की नीलाचल पहाड़ी पर स्थित यह शक्तिपीठ केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आस्था, प्रतीक और सांस्कृतिक चेतना का ऐसा केंद्र है, जहां स्त्री-शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि यहां देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि उनके योनि-भाग की पूजा की जाती है। यह परंपरा कामाख्या धाम को बाकी मंदिरों से अलग पहचान देती है और इसे 51 शक्तिपीठों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद माता सती ने अपना शरीर त्याग दिया था, तब भगवान शिव उनका शव लेकर तांडव करने लगे। संसार पर संकट आने पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। कहा जाता है कि नीलाचल पर्वत पर सती का योनि भाग गिरा था, इसी वजह से यहां देवी को सृजन, उत्पत्ति और प्रकृति की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में पूजा जाता है। यह कथा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में स्त्री ऊर्जा और जीवन-शक्ति की गहरी स्वीकृति का भी प्रतीक है।
हर वर्ष जून के महीने में यहां अंबुबाची मेला मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस अवधि में मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान पूजा-पाठ नहीं होता, गर्भगृह में किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं होती और मंदिर परिसर में एक विशेष मौन और विराम का वातावरण रहता है। चौथे दिन जब कपाट खुलते हैं तो श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था और उत्सुकता का दृश्य दिखाई देता है। उसी समय सफेद कपड़ा, जो गर्भगृह में बिछाया गया था, लाल रंग से भीगा हुआ पाया जाता है। इसे अंबुबाची वस्त्र या रक्त वस्त्र कहा जाता है और भक्त इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।
मंदिर से जुड़े लोगों और कई धार्मिक मान्यताओं में यह माना जाता है कि इस समय गर्भगृह से निकलने वाला जल भी विशेष महत्व रखता है। इसे अंगोदक कहा जाता है और प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। यह परंपरा सामान्य धार्मिक अनुष्ठानों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यहां मासिक धर्म को अपवित्र नहीं, बल्कि सृजनशील शक्ति के रूप में सम्मान दिया जाता है। यही इस मंदिर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषता है। जिस मासिक धर्म को समाज के बड़े हिस्से में आज भी छिपाने की चीज माना जाता है, कामाख्या धाम उसे प्रकृति के पुनर्जागरण और जीवन की उर्वरता से जोड़ता है।
इसी कारण अंबुबाची मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संदेश भी देता है। यह बताता है कि स्त्री का शरीर केवल जैविक संरचना नहीं, बल्कि सृष्टि की निरंतरता का आधार है। खेती-बाड़ी से जुड़े समुदायों में भी इस परंपरा का असर देखने को मिलता है। विश्वास है कि इन दिनों धरती माता भी रजस्वला होती हैं, इसलिए खेतों में हल नहीं चलाया जाता और खुदाई जैसे कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस लोकविश्वास में प्रकृति और स्त्री के बीच एक गहरा संबंध दिखाई देता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से कुछ विशेषज्ञ इस रहस्य की अलग व्याख्या भी देते हैं। उनके अनुसार नीलाचल क्षेत्र की चट्टानों और मिट्टी में लौह तत्व और आयरन ऑक्साइड की मात्रा अधिक हो सकती है। मानसून के दौरान जब पानी का बहाव और दबाव बढ़ता है, तो चट्टानों से घुले खनिज पानी को लालिमा दे सकते हैं। इसी तरह प्राकृतिक झरनों और भूगर्भीय संरचना के कारण गर्भगृह में जल का रंग बदलने की संभावना भी जताई जाती है। हालांकि श्रद्धालुओं के लिए यह किसी वैज्ञानिक कारण से अधिक देवी की दिव्य लीला का प्रतीक है। आस्था और विज्ञान के बीच यह दूरी ही कामाख्या को और रहस्यमय बनाती है।
अंबुबाची मेले में देशभर से साधु-संत, तांत्रिक और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इसे तंत्र साधना के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कई लोग इसे शक्ति उपासना का सबसे जीवंत उदाहरण मानते हैं, जहां भय, रहस्य और भक्ति एक साथ दिखाई देते हैं। कामाख्या मंदिर में चलने वाली यह परंपरा आज भी यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति में जीवन, शरीर, प्रकृति और सृजन को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही चक्र के हिस्से के रूप में देखा गया है। यही कारण है कि मां कामाख्या का अंबुबाची मेला आस्था के साथ-साथ सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक सम्मान का भी पर्व बन गया है।