बड़े अच्छे लगते हैं…

24 जून 2026
बड़े अच्छे लगते हैं…

जयंती रंगनाथन 

कुछ लोग उम्र के साथ-साथ जवां होते जाते हैं, जैसे कुछ फिल्में … आज की पीढ़ी भी जब-तब बड़े अच्छे लगते हैं गाना गुनगुनाती है। हालांकि उनके लिए यह धुन और यह नाम एक टीवी सीरीज का है। इस गाने पर ना जाने कितनी धुनें बनी हैं, रील्स बने हैं, विज्ञापन बने हैं और गानों के वर्जन बने हैं। आज भी जब यह गाना स्पॉटीफाई या किसी एफएम में बजता है तो दादा से ले कर पोती तक हर कोई ‘और’ कहने को तैयार रहता है। यह गाना था 1976 में रिलीज हुई फिल्म बालिका वधु का। इस फिल्म का तरुण नायक सचिन जो अब कुछ सालों से पिलगांवकर लगाने लगे हैं, वाकई 18 साल से कम के थे। इससे एक साल पहले आई शोले और गीत गाता चल में सबने इस कलाकार को  देखा था।  शोले में हंगल के एक युवा बेटे के तौर पर बस दो दृश्य थे। गीत गाता चल में सचिन नायक थे और सारिका नायिका। राजश्री प्रोडक्शंस की इस फिल्म में भोले-भाले और प्यारे से और पहले इश्क की खुमार में गोते लगाने वाले किशोर-किशोरी की भूमिका निभाई थी। इसके अगले साल आई  फिल्म बालिका वधू।
यकीन करना मुश्किल है कि इस फिल्म को आए पचास साल हो गए हैं। 
बालिका वधू ऐसी फिल्म थी जो धीमी आंच की तरह धीरे-धीरे गर्म होते हुए दिल में जगह बनाती थी। आजादी के पहले का बंगाल। एक संभ्रांत परिवार में किशोरों की शादी होती है। लड़का अमल अभी स्कूल में पढ़ रहा है। और उसकी बालिका वधू रजनी तो अभी बच्ची ही है। वो दोनों शादी का मतलब नहीं जानते। बच्चों की तरह लड़ते हैं, झगड़ते हैं। फिर धीरे से रिश्ता बनने लगता है। इन सबकी पृष्ठभूमि में आजादी की लड़ाई के किस्से हैं। आंच घर तक भी आती है। अमल के मास्टर जी को जब पुलिस पकड़ कर ले जाती है, दोनों किशोर सहम जाते हैं। 
सत्तर का वो दौर था जब पारिवारिक फिल्मों की धूम थी। प्यारी सी कहानी और ढेर सारे अतरंगी किरदार। इस कहानी के इर्द-गिर्द इतनी खुशियां और हंसी थी कि लगता था आप उसी परिवार के सदस्य बन गए हैं। जैसे बावर्ची, चुपके-चुपके, खट्टा-मीठा देख कर लगा था।
इस फिल्म के निर्माता थे शक्ति सामंत और निर्देशक थे तरुण मजूमदार। तरुण दा ने 1967 में इसी नाम से बांग्ला फिल्म बनाई थी, जिसमें नायिका की भूमिका में थी 13 साल की मौसमी चटर्जी। बिमल कार के लिखे बांग्ला उपन्यास पर आधारित यह फिल्म खूब चली थी। इसलिए तरुण दा को लगा कि इस फिल्म को हिंदी में भी बनाया जाना चाहिए। जब नायक की बात आई तो सबसे पहले अनिल कपूर को चुना गया, जो उस समय फिल्मों में कदम जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन तरुण दा को अनिल में वो किशोरों वाली कमनीयता नजर नहीं आई। उन्होंने गीत गाता चल देख रखी थी, इसलिए सचिन इस भूमिका के लिए सही लगे। नायिका की भूमिका में देबश्री राय को साइन कर लिया गया। पर दस दिन बाद ही तरुण दा ने हाथ खड़े कर दिए कि यह मेरी बालिका वधू नहीं हो सकती। इसके बाद आई रजनी शर्मा। रजनी की यह एकमात्र फिल्म थी जो सफल रही। इसके बाद तो जैसे वो उम्र के जाल में फंस कर रह गई। ना वो चाइल्ड आर्टिस्ट के रोल के लिए सही मानी जाती थी और ना ही नायिकाओं के लिए। दो-चार फिल्मों में नजर आने के बाद रजनी ने फिल्मी दुनिया को अलविदा ही कह दिया। 
यह फिल्म मात्र बीस लाख में बनी थी। बॉक्स ऑफिस पर इसने दो करोड़ से ज्यादा कमा कर दिया। 
यह फिल्म एक और अहम कारण के लिए याद की जाती है। किशोर कुमार के युवा बेटे अमित कुमार को संगीतकार आरडी बर्मन ने पहली बार मौका दिया था, बड़े अच्छे लगते हैं गाना गवा कर। यह गाना उस साल बिनाका गीतमाला में खूब चला और सुपरहिट गानों में रहा। 
सचिन पिलगांवकर तो आज भी वही पुराने सदाबहार युवा ही लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे बालिका वधू के नायक पर उम्र का कोई असर नहीं हुआ। यह फिल्म जब रिलीज हुई थी, मैंने भिलाई में चित्रमंदिर टॉकीज में देखी थी। आपने कब और कहां देखी थी, बताइएगा।