अभिनेत्री परख मदन कहती हैं कि वे सोशल मीडिया पर रहती हैं, पर उसकी गिनती कभी उनकी पहचान नहीं तय करती। टीवी सीरियल "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" (सीज़न 2) में दिखने वाली परख बताती हैं कि इंडस्ट्री में दिखना जरूरी है, लेकिन निजी जीवन की पवित्रता बनाये रखना उनसे ऊपर है। वे फैंस को अपने काम की जानकारी देती हैं, लेकिन फॉलोअर्स या लाइक्स के लिए कभी पोस्ट नहीं करतीं।
परख बताती हैं कि सोशल मीडिया ने लोगों के आत्ममूल्य नापने के तरीके बदल दिए हैं। कलाकारों पर यह दबाव ज्यादा होता है क्योंकि कई बार इंडस्ट्री आपकी लोकप्रियता को ही आपकी अहमियत मान लेती है। जब हम दूसरों की राय से अपनी खुशी या मेहनत की मान्यता मांगने लगते हैं, तो हम अपनी ताकत खुद खो देते हैं। हजारों अंजान लोगों की तारीफ अस्थायी खुशी देती है, पर कुछ दिनों तक सन्नाटा होने पर अदृश्य महसूस होना नुकसानदेह है।
परख मानती हैं कि जब कोई दर्शक आपके किरदार से जुड़ता है या आपकी कला की तारीफ करता है, तो वह खुशी देती है। पर सच्ची और टिकाऊ मान्यता वही है जो आप खुद को देते हैं—अपने काम पर गर्व, मजबूत असली रिश्ते और दिन के अंत में मन की शांति। परख बताती हैं कि यह सब रोज़मर्रा की आदतों से आता है—पढ़ना, ध्यान करना और परिवार के साथ समय बिताना।
वे स्क्रोलिंग को लत मानती हैं और कहती हैं कि यह हमारी मानसिक शांति छीन लेती है। इसलिए उन्होंने कुछ नियम अपनाये हैं—नियत समय पर ही फोन खोलना, रात में फोन दूर रखना और काम के बाद सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखना। इन सीमाओं ने उन्हें रचनात्मक और काम में फोकस बनाए रखने में मदद की है। परख का संदेश साफ़ है—दिखावे के शोर से ज्यादा अपने भीतर की संतुष्टि महत्वपूर्ण है। शोहरत अच्छी है, पर अपनी सीमाएँ तय कर के ही असली काम और शांति मिलती है।