जयंती रंगनाथन
1987 में नजराना फिल्म की शूटिंग के दौरान राजेश खन्ना से फिल्मिस्तान स्टुडियो में मिलने गए थे हम कुछ पत्रकार।
राजेश खन्ना के सितारे तब गर्दिश में जा चुके थे। चेहरे पर बुढ़ापा झलकने लगा था। शरीर भर चुका था। सामने के बाल उड़ने लगे थे। लेकिन उनकी अदाएं, अहम और गुरूर में कतई कोई कमी नहीं आई थी। इंटरव्यू के दौरान एक अंग्रेजी फिल्म पत्रिका ने राजेश खन्ना को ज्ञान देते हुए कह दिया कि उन्हें अब अपनी उम्र को देखते हुए भूमिकाएं करनी चाहिए। अगर वो अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ से कंपटीशन करेंगे तो उनका मजाक ही बनेगा। यह सुनते ही राजेश खन्ना हत्थे से उखड़ गए। पहले साहब का चेहरा लाल हुआ, मुठ्ठियां भिंच गईं और आवाज तेज हो गई। आधे घंटे तक हम क्या उनका इंटरव्यू करते, उन्होंने सबकी क्लास लगा दी। यह कहते हुए कि वो द राजेश खन्ना हैं और उन्हें पता है कि उन्हें क्या करना है। मैं सब जानता हूं, मुझे मत सिखाओ और मैं अभी भी सुपर स्टार हूं… उनका गुस्सा और अहम सिर चढ़ कर बोल रहा था। उस समय सच में राजेश खन्ना बहुत बेचारे नजर आ रहे थे।
उसी दिन मुंबई लोकल ट्रेन में कांदिवली में अपने घर लौटते समय हमारे साथ एक उम्रदराज फिल्म पत्रकार थे, जिनके पास पचास और साठ के दशक के सितारों की सनसनीखेज खबरें हुआ करती थीं, उन्होंने राजेंद्र कुमार के बारे में भी मिलता-जुलता किस्सा बताया था कि किस तरह वे अपने बारे में किसी से कुछ सुनना नहीं चाहते। घर हो या बाहर, गुरूर में रहते हैं। अपने स्टाफ से भी यही उम्मीद करते हैं कि वे चौबीसों घंटे उनके साथ एक स्टार की तरह बर्ताव करे।
वे सितारे गुजर गए। ये बात आज मैं इसलिए कर रही हूं क्योंकि आज अगर राजेश खन्ना या राजेंद्र कुमार होते और किसी स्टैंड अप कॉमेडियन के शो में जा कर रोस्ट हो रहे होते तो क्या होता? आज के सितारे पहले के सितारों की अपेक्षा बेहद संवेदनशील और मानवीय हैं। आज समय रैना
के इंडियाज गॉट लेटेंट शो में आलिया भट्ट को बुरी तरह रोस्ट होते हुए देखा, तो अच्छा लगा। आलिया भट्ट के जनरल नॉलेज और पब्लिक स्पीकिंग का सालों से खुल कर मजाक उड़ाया जाता रहा है। लड़की ने खुद पर जम कर मेहनत की है। जब कोई उसकी टांग खींचता है, मजाक उड़ाता है तो उसे पता है उसे क्या कहना है और कहां चुप रहना है। वो हर बात मजाक में लेना सीख गई है। आलिया ही नहीं, उसकी पीढ़ी के तमाम कलाकारों को पत्रकारों के साथ, स्टैंड अप कॉमेडियन के साथ, आम कंटेस्टेंट के साथ, लोगों के साथ और पब्लिक में अपना मजाक उड़ाना आ गया है। अकसर वो जमीन पर रह कर वहां की बातें करते हैं। अपनी कमजोरियों के बारे में खुल कर बताते हैं और कहीं से सितारा वाला अदृश्य ताज पहन कर लोगों के सामने नहीं आते।
वैसे समय भी तो बदल गया है। अब सितारों से ज्यादा मोबाइल की क्लिक है, रील है, पैपराजी है और चौबीस घंटे उन्हें देखने वाले लोग हैं। सितारे अब उस किस्म की उत्सुकता भी पैदा नहीं करते जैसा तीस साल पहले करते थे। अब फिल्म, ओटीटी और टीवी के बीच की दूरियां भी सिमटती जा रही है। आम से चेहरे और मोहरे वाले कलाकारों को पब्लिक हाथोहाथ ले रही है और उनका रुतबा किसी स्टार से कम नहीं है। मैंने एक कार्यक्रम में राजपाल यादव के पीछे बीसेक हजार लोगों को भागते देखा है। पंकज त्रिपाठी, विजय राज, विजय वर्मा, अली फजल, रिचा चड्ढा, राधिका आप्टे, विक्रांत मैसी, जयदीप अहलावत और दूसरे तमाम ओटीटी से चमके कलाकार आज के हीरो हैं। ये सभी कलाकार इतनी जद्दोजहद करके आज मंच पर आए हैं कि उन्हें किसी किस्म का ताज नहीं चाहिए सर पर। वे खुद पर भी हंसते हैं और परिस्थितियों पर भी।
यहां एक बात और मुझे रेखांकित करनी है। बड़े नामों का मजाक उड़ाने में लोगों को मजा आने लगा है। ये एक किस्म का सेडिज्म है, जो तेजी से फैल रहा है। मैंने पिछले दिनों एक पोस्ट देखी, जिसमें हजारों व्यूज और कमेंट थे। उस बंदे की पोस्ट में अकसर बड़े नामों को रोस्ट किया जाता है। एक कमेंट था कि पैसा भी तुम कमाओ और शोहरत भी तुमको मिले, यह तो सरासर नाइंसाफी है। एक ने कहा कि इन लोगों को गालियां दे कर और बेइज्जत करने में उसे मजा आता है। अगर इसकी वजह से पांच मिनट भी उनकी नींद उड़ जाए तो पैसा वसूल।
यहां भी एक पुराना किस्सा कोट करना चाहूंगी। तीसेक साल पहले जब मुंबई में थी और धर्मयुग और अमरउजाला के लिए फिल्मों पर लिखती थी, अकसर स्टुडियो जाना और सितारों का इंटरव्यू करना होता था। एक घिसे हुए और क्षेत्रीय अखबार में फिल्मों पर लिखने वाले पत्रकार लगभग हर दूसरे रोज मुझे फोन करके पूछते, कुछ खबर बता। उन्हें जूसी खबरें चाहिए होती, किसका किसके साथ चक्कर है, कौन किसको धोखा दे रहा है और कौन अपने पैसे से क्या गुल खिला रहा है? मेरे पास ऐसी खबरें नहीं होतीं तो कहते तुम बस एक हीरोइन का नाम बताओ, खबर तो मैं बना ही लूंगा। कौन आता है पता लगाने? मैं तो ऐसी ही गॉसिप बना कर हर सप्ताह अपनी रोटी कमाता हूं।
ना जाने उन्होंने कितनी हीरोइनों का चक्कर चलवा दिया, कितनों के घर तुड़वा दिए और कितनों के नाजायज बच्चों का हिसाब-किताब छाप दिया। तुर्रा ये कि यह सब गॉसिप के नाम पर हो रहा है, इसे सच कौन मानता है?
ये भी एक किस्म से बिग बॉस वाला आनंद ही है। दूसरों के बेडरूम में क्या हो रहा है यह जानने की चरम उत्सुकता ने फिल्म पत्रकारिता का कचूमर निकाल दिया।
हम आज भी उस मानसिकता से नहीं निकले हैं। सोशल मीडिया ने सबको लताड़ने और जलन की आग बुझाने के लिए मंच दे दिया है। ट्रोलिंग करके कुछ लोग आग लगाते हैं तो कुछ लोग इसके शिकार होते हैं। इसलिए भी अब इंडस्ट्री की नई पीढ़ी खुद का मजाक उड़ाने लगी है। उन्हें भी पता है कि स्टारडम अब सिर्फ फिल्मों में काम करके नहीं हासिल होता। गुरूर सबका खत्म होता है… अंत सबका आता है…
(लेखिका देश की प्रतिष्ठित पत्रकार व उपन्यासकार है)