हिमांशु राज
हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती और हर रिश्ता जैसा दिखता है वैसा नहीं होता। जयंती रंगनाथन के नवीनतम उपन्यास 'शुगर डैडी' में इसी बात की गहराई से साहित्यिक दास्तान बखानी गई है। हिंद युग्म के प्रकाशन से सामने आई यह किताब सर्वसाधारण अपराधकथा नहीं, बल्कि रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं और भावनाओं के उलझते तारों को सामने लाने वाला एक गंभीर कलात्मक उपन्यास है जो पाठक के आंतरिक चेतना को स्पर्श करती है।
कहानी एक पहाड़ी पर्यटन स्थल के आवास में शुरू होती है। पचास वर्षीय धनाढ्य व्यापारी श्याम राजगिर का खून होता है। मुख्य सवाल खड़ा होता है — उसकी सत्रह वर्षीय प्रेमी मायरा विष्वास। मायरा मानती थी कि श्याम उसे शादी का प्रस्ताव देगा। खून के बाद उसकी दुनिया टूट जाती है। जांच अधिकारी धीरे-धीरे पर्दे उजाड़ता है — पूर्व पत्नियां, करीबी रिश्तेदार, हर किसी का अपना हित, ईर्ष्या, दुर्भाव, बदला और सुनसानपन सामने आता है।
'शुगर डैडी' कौन है? ऐसे वयस्क पुरुष जो अपनी आयु से आधी या कम आयु की युवती को मिलते हैं, उन पर धन खर्च करते हैं, उनसे नाते बनाते हैं। पश्चिम से शुरू हुआ यह रिश्तों का ढाँचा भारत में भी तेजी से फैल रहा है। नई पीढ़ी ने इस रिश्ते को 'शुगर डैडी' और 'शुगर बेबी' का नाम दिया। पारिवारिक मूल्यों वाले देश भारत में इस प्रथा का बढ़ना समाज के लिए चिंता का विषय बन गया है। रंगनाथन ने इसी सामाजिक यथार्थ को उपन्यास में जीवंत कर दिया है।
लेखिका ने पात्रों की मनोदशा और सामाजिक यथार्थ को बेहद रोचक तरीके से प्रस्तुत किया है। जयंती रंगनाथन तीस वर्ष से अधिक समय से मीडिया और लेखन में सक्रिय पत्रकार-उपन्यासकार हैं। वे लेखन के कई क्षेत्रों से जुड़ी हैं — पत्रकारिता, कहानी, सीरियल, उपन्यास। जो दिखता है, सोचती है, वैसा लिखती हैं। इसी बोल्ड शैली का उदाहरण यह उपन्यास है।
इस उपन्यास में लेखिका ने प्रेम के धनिक पक्ष की दास्तान सुनाई है। व्यापारिक रिश्ते, ताकत का संतुलन, प्रेम, चाहत, लालच, बदला, महत्वाकांशा — ये सभी तत्व इस किताब में गहराई से उजाड़े गए हैं। अपराधबोध और उम्मीद के बीच झूलती एक भावनात्मक कहानी पेश करता है यह उपन्यास। अंत तक पाठक को बांधे रखती है।
किंतु इस उपन्यास में कुछ कमियां भी हैं। कहानी के मध्य भाग में गति धीमी हो जाती है। कुछ पात्रों का चरित्र उतना गहरा नहीं खींचा गया है। अंत कुछ अचानक होता है। पाठक को और गहरा रहस्य खोजने की अपेक्षा रहती है। कुछ संवादों में बोलचाल की हिंदी अधिक है।
कहानी पाठक को सोचने पर मजबूर करती है और अंत तक बांधे रखती है। लेखिका की लिखावट शैली इतनी सरल है कि कोई भी समझ सकता है। यह किताब क्राइम किताब का सही उदाहरण है। शुगर डैडी एक तेजस्वी, जानकारीपूर्ण कत्ल मिस्ट्री जो आधुनिक पाठक की भाषा बोलती है। हिंदी थ्रिलर व्यावसायिक और सामाजिक दोनों पहलूओं में समृद्ध हो सकता है, इसका बेहतरीन उदाहरण है यह उपन्यास।
शुगर डैडी ने यही बात बेहद खूबसूरती से समझाई — हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती, और हर रिश्ता जैसा दिखता है, वैसा नहीं होता। जयंती रंगनाथन का यह उपन्यास हर उस पाठक के लिए है जो क्राइम थ्रिलर पसंद करता है, सामाजिक यथार्थ को गहराई से देखना चाहता है, और तेजस्वी हिंदी लेखन का अनुभव लेना चाहता है। एक बेमिसाल हिंदी थ्रिलर जो व्यावसायिक और सामाजिक दोनों पहलूओं में समृद्ध है।