डॉ कंचनमणि मिश्रा
बात अगर डॉक्टर की करें तो फ़िल्मी डॉक्टर की तो बात ही कुछ अलग है। जब बड़े पर्दे पर पहली बार देखा — हैंडसम मेडिकल स्टूडेंट्स एप्रन में, फुल स्पीड बाइक पर आते, खुले हुए बटन, लहलहाते बाल, गले में नैक्लैस की तरह सजा हुआ स्टेथोस्कोप और बैकग्राउंड में ढिन्चक सांग — तो लगा यही है राइट चॉइस बेबी। फिर जो जी-तोड़ मेहनत करके दुनिया की कठिनतम परीक्षाओं में से एक, मेडिकल एंट्रेंस एग्ज़ाम, क्लियर किया और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश हुआ। यहाँ आकर कुछ और ही नज़ारा था। सुबह आठ से शाम छह तक क्लास, फिर मेनुअल्स, टेस्ट पे टेस्ट और रात भर रैगिंग; फिर सुबह प्रोफेसर्स की डांट और ताने — तो आदमी बाल बनाना क्या, अपना नाम भी भूल जाए।
पुरानी फिल्मों में तो आपने देखा ही होगा: जब हिरोइन नदी में डूबने जाती है, उसे हीरो बचाता है। फिर आता है डॉक्टर जो हमेशा काले कोट में ही होता था और हाथ में काला लेदर बैग। वह हिरोइन की नब्ज़ देखता और कहता — "खुशखबरी है, ये माँ बनने वाली है"। भाई साहब, कहाँ गए वो भगवान तुल्य डॉक्टर जो नब्ज़ देखकर ही प्रेग्नेंसी बता देते थे? आज तो डॉक्टरों को पचास टेस्ट, अल्ट्रासाउंड वगैरह कराना पड़ता है तभी प्रेग्नेंसी कन्फर्म होती है। मेरी तो गुज़ारिश है कि वो पुराना सिलेबस फिर से लाया जाए और नब्ज़ वाली विद्या सिखाई जाए — मरीज़ का पैसा बचे और डॉक्टर का समय।
प्लास्टिक सर्जरी की उपलब्धियों की तो क्या ही चर्चा करूँ। किसी चमत्कार से कम नहीं। हीरो गया ओटी में और जब पट्टी हटी तो नया चेहरा, साथ ही कद-काठी, अंदाज़ सब अलग। यह तो मिरैकल है मिरैकल। प्लास्टिक सर्जरी नहीं, फेस ट्रांसप्लांट कहिए इसको। फालतू में डॉक्टर नाक—राइनोप्लास्टी, चिन सर्जरी, लिप सर्जरी जैसे किसी ऑपरेशन कर देते हैं जो सालों चलते हैं और जटिलताएँ अलग। फिल्मों में तो बस पट्टी लगाई, हटाई और चल मेरे भाई। एक कट—और नया हीरो स्क्रीन पर।
न्यूरो वाले सीन तो बहुत मज़ेदार होते हैं। एक एक्सीडेंट हुआ — मेमोरी गायब; फिर दूसरा एक्सीडेंट हुआ — मेमोरी वापस। इतनी प्रिसाइज़ साइंस। मैं तो कहती हूँ, न्यूरोसर्जन हाथ में स्केलपेल छोड़ कर डंडा ले ले। क्या हुआ? अम्नेसिया। डंडा ट्रीटमेंट शुरू और वोइला! मेमोरी वापस। और वो कमाल के सीन जहाँ हीरो कोमा में चला जाता है। कोई रिस्पॉन्स नहीं। फिर बहन का इमोशनल डायलॉग कान में — कि कैसे विलेन ने उसे छेड़ा — भाई का प्रेम जाग जाता है और उसकी उंगलियां हिलने लगती हैं और वह कोमा से बाहर। मेडिकल लॉजिक गया तेल लेने। विलेन का मरना ज़्यादा ज़रूरी है। एक फिल्म में तो इमेजिनेशन की हद ही हो गई — ब्रेन ट्रांसप्लांट ही दिखा दिया था।
साइकेट्रिस्ट्स को तो देवता छोड़िए, मानव का भी दर्जा नहीं। वो तो दानव हैं दानव। हीरो प्रेम में पागल — दो ईसीटी (इलेक्ट्रो-कन्वल्सिव थेरेपी), करप्शन के विरोध में आवाज़ उठाई — दो ईसीटी, सोसाइटी के नियम नहीं मानता — दो ईसीटी। मतलब, बीमारी कोई भी हो, सौ बीमारियों का एक इलाज ईसीटी। चार लोग पकड़े और ईसीटी शुरू और रिज़ल्ट — ज़ोम्बी। कंसेंट, एनेस्थेसिया, साइंटिफिक स्टडीज़ और पॉज़िटिव इम्प्रूवमेंट की बात तो मत ही करिए। फिर तो डॉक्टर विलेन ही बनेगा ना?
माना कि फिल्मों में मेन क्राइटेरिया एंटरटेनमेंट रहता है, जिसके लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली जाती है, पर ये भी जानिए:
"चारागिरी (चिकित्सा) नहीं आसान, इतना समझ लीजिए,
कई सालों की मेहनत और तज़ुर्बे का नतीजा है।
हर कदम पे है चुनौती और उबर के आना है।"
फिल्में भावनाएँ जगाती हैं, दिल छूती हैं और मनोरंजन देती हैं। पर चिकित्सा जैसे संवेदनशील विषय पर बनने वाली छवि का असर दूरगामी होता है। मिथक जो पर्दे पर दिखता है, वह जनता की समझ बन जाता है — और वही समझ मरीजों की उम्मीदों, परिवारों के निर्णयों और डॉक्टरों के पेशेवर आचरण पर असर डालती है। दर्द के क्षणों में किसी को आशा चाहिए होती है, पर वह आशा अगर गलत जानकारी पर बनी हो तो हानि ही रहती है। फिल्मी डॉक्टरों के साथ असल डॉक्टरों की जद्दोजहद की तुलना करना केवल व्यंग्य भर नहीं है; यह समाज को एक चेतावनी भी है कि चिकित्सा को समझें तो सही मायने में समझें। फिल्मों का अपना स्थान है, पर वे जब चिकित्सा के नाम पर असत्य और सरलीकृत तरीके दिखाती हैं तो वह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि वह अविश्वास और भ्रम भी पैदा कर देता है।
अंत में, यह ज़रूरी है कि दर्शक समझें — पर्दे का जादू और अस्पताल की सच्चाई अलग हैं। चिकित्सा कोई तमाशा नहीं, यह ज्ञान, अनुभव और मानवता का संगम है। इसलिए अगली बार जब आप पर्दे पर कोई सुपर-डॉक्टर देखें, तो याद रखिएगा: असलियत में हर इलाज के पीछे अनगिनत घंटे की पढ़ाई, क्लिनिकल परीक्षाएँ, नैतिक फैसले और बार-बार की कड़ी मेहनत छिपी होती है। इसे हल्के में न लें; यह जीवन का काम है।
(लेखिका देश की जानी-मानी रेडियोलॉजिस्ट है)