बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह की फिल्म "धुरंधर: द रिवेंज" का प्रभाव अब सिर्फ सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहा। फिल्म के संवाद, किरदार और प्रचार के तरीके इतनी तेजी से सोशल मीडिया पर फैलते गए कि उनका असर राजनीतिक पृष्ठभूमियों में भी दिखने लगा। हाल में भाजपा के आधिकारिक सोशल हैंडल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक संपादित वीडियो साझा किया गया, जिसमें धुरंधर की शैली को नेटफ्लिक्स-स्टाइल सीरीज़ घोषणा के रूप में पेश किया गया। यह पोस्ट देखते ही देखते इंटरनेट पर चर्चित हो गया और फिल्म की लोकप्रियता का एक नया पहलू उजागर हुआ।
धुरंधर ने थिएटर और स्ट्रीमिंग दोनों पर जबरदस्त सफलता हासिल की है। रिपोर्टों के मुताबिक़ उद्घाटन सप्ताह में फिल्म ने करोड़ों व्यूज़ दर्ज किए और कई अंतरराष्ट्रीय चार्ट्स में शीर्ष स्थिति हासिल की। रणवीर के निभाए गए हम्ज़ा-जसकिरत जैसे किरदारों की विशिष्ट बोली-भाषा और दृश्य शैली ने मेम्स और फैन-एडिट्स की एक लहर पैदा की है। इसी सांस्कृतिक दायरे ने फिल्म को सामान्य जनमानस की बातचीत का हिस्सा बना दिया, जिससे राजनीतिक हस्तक्षेप भी संभव हो गया।
राजनीतिक हैंडल द्वारा ऐसे पॉप-कल्चर संदर्भ का इस्तेमाल दिखाता है कि यह संदर्भ अब कितनी गहराई से जनता की रोज़मर्रा की भाषा का हिस्सा बन चुका है। कुछ लोगों ने इसे रचनात्मक और हल्के-फुल्के तरीके से स्वागत किया, तो कुछ ने फिल्मों और राजनीति के इस जुड़ाव पर सवाल भी उठाए। इस घटना ने स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मनोरंजन की चीज़ें कितनी आसानी से सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श में बदल जाती हैं।
रणवीर सिंह ने अपने करियर में बार-बार यह साबित किया है कि वे किसी भी भूमिका में ढलने की काबिलियत रखते हैं। धुरंधर में उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि किरदार का आकर्षण वास्तविक जीवन में भी छोड़ा नहीं जा सका। जब किसी फिल्मी किरदार की पहचान इतनी व्यापक हो जाती है, तो वह न केवल फैन-कल्चर बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बातचीत में भी उपयोगी प्रतीक बन जाता है। इसलिए प्रधानमंत्री के संदर्भ में धुरंधर का इस्तेमाल इस बात का संकेत है कि यह फिल्म अब सिनेमा से बाहर जाकर एक सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
यह मामला मीडिया और समाज दोनों के लिए अहम सबक देता है। यह बताता है कि अब फिल्मों से जुड़ी खबरें केवल बॉक्स-ऑफिस की सीमाओं में रहीं नहीं—वे सार्वजनिक विमर्श को आकार दे सकती हैं और राजनीतिक संचार पर भी प्रभाव डाल सकती हैं। धुरंधर की यह यात्रा, थिएटरों से लेकर डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म और अब राजनीतिक टाइमलाइन्स तक, इस बात का प्रमाण है कि पॉप-कल्चर आज सामाजिक प्रतीकों और जनभावनाओं को निर्मित करने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।