'अनुपमा' से अलग पहचान मिली- सुधांशु पाण्डेय

19 जून 2026
'अनुपमा' से अलग पहचान मिली- सुधांशु पाण्डेय

मुंबई। अभिनेता सुधांशु पांडेय ने हाल ही में एक पोडकास्ट में कहा कि उनका पहला दैनिक धारावाहिक ‘अनुपमा’ उनके करियर और जिंदगी के लिए बड़ी वजह बन गया। उन्होंने बताया कि टीवी में आराम के बहुत कम मौके होते हैं और उन्होंने चार साल लगातार एक ही शो पर काम किया। फिर भी उन्हें लगता है कि वे बहुत खुशकिस्मत रहे, क्योंकि यही उनका पहला दैनिक शो इतना लोकप्रिय हुआ कि देश और विदेश दोनों जगह देखने वाले मिले।
‘अनुपमा’ में सुधांशु का किरदार वनराज लोगों के बीच बहुत चर्चा में रहा। उन्होंने कहा कि लोग वनराज को अक्सर नापसंद करते थे, पर वह नापसंदी पूरी तरह नकारात्मक नहीं थी। दर्शक यह जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि वह अगला कदम क्या उठाएगा। सुधांशु ने किरदार को ऐसा बनाया कि उसका मन पढ़ना मुश्किल हो—कभी उसकी मुस्कान भी लोगों को असहज कर देती थी। उनका मकसद था कि दर्शक हर एपिसोड में रोमांचित रहें। जब उनसे पूछा गया कि वनराज नकारात्मक था या नहीं, सुधांशु ने कहा कि इंसान को सिर्फ ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कह देना ठीक नहीं है। कई बार रिश्तों में लोग दायित्व और अपनी खुशियों के बीच फँस जाते हैं। वनराज का चरित्र ऐसे ही भावनाओं का उदाहरण था। वह अपने माता‑पिता का बहुत आदर करता था और अपने बच्चों से गहरा लगाव रखता था। उसने जो भी किया, उसके पीछे परिवार की जिम्मेदारी और पुरानी परवरिश की वजहें थीं। वह अलग होकर परिवार को टूटता हुआ नहीं देखना चाहता था—इन्हीं मानवीय कारणों ने उसे रोक रखा था।
सुधांशु ने अपने शुरूआती दिनों के अनुभव भी साझा किए। ‘बैंड ऑफ बॉयज़’ के साथ उन्हें जो लोकप्रियता मिली, वह बहुत बड़ी थी। 2002‑03 में मंचों और शो में लाखों लोग आते थे और फैंस का जोश बहुत ज़्यादा होता था। आज का फर्क सिर्फ यह है कि सोशल मीडिया ने कलाकारों को दर्शकों के और भी करीब ला दिया है। पहले लोग ज्यादातर मैगज़ीन और टीवी से ही जान पाते थे, पर अब सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स से रोज़ाना जुड़ाव रहता है। यही वजह है कि तब और आज के फैन कल्चर की तुलना करना मुश्किल हो गया है।
सुधांशु का कहना है कि चाहे सिंगर के दिन हों या टीवी का कोई किरदार, असली कनेक्शन तब बनता है जब कलाकार अपने रोल को इंसान की तरह जीकर दिखाता है। यही वजह है कि वनराज जैसे जटिल किरदार भी लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं।