पेद्दी या पिद्दी : सिनेमा के पुरुषवादी नजरिया पर एक टिप्पणी

06 जून 2026
पेद्दी या पिद्दी : सिनेमा के पुरुषवादी नजरिया पर एक टिप्पणी

जयंती रंगनाथन 

दो दिन पहले रिलीज हुई फिल्म पेद्दी इन दिनों गलत वजहों से चर्चा में है। विवाद की वजह फिल्म की नायिका जान्हवी कपूर के कुछ दृश्य और फिल्म की प्रस्तुति हैं। सोशल मीडिया पर कल रात से जान्हवी, निर्देशक बूची बाबू और नायक रामचरन को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। तेलुगु की कुछ व्यावसायिक फिल्मों से यह किस्सा अब आम होता जा रहा है — नायिकाओं को किरदार की जगह अक्सर केवल सौंदर्य और यौन आकर्षण तक सीमित कर दिया जाता है।
इन फिल्मों में नायिकाओं के लिए सीमित विकल्प होते हैं: द्विअर्थी संवाद, दो‑तीन आइटम गीत, सेक्सी साड़ी या आधे कपड़े और भद्दे नृत्य‑कदम। पहले जो काम सिल्क स्मिता जैसी आयटम गर्ल करती थीं, अब वही काम मुख्य नायिकाएँ कर रही हैं — होंठ काट कर बोलना, आह भरकर शरीर हिलाना, और संवेदनहीन कपड़े। बड़े बजट के बावजूद कई बार चरित्र‑निर्माण का स्थान मात्र शारीरिकता ले लेता है। हजारों दर्शक व करोड़ों रुपये के लिए हीरो की “आई‑कैंडी” बनकर रह जाना आम प्रवृत्ति बनती जा रही है।
यहाँ सिनेमा‑विश्लेषक लॉरा मुल्वे का पुरुषवादी नजरिया याद आता है। उनके अनुसार कैमरा अक्सर पुरुष दर्शक की कामनाओं के अनुसार महिलाओं के शरीर पर टिकता है; महिला के व्यक्तित्व के बजाय उसके सौंदर्य को प्राथमिकता मिलती है। पेद्दी में भी यही समस्या दिखती है। जान्हवी द्वारा निभाई गई अचियम्मा नामक पात्र पर जब रामचरन का किरदार बात करता है तो कहता है कि उसने उसका चेहरा नहीं देखा, पर बदन देखकर पहचान लेगा — संवाद की यह मुद्रा दर्शाती है कि चरित्र का मानवीय आयाम दबकर शारीरिकता पीछे आ जाता है।
फिल्म में एक दृश्य और विवादित हुआ — नायक नायिका के घर जाकर जबरदस्ती किस करता है और कहता है कि यह उसके प्यार जताने का तरीका है। यह दृश्य दक्षिण के कई कमर्शियल फिल्मों की उन पंक्तियों की याद दिलाता है जो बाद में हिंदी में डब होकर आई फिल्मों में भी समान रूप से दिखाई देती रही हैं। कबीर सिंह और एनिमल जैसी हिंदी फिल्मों के उदाहरण भी याद आते हैं जहाँ हिंसात्मक या असंवेदनशील प्रेम‑दृष्टांत सामान्यीकृत होते दिखे।
जान्हवी की इस भूमिका पर सोशल मीडिया आलोचना तेज है। कई टिप्पणियाँ कहती हैं कि श्रीदेवी जीवित होतीं तो अपनी बेटी को यह रोल करते देखकर दुखी होतीं। कुछ तंज करते हैं कि जान्हवी को पैसे की क्या इतनी ज़रूरत थी कि वे इस प्रकार की सूक्ष्मताहीन भूमिकाएँ करें, जहाँ उन्हें केवल सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन प्रतिक्रियाओं के दबाव में निर्देशक बूची बाबू ने कहा है कि दर्शकों की आलोचना को देखते हुए जान्हवी के कुछ दृश्य संपादित किए जा सकते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि न केवल जान्हवी, बल्कि कई हिंदी नायिकाएँ भी दक्षिण की कमर्शियल फिल्मों में एक‑दो चमकीले दृश्य करने के लिए तैयार रहती हैं। इसका एक कारण नया दर्शक‑बेस बनाने की इच्छा है; दूसरा कारण स्पष्ट — पैसा। दूसरी ओर, दक्षिण के दर्शकों को अक्सर ऐसे पात्रों में आपत्ति नज़र नहीं आती। पर आश्चर्यजनक रूप से दक्षिण का समाज उत्तर भारत की तुलना में अक्सर अधिक पारंपरिक माना जाता है; फिर भी वहां की व्यावसायिक फिल्मों में सेक्स‑बम की मांग स्पष्ट दिखाई देती है — चाहे वह पुष्पा हो या पेद्दी।
पेद्दी का शाब्दिक अर्थ तेलुगु में “बड़ा” होता है; इसका किसी अन्य शब्द से भ्रम नहीं। फिल्म के नायक रामचरन के प्रति मेरे व्यक्तिगत अनुराग का सवाल अलग है, पर जब फिल्में यह संदेश देती हैं कि नायक को किसी लड़की के घर में घुसकर उसे किस करने और सार्वजनिक रूप से उसकी देह पर टिप्पणी करने का अधिकार है, तो ऐसे दृश्य युवा दर्शकों के लिए अनुकरणीय बन सकते हैं — और यही सबसे चिंतित करने वाली बात है।
अंत में एक निजी याद जुड़ती है: रामचरन नाम सुनते ही बचपन की पराग‑कहानी याद आ जाती है जहाँ रामचरन नाम के लड़के का मज़ाक भिंडी‑नापसंदगी के कारण उड़ाया जाता था — “रामचरन राजा होगा, हम भिंडी राज बनाएंगे…” यदि किसी पाठक को वह कहानी याद हो तो बताइए। क्या आपने पेद्दी देखी है या देखने का इरादा रखते हैं? अगर नहीं, तो चलिए — अपना‑सा “भिंडी राज” बनाते हैं।