हिमांशु राज़
नए धारावाहिक "वसुधा" की नायिका प्रिया ठाकुर ने शून्य से शुरू कर अपनी मेहनत और स्वाभिमान से खुद को सिद्ध किया है। निर्देशन कर रहे अरविंद बाबल बताते हैं कि प्रिया में जो सहजता और दृढ़ता दिखी, वह किसी शहर की चमक-दमक नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कारों से उपजी थी। यही स्वाभिमान वसुधा के किरदार के लिए अत्यंत अनिवार्य था और स्क्रीन पर यह बात स्पष्ट रूप से झलकती है।
फिल्मांकन के पहले चरण से ही प्रिया की लगन ने सभी का ध्यान खींचा। बाबल याद करते हैं कि उदयपुर में पहले दिन से ही टीम ने कड़ी मेहनत की और प्रिया ने निरंतर प्रयास कर अपनी जगह बनाई। "उसने शून्य से शुरू किया, पर सब उसके साथ आगे बढ़ते गए," वे कहते हैं। सेट पर मेहनत की लय धीरे-धीरे मानक बन गई है — जहाँ पहले दो रीडिंग होती थीं, अब छह रीडिंग करने की प्रथा हो चुकी है। कलाकार मेकअप रूम से तैयार होकर पूरी भूमिका के साथ आने लगे हैं और लाइनें भूलना दुर्लभ हो गया है।
दैनिक सोप की कठोर दिनचर्या कलाकारों पर भारी पड़ती है। रात में देर से घर पहुँचना और अगली सुबह फिर शीघ्र सेट पर होना, पारिवारिक समय का बलिदान और लगातार तैयारी—यह सब आम जीवन बन गया है। बाबल इसे समझते हुए भी प्रेरणा और चिंता दोनों जताते हैं; कभी-कभी वे चाहकर भी कलाकारों को लंबा आराम नहीं दे पाते क्योंकि प्रसारण के लिए एपिसोड जल्दी देने होते हैं।
फिर भी सेट का घटक सबसे बड़ा सहारा रहा है। ऑनस्क्रीन परिवार का आपसी सामंजस्य ऑफस्क्रीन भी उतना ही मजबूत है। दादी की भूमिका निभाने वाली कलाकार का सम्मान और उनके चारों ओर बनी पारिवारिक समझदारी इस टीम की सफलता का सार है। प्रिया की सधी शुरुआत और सब की जुटी मेहनत ने मिलकर "वसुधा" को विश्वास और जीवंतता दी है — एक ऐसी कामयाबी जो दर्शकों तक दिल से पहुँचती है।