डॉ कंचनमणि मिश्र
साड़ी शब्द का मूल संभवतः संस्कृत के शब्द 'शाटिका' (śāṭikā) से आया है, जिसका अर्थ 'कपड़े की पट्टी' है। प्राकृत और पाली भाषाओं के प्रभाव से यह रूपांतर 'साटी' बना और कालक्रम में बदलकर 'साड़ी' हुआ। साड़ी का इतिहास अत्यंत प्राचीन है; इसका सबसे पहला प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2800–1800 ईसा पूर्व) तक मिलता है। प्राचीन भारत में साड़ी आज की तरह एक टुकड़ा नहीं बल्कि तीन भागों के संयोजन के रूप में पहनी जाती थी: अंतरिया (कमर पर लपेटने वाला निचला वस्त्र, धोती सदृश), उत्तरीय (कंधे या सिर पर ओढ़ने वाला शॉल, जो आज के पल्लू या दुपट्टे का स्वरूप बन गया) और स्तनपट्ट (छाती ढकने वाली पट्टी)। मौर्य और गुप्त काल में यह त्रिभाजित परिधान सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों का भी हिस्सा रहा। मुग़ल शासनकाल (16वीं–18वीं शताब्दी) में साड़ी के स्वरूप और सजावट में बड़ा परिवर्तन हुआ। शालीनता और पर्दा-प्रथा के प्रभाव से चोली (ब्लाउज) का चलन बढ़ा और घूँघट का प्रयोग फैला। मुग़ल दरबारों के संरक्षण में साड़ियों पर जरदोजी, कीनखाब और जामदानी जैसी महीन कढ़ाई, तथा सोने-चांदी के तारों (जरी) का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ, जिससे बनारसी और अन्य शानदार शिल्पों का विकास हुआ। अंग्रेजों के राज के दौरान और आधुनिक युग की शुरुआत में पेटीकोट और ब्लाउज़ पहनने की प्रवृत्ति पनपी। पारंपरिक बंगाली ढंग से बिना ब्लाउज़ के साड़ी पहनने के कारण एक घटना ने नए फैशन को जन्म दिया: रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ की पत्नी ज्ञानदानंदिनी देवी को अंग्रेजी क्लब में प्रवेश से रोका गया। इस असहमत प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने पारसी और विक्टोरियन परिधानों के तत्व मिलाकर एक नया ब्लाउज़-स्टाइल अपनाया — कॉलर, फूली आस्तीन और हाई-नेक वाले ब्लाउज़ के साथ पेटीकोट और साड़ी का संयोजन — जिसे 'ब्रह्मी साड़ी' के नाम से जाना गया। यह रूप महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अधिक सहजता और स्वीकृति दिलाने में सहायक रहा।स्वतंत्रताोत्तर और समकालीन भारत में साड़ी ने नई रूपरेखाएँ पाई। आज साड़ी न केवल परंपरा का प्रतीक है बल्कि फैशन और पहचान का भी माध्यम बन चुकी है। फिल्म और सार्वजनिक जीवन की हस्तियों — जैसे कंगना रनौत, दीपिका पादुकोण, स्मृति ईरानी एवं आलिया भट्ट — ने संसद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक साड़ी को विविध अवसरों पर पहना कर इसे युवा‑पीढ़ी के बीच लोकप्रिय कराया है। डिजाइनरों जैसे सब्यसाची ने पारंपरिक शिल्प और समकालीन डिज़ाइन को जोड़कर साड़ी को कान्स जैसे मंचों पर वैश्विक पहचान दिलाई।
हाल ही में इस परंपरा में एक और दिलचस्प प्रयोग देखा गया: माधुरी दीक्षित ने ताई मंदिर के असली फूलों से बनी 'रेखा' साड़ी पहनी। यह गहरा गुलाबी शेड लिए ड्रेप करीब सात दिन में तैयार हुआ; मंदिर की महिलाओं ने पूजन के बाद बिखरे गेंदे व सापन की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग निकाले, भाप द्वारा पंखुड़ियों से रंग कपड़े में समोया और प्याज़ की परत से पल्लू को हल्की चमक दी। जिन महिलाओं के काम को अक्सर केवल घरेलू या मंदिरी ज्ञान माना जाता रहा, उन्हीं की कला ने बिखरे फूलों को एक साड़ी में बदलकर पारंपरिक कारीगरी व पर्यावरण‑अनुकूल फैशन का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया। सामाजिक और पेशेवर क्षेत्रों में साड़ी का पुनरुत्थान कई समूहों व पहलों का परिणाम भी है; उदाहरण के तौर पर 'डॉक्टर्स एंड साड़ीज' जैसे समुदाय साड़ी पहनकर और कार्यक्रम आयोजित कर इसका संरक्षण एवं प्रचार कर रहे हैं। आज विभिन्न पेशों में कार्यरत महिलाएं साड़ी में न केवल पारंपरिक मर्यादा बल्कि आधुनिक फैशन और आत्मविश्वास का भाव भी दिखाती हैं। साड़ी का सादा ताने‑बाने में निहित सांस्कृतिक गाथा, विविध क्षेत्रीय शैलियाँ और समय के साथ हुए रूपांतर इसे भारतीय महिलाओं के लिए एक सदाबहार, सम्मानजनक और बहुआयामी परिधान बनाते हैं — जो परंपरा और आधुनिकता के बीच अनुकरणीय समन्वय प्रस्तुत करता है।
(लेखिका देश की जानी मानी रेडियोलॉजिस्ट है)