हिमांशु राज़
मनोज बाजपेयी की आने वाली फिल्म 'गवर्नर' का ट्रेलर हाल ही में जारी हुआ है और उसने पृष्ठभूमि में खड़ी आर्थिक चिन्ताओं को फिर से जीवंत कर दिया है। ट्रेलर में 1990 के दशक के उस संकटपूर्ण काल को दिखाया गया है जब देश कठिन आर्थिक फैसलों के मुहताज था और राष्ट्रव्यवस्था डगमगा रही थी। छोटे-छोटे दृश्य—बैंक कतारों में खड़े लोग, लगातार गिरते शेयर, मंत्रियों और नौकरशाहों के बीच तनावपूर्ण बैठकें—एक ऐसे माहौल का निर्मित करते हैं जिसमें हर निर्णय भविष्य का भार उठाता प्रतीत होता है।
ट्रेलर का केंद्रीय व्यक्तित्व आरबीआई के गवर्नर के पद पर बैठे व्यक्ति का है, जिसे मनोज बाजपेयी ने गंभीरता और संयम के साथ निभाया है। उनके एक संवाद — 'देश कंगाल होने वाले हैं' — ट्रेलर का सबसे तीखा और परिचायक वाक्य बनकर उभरता है; यह न केवल स्थिति की गंभीरता दर्शाता है बल्कि सार्वजनिक भय का भी प्रतिबिंब है। कहानी में दिखाया गया है कि नेतृत्व परिवर्तन और सिफारिशी नियुक्तियाँ किस प्रकार संकट के समय संस्थागत अस्थिरता को और गहरा सकती हैं।
फिल्म का निर्देशन चिन्मय मंडलेकर ने किया है और निर्माण विपुल अमृतलाल शाह तथा सह-निर्माता आशिन ए. शाह के नेतृत्व में हुआ है। पटकथा को कई लेखकों ने मिलकर संवेदनशीलता के साथ संवारा है ताकि आर्थिक नीतियों के तकनीकी आयाम और मानवीय दुविधाएँ दोनों पर बराबर रोशनी पड़े। ट्रेलर का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर—जिनके बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं और रचना अमित त्रिवेदी ने की है—कहानी के तनाव को सूक्ष्म और प्रभावशाली तरीके से बढ़ाते हैं।
कुछ दर्शक और आलोचक ट्रेलर देखकर यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि केंद्रीय पात्र किसी वास्तविक आरबीआई गवर्नर से प्रेरित हो सकता है; हालांकि निर्माताओं ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिर भी, ट्रेलर ने इस दिशा में पारंपरिक ऐतिहासिक नाटकीयता से अलग, आर्थिक निर्णयों के मानवीय और नैतिक आयामों को प्रमुखता दी है। फिल्म के प्रति उत्सुकता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि यह केवल नीतिगत जटिलताओं की कहनी नहीं, बल्कि उन निर्णयों के पीछे खड़ी इंसानी संवेदनाओं और दबावों की कहानी भी बताती है।
'गवर्नर' 12 जून को सिनेमाघरों में आएगी और यह देखना रोचक होगा कि क्या फिल्म आर्थिक इतिहास के उस संवेदनशील अध्याय को सिनेमा के माध्यम से गहराई और यथार्थ के साथ प्रस्तुत कर पाती है।