पंकज त्रिपाठी की जिंदगी में भी ऐसा दौर आया जब कामयाबी केवल एक दूर का सपना दिखाई देता था। उन्होंने बताया कि शुरुआती सालों में भाषा की वजह से लोग उनसे झटपट राय बना लेते थे। उनका कहना है कि बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि जो सहज अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता, वह अवश्य ही निम्न अवस्थिति या अनुभवहीन होगा। इस धारणा ने पंकज को बार-बार नापतौल में रख दिया, पर उन्होंने इसे अपने आत्मसम्मान पर हावी नहीं होने दिया।
2001 में दिल्ली पहुंचना उनके लिए एक बड़ा सांस्कृतिक सदमा था। पंकज बताते हैं कि शहर की जिंदगी ने पहली बार उन्हें कुछ ऐसी चीजें दिखाईं जिन्हें देखकर वे चौंक गए—जैसे लड़कियों का सिगरेट पीना। पहले कुछ दिन वे इसे समझ पाए बिना हैरान रहे, पर धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि यह सिर्फ देखने का नजरिया बदलने की बात है। असल चुनौती उनके लिए उनकी पृष्ठभूमि की पढ़ाई बनी—हिंदी मीडियम से मिली शिक्षा का असर शहर की भाषा-प्रथाओं के बीच दिखाई देने लगा। लोग उनकी बोलचाल को देखते ही उनसे जुड़ी क्षमताओं के बारे में अनुमान लगाने लगे, जबकि वास्तविकता में किसी की प्रतिभा और भाषा कौशल का सीधा संबंध नहीं होता।
इन चुनौतियों के बावजूद पंकज ने हार नहीं मानी। वर्षों की मेहनत और छोटे-मोटे संघर्षों के बाद 2012 में 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ने उन्हें पहचान दिलाई। उसके बाद की फिल्मों में उनकी सादगी और स्वाभाविक अभिनय ने उन्हें दर्शकों और आलोचकों दोनों का भरोसा दिलाया। सफलता के बीच भी राह आसान नहीं थी; मुंबई में अवसर खोजते हुए समय कठिन था और इस दौरान उनकी पत्नी मृदुला परिवार का बोझ अकेले संभाल रही थीं। पंकज का यह अनुभव बताता है कि भाषा पर आधारित पूर्वाग्रह लोगों की संभावनाओं को छीन लेते हैं, लेकिन यदि आदमी अपने आत्मसम्मान को बचाकर रखे और मेहनत निरंतर जारी रखे तो परिदृश्य बदल सकता है।