समीक्षा:“चांद मेरा दिल” –अच्छा अभिनय, विफल कहानी

23 मई 2026
समीक्षा:“चांद मेरा दिल” –अच्छा अभिनय, विफल कहानी

हिमांशु राज 

इस समय बॉलीवुड उस दौर से गुजर रहा है, जहाँ युवा रिश्ते, टॉक्सिक लव स्टोरी और भावुक ट्रामा पर आधारित फिल्में बाजार में खूब चल रही हैं।उसी धारा में “चांद मेरा दिल” भी अनन्या पांडे और लक्ष्य लालवानी की एक ऐसी रोमांटिक ड्रामा फिल्म बनकर आई है, जहाँ अभिनय और भावना तो बहुत मजबूत दिखती हैं, लेकिन कहानी–संरचना उतनी नहीं, कि दर्शक उसे लंबे समय तक याद रख पाए। फिल्म युवाओं की आधुनिक दुनिया, उनकी गलतियों और पछतावे की बारीकियों को छूना चाहती है, विवेक सोनी फ़िल्म के लेखक व निर्देशक है,लेकिन निर्देशन और लेखन की कमजोरी उस इरादे को पूरी तरह पूरा नहीं होने देती। फिल्म दो इंजीनियरिंग कॉलेज के युवाओं, आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या), के बीच शुरू होती है, जो पढ़ाई, परिवार की उम्मीदों और जमाने की खुली–सी आजादी के बीच भटक जाते हैं। दोनों का रिश्ता शुरू में आसान, मस्ती–भरा और आधुनिक लगता है—मोबाइल नोट्स, वीडियो डायरी, इंस्टाग्राम‑सी फ्रेमिंग और जनरेशन जेड की भाषा फिल्म को शुरुआती 20–25 मिनट तक ताजा और अपटू‑डेट लगवाती है। लेकिन जैसे ही दोनों एक गहरी गलती में फंसते हैं, फिल्म भावनात्मक गहराई में चली जाती है, जहाँ यह अपने ही भार में दबकर बोरिंग और खिंची हुई लगने लगती है। निर्माता यह दिखाने की जल्दबाजी में लगते हैं कि यह “गहरी” फिल्म है, इसलिए बार–बार भावुक डायलॉग, दर्द भरी आवाज़ और दोहराए जा रहे नैतिक संदेश फिल्म की गति को धीमा कर देते हैं। विषय तो दिलचस्प है—प्यार, गलती, देर आई जागरूकता, मातृत्व और जिम्मेदारी—लेकिन उसे सुनाने का ढंग इतना भारी और अनावश्यक रूप से रोमांटिक रहता है कि दर्शक अपने आप को थका हुआ और भावनात्मक रूप से दबा हुआ महसूस करने लगते हैं।

अनन्या पांडे ने चांदनी के किरदार में अपने पिछले फिल्मी इमेज से काफी दूर जाने की साफ कोशिश दिखाई है। उनका अभिनय यहाँ ज्यादा आंतरिक, शांत और दबी हुई भावनाओं वाला है। वह चांदनी के दबाव, अपराधबोध और जिम्मेदारी को बिना ड्रामा के उतारती हैं—आँखों की भाषा, चेहरे की सूक्ष्म थकान और शांत–सुस्त लहजे से दर्शक उसके दर्द को बहुत जल्दी महसूस कर लेते हैं। ऐसे कई पल हैं जब वह चुपचाप फैसला लेती हैं और उस चुप्पी की गहराई फ्रेम से बाहर तक निकल आती है। लक्ष्य लालवानी भी आरव के रूप में अच्छे लगते हैं। उनकी आवाज, चेहरे की सख्ती और फिर आंतरिक कमजोरी का मिलन उस किरदार की विरोधाभासी दुनिया को खूबसूरती से दिखाता है। वह अपने आप में आत्मविश्वासी लेकिन गलती के बाद घुटन में डूबे हुए युवा के रूप में दिखते हैं, खासकर तब जब वह नौकरी, परिवार का दबाव और अपनी जिम्मेदारी के बीच फंसे होते हैं। दोनों की जोड़ी पर्दे पर युवा रिश्तों की नाजुकता और उलझन को दिल–दिमाग दोनों से जोड़ती है।
लेकिन यहाँ एक बात साफ नजर आती है—अच्छे अभिनय से फिल्म नहीं चलती, बिना मजबूत कहानी के कुछ भी धराशाई हो सकता है। अनन्या–लक्ष्य का अभिनय फिल्म की सबसे ताकतवर चीज है, लेकिन निर्माता ने उसे इतनी अच्छी संरचना में नहीं बाँधा कि वह दर्शक की स्मृति में गहराई तक उतर पाए। निर्देशक ने फिल्म में आधुनिक युवा दृश्य भाषा का खूब इस्तेमाल किया है—फोन नोट्स, वीडियो डायरी, इंस्टाग्राम‑सी फ्रेमिंग, बैकग्राउंड में ट्रेंडिंग रिफ्रेन्स और कैम्पस‑लाइफ के रंग। शुरुआती हिस्से में यह तकनीकी फ्रेशनेस फिल्म को नई भाषा देती है, लेकिन बाद में निर्देशन टेक्नीकल ताकत को भावनात्मक गहराई में बदलने में कामयाब नहीं हो पाता। दृश्य बहुत लंबे हो जाते हैं, एक ही भावना को बार‑बार दोहराया जाता है, और फिल्म का रिधम ठहर जाता है, जिससे यह लगभग एक लंबी–लंबी भावनात्मक ड्रामा‑सीरीज जैसा लगने लगती है।बैकग्राउंड स्कोर और गीत–संगीत अच्छे हैं, खासकर वहाँ जहाँ युवा दर्शकों की आधुनिक भावनाओं के अनुरूप ध्वनियाँ बनाई गई हैं। लेकिन म्यूजिक भी लगभग एक ही टोन में फंसा रहता है—ज्यादातर “मेलानकोलिक रोमांस” ही चलता है। रोमांटिक सीन हमेशा भारी और दर्द भरा लगता है, कभी हल्का–फुल्का पल या ह्यूमर युक्त विराम नहीं आता, जिससे फिल्म का रिथ्म और भी एकघेरा और थकाऊ लगने लगता है।“अच्छे अभिनय से फिल्म नहीं चलती, बिना कहानी के कुछ भी धराशाई हो सकता है”—“चांद मेरा दिल” पर बिल्कुल सटीक बैठती है। फिल्म देखने लायक जरूर है, खासकर अभिनय और युवा रिश्तों की आधुनिक दुनिया को देखने की इच्छा रखने वाले दर्शकों के लिए, लेकिन यह वह फिल्म नहीं है जो बाद में शानदार याद के रूप में उभरे। अभिनय ने थोड़ा आगे जाने का रास्ता दिया, लेकिन ढीली कहानी, खिंची संरचना और बोझिल भावनात्मक बनावट ने फिल्म को औसत दर्जे की भावुक–रोमांटिक फिल्म में बदल दिया है।