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"हाथ कितने कटे छोड़िए,आप ताजमहल देखिए" -डॉ श्याम किशोर मिश्र

"हाथ कितने कटे छोड़िए,आप ताजमहल देखिए" -डॉ श्याम किशोर मिश्र

हिमांशु राज़ 

डॉ. श्याम किशोर मिश्रा एक बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी हैं — वे प्रतिष्ठित न्यूरो सर्जन होने के साथ-साथ समर्पित चिकित्सक भी हैं। पर उनकी सबसे विशिष्ट पहचान उनकी साहित्यिक संपदा है। शब्दों के प्रति उनके गहरे लगाव और लेखन क्षमता ने उन्हें प्रभावशाली लेखक व चिंतक की उपाधि दी है। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक सौंदर्य से परिपूर्ण हैं, बल्कि मानव जीवन, चिकित्सा और समाज के जटिल पहलुओं पर सूक्ष्म दृष्टि भी प्रस्तुत करती हैं।

उनकी रचना "जिंदगी की गज़ल" में जीवन की नाज़ुकता और मानवीय त्रासदियों को एक सधे हुए बंद में पिरोया गया है:

जिंदगी की गजल देखिए
आईने से निकल देखिए!
हाथ कितने कटे छोड़िए,
आप ताजमहल देखिए!
सोचिएगा न चारागरी,
काम कोई सहल देखिए!
क्या पता मान जाए वो,
आप थोड़ा मचल देखिए!
आगे को देखिए श्यामजी',
क्यू हमेशा अजल देखिए!

यह ग़ज़ल सरल भाषा में गहरे भाव व्यक्त करती है — व्यक्तिगत पीड़ा, सौंदर्य की सीख, और जीवन को आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन। डॉ. मिश्रा की चिकित्सा पृष्ठभूमि उनके लेखन में स्पष्ट दिखती है: जटिलता को सरल बनाना, सहानुभूति से देखना और मानव अनुभूतियों को संवेदनशीलता से उकेरना। उनकी भाषाशैली परिष्कृत है; हर पंक्ति में तराशा हुआ विचार और सूक्ष्मता दिखाई देती है। साहित्य में उनकी उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि वे सिर्फ एक कुशल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि समाज के संवेदनशील परिचालक और गहरे चिंतक भी हैं। डॉक्टर मिश्रा की रचनाएँ छात्रों, चिकित्सकों और सामान्य पाठकों—सबके लिए प्रेरणा और ज्ञान का स्रोत हैं। उनके लेखन ने चिकित्सा और साहित्य के बीच एक जीवन्त सेतु स्थापित किया है।