मंजू लोढ़ा: साहित्य और सेवा की प्रेरणा

19 मई 2026
मंजू लोढ़ा: साहित्य और सेवा की प्रेरणा

हिमांशु राज़ 

डॉ. मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि एक सशक्त साहित्यकार भी हैं। हिंदी साहित्य में उनका हस्ताक्षर अलग और प्रभावशाली है। उनके लेखन में गहरी भावुकता, देशभक्ति और मानवता की झलक मिलती है।
डॉ. लोढ़ा की कई कृतियाँ साहित्य जगत में चर्चा में रहीं हैं। इनमें उनकी पुस्तक "परमवीर – ए वॉर डायरी" सबसे प्रसिद्ध है, जो भारतीय सैनिकों की वीरता पर आधारित है और जिसका विमोचन पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने किया था ।
साथ ही, उनकी एक और महत्वपूर्ण कृति "प्रकृति मां" है, जो प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उनके गहरे समर्पण को दर्शाती है। इस पुस्तक में वे प्रकृति को माँ के रूप में प्रस्तुत करती हैं और मानवता को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहने का संदेश देती हैं। यह पुस्तक साहित्यिक जगत में काफी चर्चित रही है।
"प्रकृति माँ" कविता का पूरा पाठ नीचे दिया गया है:

"प्रकृति माँ"
— मंजू लोढ़ा

कल शाम बगीचे में टहल रही थी,
चारों ओर हरियाली बिखरी थी।
अचानक एक मधुर पुकार सुनाई दी,
"रुको मंजु… कुछ पल हमारे पास भी बैठो…"
मैं ठिठक गई,
"कौन?"
मुस्कुराकर उत्तर मिला,
"मैं प्रकृति हूँ… तुम्हारी अपनी माँ।"
आओ, देखो—
ये बर्फ से ढकी चोटियाँ,
झरनों की दुधिया उजास,
नदी का शीतल बहाव,
चिड़ियों का मधुर गान…
आसमान से बातें करते पेड़,
पत्तों की सरसराहट,
ढलते सूरज की शांत ललिमा,
चाँद की कोमल चाँदनी,
तारों की झिलमिलाहट,
और धीरे-धीरे कविता-सा उतरता अंधेरा…
"बैठो कुछ देर,
जिंदगी बहुत भाग चुकी,
इन अनमोल क्षणों को महसूस करो,
मेरे संग एकाकार हो जाओ…"
मैं चुपचाप एक घने पेड़ के नीचे बैठ गई।
डालियाँ झूम-झूमकर मानो स्वागत करने लगीं,
हवा ने मेरे गालों को छुआ,
जैसे माँ सिर सहला रही हो…
उसकी गोद में बैठकर मैं शांत हो गई,
एक अनकही अनुभूति में मन डूबता चला गया…
रोम-रोम आनंद से भर उठा,
मन हर पल को जीने लगा।
आँखें खुलीं तो हृदय कृतज्ञता से भर गया—
"धन्यवाद प्रकृति माँ…
तुमने मुझे जीना सिखाया…"
और वहीं, उसी क्षण मैंने एक संकल्प लिया—
अब तुम्हारा श्रृंगार करूंगी,
पेड़ लगाऊंगी, हरियाली बढ़ाऊंगी,
धरती माँ की थमती साँसों में
फिर से जीवन भर जाऊंगी।
न अब वन उजड़ने दूंगी,
न पेड़ों को कटने दूंगी,
हर जीवन में हरियाली का
एक दीप जलाऊंगी।
आओ, हम सब मिलकर
एक छोटा सा वचन निभाएं—
कम से कम पाँच पेड़ लगाएं,
और आने वाली पीढ़ियों को
हरी-भरी वसुंधरा देकर जाएं…

डॉ. लोढ़ा की अन्य कृतियों में काव्य संग्रह और निबंध शामिल हैं, जो हिंदी साहित्य में उनके योगदान को और भी मजबूत बनाते हैं। उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और मुंबई रत्न अवॉर्ड 2021 जैसे सम्मान भी मिल चुके हैं।
डॉ. मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा का जीवन समाज सेवा, साहित्य और मानवता का अद्भुत समन्वय है। उनकी कृतियाँ पाठकों को मनोरंजन के साथ जीवन के उच्च मूल्यों से भी जोड़ती हैं। भारतीय हिंदी साहित्य में उनका योगदान भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।