हिमांशु राज/मनोज़ धर
42 साल पूरे हुए शराबी के और अमिताभ बच्चन की मिसालियत अदाकारी, लक्ष्मीकांत–कादर की कलम और उन अमिट दृश्यों की विरासत लिए शराबी की कहानी सतही नजर में सरल है: काम में डूबा पिता, उसकी उपेक्षा का शिकार बेटा, फिर बागीपन और शराब की लत के साथ व्यक्तिगत संघर्ष। किन्तु इसी साधारण रेखा को लक्ष्मीकांत शर्मा और कादर खान की हाथ की लिखावट ने भावनाओं और मूड के ऐसे रंग दिए कि फिल्म मामूली कथानक से ऊपर उठकर कालजयी बन गयी। संवादों में नटखटपन, व्यंग्य और दर्द का मिश्रण मिलता है, जो किरदारों को वास्तविकता का स्पर्श देता है।
फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण अमिताभ बच्चन हैं। विक्की बाबू के रूप में उन्होंने वह संतुलन दिखाया जो किसी भी नवाबी नशे के चरित्र को मनुष्यता से जोड़ दे — कभी तीखा, कभी हास्यपूर्ण, कभी टूटा-सा और बार-बार करिश्माई। नशे की अवस्थाओं को वे केवल दिखाते नहीं, उसे जीते हैं; यही वजह है कि दर्शक विक्की को पहनकर अमिताभ को नहीं अलग कर पाते। संवाद अदायगी में उनकी पकड़, विरामों का उपयोग और आवाज़ का उतार-चढ़ाव फिल्म की रफ्तार और भावना दोनों को आगे बढ़ाते हैं।
कई दृश्य आज भी याद आते हैं: प्राण के जरिए शादियों की दिग्दर्शित हलचल, गुंडों से हुई भिड़ंतें, विक्की का प्रिय रूमाल और नथुलाल की मशहूर मूंछें—ये छोटे-छोटे आयाम फिल्म को रंग देते हैं। मुंशीजी के अंतिम क्षणों में अमिताभ का जो भावनात्मक विस्फोट दिखता है, वह हिन्दी सिनेमा के संवेदनशील दृश्यों में शुमार किया जाता है। ओमप्रकाश, प्राण और अन्य कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को संतुलन और पारिवारिक गहराई देती है।
लेखन और संवादों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लक्ष्मीकांत–कादर की जोड़ी ने कहीं-कहीं सख्ती, कहीं-कहीं बारीक व्यंग्य और कहीं-कहीं मार्मिकता रख कर चरित्रों को जीवंत किया। उनकी पटकथा और संवाद न केवल किरदारों को आकार देते हैं बल्कि हर दृश्य को अगले से तार्किक और भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं, जिससे फिल्म का प्रवाह कभी टूटता नहीं।
बॉक्स-ऑफिस और दर्शकीय स्वीकार्यता ने भी इस फिल्म के क्लासिक दर्जे को मजबूत किया। तत्कालीन समय में यह गोल्डन जुबली ब्लॉकबस्टर थी; यदि महंगाई समायोजन से वर्तमान मूल्यांकन करें तो इसके संग्रह को लगभग 2400 करोड़ रुपये के आस-पास आंका जाता है और अनुमानतः करीब 4.5 करोड़ दर्शक इसे सिनेमाघरों में देखने गए थे। किन्तु इन आंकड़ों से बढ़ कर फिल्म की असल विरासत उसकी अदाकारी, संवाद और वह भावनात्मक जुड़ाव है जो आज भी नए दर्शकों को जोड़ता है।
आज, 42 साल बाद, शराबी केवल पुराने दिनों की याद नहीं; यह उस दौर की अभिनय-शैली, संवाद-कला और चरित्र-निर्माण का दस्तावेज है। अमिताभ बच्चन की परफॉर्मेंस, लक्ष्मीकांत–कादर की लेखनी और उन मीठे से कटु दृश्यों की वजह से यह फिल्म हिंदी सिनेमा की उन कुछ फिल्मों में शामिल है जिनकी छाप समय के साथ फीकी नहीं हुई।