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इनसे न हो पायेगा -सौरभ द्विवेदी की असहज़ फिल्मी पारी

इनसे न हो पायेगा -सौरभ द्विवेदी की असहज़ फिल्मी पारी

हिमांशु राज़/पंकज अवस्थी 

मीडिया जगत का एक पुराना सच यह है कि वहां काम करने वाले बहुत-से लोगों को कभी न कभी परदे का आकर्षण अपनी ओर खींच ही लेता है। शायद ही कोई ऐसा अपवाद हो, जिसे फिल्मी कीड़ा न काटा हो। “प्रथम ग्रासे मक्षिकापात” जैसी कहावतें भी शायद ऐसे ही मौकों के लिए बनी हों। लल्लनटॉप के दिनों में सौरभ द्विवेदी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। उनका बोलने का सलीका, साहित्य और किताबों की समझ, सवाल पूछने की शैली और साक्षात्कार को संवाद का रूप देने की क्षमता उन्हें भीड़ से अलग करती थी। वे सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद सार्वजनिक आवाज़ के रूप में देखे जाते थे।लेकिन नेटफ्लिक्स पर 15 मई को रिलीज़ हुई सैफ अली खान स्टारर ‘कर्तव्य’ में उनकी फिल्मी एंट्री ने इस साख पर अनचाहा धब्बा छोड़ दिया। फिल्म में वे आनंद श्री नामक एक तथाकथित धर्मगुरु की भूमिका में नजर आते हैं, जिसके इर्द-गिर्द कहानी का एक अहम और अंधकारमय पक्ष बुना गया है। उपलब्ध समीक्षाओं के मुताबिक यह किरदार केवल दिखावटी नहीं, बल्कि कथानक के नैतिक और आपराधिक तनाव का हिस्सा है। समस्या यह है कि इतना संभावनाशील पात्र भी उनके अभिनय में वह असर नहीं पैदा कर पाता, जिसकी अपेक्षा एक धूर्त, क्रूर और पाखंडी चेहरे से की जाती है।उनके हिस्से के संवाद कागज़ पर भले प्रभावशाली लगते हों, लेकिन स्क्रीन पर न उनमें भय की ठंडक उतरती है, न छल की परत, न वह सम्मोहन, जो ऐसे किरदार को यादगार बना देता है। जहां दर्शक को किरदार से असहज होना चाहिए था, वहां कई बार अभिनय की असहजता अधिक स्पष्ट होकर सामने आ जाती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर उनका प्रदर्शन किरदार के बजाय उपहास का विषय बन गया। यह कहना कठोर हो सकता है, लेकिन सच यही है कि पत्रकारिता में जो स्वाभाविकता उनकी ताकत थी, वही अभिनय में कृत्रिमता के रूप में उभरती दिखी।यह भी उचित है कि ‘कर्तव्य’ की असफलता का सारा भार अकेले सौरभ द्विवेदी पर नहीं डाला जाए। कई समीक्षाओं में फिल्म की कथा, पटकथा और निर्देशन को भी बिखरा हुआ बताया गया है। फिल्म न तो धर्म के नाम पर पाखंड की कहानी बन पाती है, न जाति और खाप की हिंसा की, न ईमानदार पुलिसवाले के नैतिक संघर्ष की। सैफ अली खान, रसिका दुग्गल, संजय मिश्रा, मनीष चौधरी और ज़ाकिर हुसैन जैसे सक्षम कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म अपनी दिशा तय नहीं कर पाती।फिर भी सौरभ द्विवेदी के संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न फिल्म की विफलता से नहीं, बल्कि पात्रता और उपयुक्तता से जुड़ा है। पत्रकारिता में उनकी क्षमता निर्विवाद रही है। वे पढ़े-लिखे, सधे हुए, विचारशील और संवाद-कुशल सार्वजनिक व्यक्तित्व रहे हैं। यही उनकी असली पूंजी थी। अभिनय, कम-से-कम फिलहाल, उनके स्वभाव, प्रशिक्षण और अभिव्यक्ति के अनुकूल क्षेत्र नहीं दिखता। “कालीन भैया बनने की आड़ में शालीन भैया बनकर रह गए” जैसे मीम्स सोशल मीडिया की हंसी का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन उनके पीछे एक पेशेवर संकेत भी छिपा है: उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहिए—वहीं, जहां शब्द उनके साथ खड़े होते थे, दृश्य नहीं।संभव है, वे अब इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के साथ एक नई भूमिका में आगे बढ़ रहे हों। यदि ऐसा है, तो इसे वापसी नहीं, बल्कि संतुलन की ओर बढ़ता कदम कहा जाएगा। सौरभ द्विवेदी को अभिनय में नहीं, पत्रकारिता में याद रखा जाना चाहिए—और शायद उनकी सबसे समझदारी भरी अगली चाल भी यही होगी।